रोमियों 1:1
पाठ
कुरिन्थुस का कोई किराए का कमरा, और एक लेखक कलम डुबोकर बैठा है। पौलुस बोलना शुरू करते हैं, और पहला वाक्य ही चौंकाने वाला है। वे रोम की उस कलीसिया को लिख रहे हैं जिसे उन्होंने कभी देखा नहीं, साम्राज्य की राजधानी में बसे लोगों को, और अपना परिचय इन शब्दों में देते हैं: "पौलुस की ओर से जो यीशु मसीह का दास है, और प्रेरित होने के लिये बुलाया गया, और परमेश्वर के उस सुसमाचार के लिये अलग किया गया है।" नाम, फिर तीन बातें। कोई डिग्री नहीं, कोई वंशावली नहीं, कोई सिफारिश नहीं। बस यह कि मैं किसी और का हूँ, मुझे बुलाया गया, और मुझे छाँटकर एक संदेश के लिये रख दिया गया।
मर्म
ध्यान दीजिए कि इन तीनों में से एक भी क्रिया पौलुस की अपनी नहीं है। "बुलाया गया", "अलग किया गया" — कर्ता पर्दे के पीछे है, और वह परमेश्वर हैं। यूनानी शब्द दूलोस, यानी दास, रोम के पाठकों के कानों में खनकता होगा; उस शहर में हर तीसरा आदमी किसी का दास था, और यह कोई सम्मान की उपाधि नहीं थी। पौलुस उसे गले लगाते हैं। और सुसमाचार को वे "परमेश्वर का" कहते हैं, अपना नहीं। यहाँ पहचान कमाई नहीं जाती, दी जाती है। जो व्यक्ति कभी अपनी धार्मिकता की सूची गिनाता था, अब केवल इतना कहता है कि मालिक कोई और है और संदेश भी किसी और का है। अनुग्रह पहली ही पंक्ति में खड़ा है, बिना नाम लिए।
साझा सूत्र
"अलग किया गया" वाला शब्द पौलुस ने हवा से नहीं उठाया। यह भविष्यद्वक्ताओं की भाषा है। परमेश्वर यिर्मयाह से कहते हैं कि गर्भ में गढ़ने से पहले ही मैंने तुझे जान लिया और जातियों के लिये ठहरा दिया; पौलुस अपने आप को उसी कतार में खड़ा पाते हैं। और तुरंत अगली साँस में वे बताते हैं कि यह सुसमाचार कोई नई खोज नहीं: परमेश्वर ने "पहले ही से अपने भविष्यद्वक्ताओं के द्वारा पवित्रशास्त्र में" इसकी प्रतिज्ञा की थी, "अपने पुत्र हमारे प्रभु यीशु मसीह के विषय में"। यानी पहली पंक्ति में जो व्यक्ति खुद को दास कहता है, वह दूसरी ही पंक्ति में खुद को हटाकर मंच खाली कर देता है। कहानी उसकी नहीं है। कहानी उस प्रतिज्ञा की है जो सदियों से चली आ रही थी और दाऊद के वंश में देह बनकर आई। पौलुस केवल उस पुरानी आवाज़ का ताज़ा मुँह हैं।
दर्पण
आप अपना परिचय कैसे देते हैं? स्कूल के स्टाफ रूम में, रिश्तेदारों के बीच, किसी नए समूह में जहाँ सब एक-दूसरे को तौल रहे हैं। हममें से ज़्यादातर लोग वही कहते हैं जो हमने कमाया है: पद, डिग्री, बच्चों की उपलब्धियाँ, कलीसिया में हमारी ज़िम्मेदारी। यह बुरा नहीं, पर यह नाज़ुक है। पद छिन जाए, तबीयत बिगड़ जाए, बच्चा रास्ता भटक जाए, और परिचय ढह जाता है। पौलुस का परिचय ढह नहीं सकता, क्योंकि उसे उन्होंने बनाया ही नहीं। जिस दिन आपकी सेवा फलती नहीं दिखती, उस दिन भी आप बुलाए हुए हैं, क्योंकि बुलानेवाले ने अपना मन नहीं बदला।
आज यह कीजिए: एक कागज़ पर वे तीन बातें लिखिए जिनसे आप आमतौर पर खुद को पहचानते हैं। फिर उनके नीचे लिखिए, "मैं यीशु मसीह का दास हूँ," और उसे धीरे से ज़ोर से पढ़िए। कागज़ वहीं रखिए जहाँ कल सुबह आपकी नज़र पड़े।
कठिन प्रश्न
दास शब्द पर हम जल्दी से मलहम लगा देते हैं, "सेवक" कहकर। पर पौलुस ने नरम शब्द नहीं चुना। दास के पास अपना समय नहीं होता, अपनी योजना नहीं होती, अपने शरीर पर अधिकार नहीं होता। क्या सुसमाचार सचमुच यही माँगता है? ईमानदारी से: हाँ। मसीह आपके जीवन का सलाहकार बनने नहीं आए, मालिक बनने आए, और पौलुस इसे छिपाते नहीं। जो कान आज़ादी को सबसे ऊँचा मूल्य मानने के आदी हैं, उनके लिए यह अपमानजनक है, और होना भी चाहिए। पौलुस यहाँ यह नहीं समझाते कि यह दासता कैसे स्वतंत्रता बन जाती है; वे बस इसे अपने नाम के आगे लिखकर आगे बढ़ जाते हैं। शायद इसलिए कि यह तर्क से नहीं, जीकर ही समझ में आता है। जिसने मालिक का चेहरा देख लिया, उसे यह सौदा घाटे का नहीं लगता।
