रोमियों 12:14
पाठ
रोमी मसीहियों के लिए पौलुस का यह वाक्य आधे साँस जितना छोटा है, पर उसमें एक पूरी दुनिया उलट जाती है: "अपने सतानेवालों को आशीष दो; आशीष दो श्राप न दो।" जो तुम्हें दौड़ा रहे हैं, जो तुम्हारा नाम बदनाम कर रहे हैं, जिनके कारण तुम्हारी रोटी और तुम्हारी सुरक्षा खतरे में है, उनके लिए भलाई माँगो, बुरा मत माँगो। पौलुस इसे दो बार कहते हैं, पहले सकारात्मक रूप में, फिर नकारात्मक रूप में, मानो वे जानते हों कि पहली बार सुनकर कोई सिर हिलाएगा और मन ही मन एक अपवाद बना लेगा। इसलिए वे दरवाज़ा बंद कर देते हैं: आशीष दो, और श्राप का रास्ता बचा मत रखो।
मूल बात
पहली सदी के रोम में शब्द केवल भावना नहीं थे, वे हथियार थे। लोग सीसे की पतली चादरों पर अपने दुश्मन का नाम खुरचकर, उन्हें मोड़कर कुओं और कब्रों में डाल देते थे, इस विश्वास के साथ कि श्राप अपना काम करेगा। कमज़ोर आदमी के पास तलवार नहीं थी, पर जीभ थी। पौलुस ठीक यही आखिरी हथियार माँग लेते हैं। और वे इसे किसी उदासीन शांतिवाद के नाम पर नहीं माँगते, बल्कि इसलिए कि परमेश्वर स्वयं ऐसे ही हैं: वे अपने विद्रोहियों को आशीष देकर पास लाए। जो मसीही आशीष देता है, वह हार नहीं मानता; वह न्याय का भार परमेश्वर के हाथ में लौटा देता है, जैसा पौलुस थोड़ा आगे कहते हैं, "बदला लेना मेरा काम है।" श्राप छोड