मुख्य पात्र
कल्पना कीजिए उस आदमी की जो कभी अपने नाम के साथ "फरीसी, फरीसी का पुत्र" जोड़ता था, जो पत्र लेकर दमिश्क जा रहा था कि इसी मसीह के अनुयायियों को बाँधकर लाए। अब वही आदमी बोलता है और सबसे पहले अपने मालिक का नाम लेता है। इसमें आत्म-घृणा नहीं है, यह ध्यान देने की बात है। कोई कराहती हुई विनम्रता नहीं, कोई "मैं तो कुछ भी नहीं" वाला नाटक नहीं। बल्कि एक शांत, लगभग गर्वीला आत्मविश्वास: मैं जानता हूँ मैं किसका हूँ और किसलिए हूँ। जिस आदमी को अनुग्रह ने घोड़े से गिराया हो, वह अपनी योग्यता का हिसाब नहीं देता, पर अपनी नियुक्ति पर लजाता भी नहीं। यही संतुलन दुर्लभ है, और यही पूरे पत्र का स्वर तय कर देता है।
पहले सुननेवाले
रोम में बैठे वे लोग किसी छोटे घर में इकट्ठा हुए होंगे, शायद तीस-चालीस जन, जिनमें दास भी थे और आज़ाद किए गए लोग भी, यहूदी भी और अन्यजाति भी। उनका शहर उस सम्राट का था जिसके दूत गली-गली "शुभ समाचार" की घोषणा करते थे: नया शासक आया, विजय हुई, शांति स्थापित हुई। और अब एक अनजान चिट्ठी खुलती है जो उसी शब्द का इस्तेमाल करती है, पर कहती है कि यह "परमेश्वर का सुसमाचार" है, और असली प्रभु दाऊद का वंशज है जो मरे हुओं में से जी उठा। यह केवल धार्मिक बात नहीं थी, यह राजनीतिक रूप से ख़तरनाक वाक्य था। और जिस कमरे में सचमुच के दास बैठे थे, उन्होंने सुना कि यह बड़ा प्रेरित भी खुद को दास कहता है। उस कमरे में कुछ बराबर हो गया होगा।
चिंतन
जब आपका काम, पद या भूमिका आपसे छिन जाए, तो आपके पास अपने बारे में कहने को क्या बचता है?
पौलुस "परमेश्वर का सुसमाचार" कहते हैं, "मेरा" नहीं। आपकी सेवा में कौन-सी चीज़ चुपचाप "मेरी" बन गई है?
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Romans 1:1 के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
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रोमियों 1:1 का क्या अर्थ है?
रोमियों 1:1 किस विषय में है?
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रोमियों 1:1 हमें परमेश्वर के स्वभाव के बारे में क्या सिखाता है?
रोमियों 1:1 आज भी कैसे प्रासंगिक है?
Romans 1 पर समुदाय क्या साझा करता है
इस अंश पर पाठकों और संपादकीय टीम से अंतर्दृष्टि, प्रार्थनाएँ और धन्यवाद।
इसी कारण परमेश्वर ने उन्हें नीच कामनाओं के वश में छोड़ दिया।" पौलुस की सबसे डरावनी बात यही है, परमेश्वर ने रोका नहीं, छोड़ दिया। कभी कभी सबसे बड़ी सज़ा यही होती है कि हमें वही मिल जाए जो हम ज़िद करके माँग रहे थे। सोचो, क्या कोई ऐसी बात है जिसमें तू परमेश्वर से लगातार कह रहा है, मुझे छोड़ दे?
पिता, मेरी कितनी योजनाएँ रुक जाती हैं, और मैं समझ नहीं पाता क्यों। फिर भी मैं जानता हूँ कि तेरा समय मुझसे बेहतर है। जहाँ तू मुझे भेजे, वहाँ मेरे जीवन से कुछ अच्छा फल निकले, और जिनसे मैं दूर हूँ, उन्हें भी तू थामे रख।
धर्मी जन विश्वास से जीवित रहेगा।" ध्यान दो, पौलुस यह नहीं कहता कि धर्मी जन विश्वास से बचाया जाएगा, बल्कि जीवित रहेगा। यानी हर सुबह, हर बिल दिखने पर, हर जाँच रिपोर्ट पर, यही साँस लेनी है। और परमेश्वर की धार्मिकता "विश्वास से और विश्वास के लिये" प्रकट होती है, एक कदम भरोसे का, फिर अगला। तुम्हारा आज का कदम कौन सा है?
पौलुस यहाँ सिर्फ किसी एक पाप की सूची नहीं बना रहा। पीछे मुड़कर देखो: जड़ यह है कि मनुष्य ने "परमेश्वर की सच्चाई को झूठ से बदल डाला।" जब परमेश्वर हटता है, तो जगह खाली नहीं रहती, वहाँ हमारी अपनी इच्छाएँ बैठ जाती हैं और मालिक बन जाती हैं। इसलिए पूछ: मेरे जीवन में किस छोटी चीज़ को मैंने परमेश्वर की जगह दे दी है?
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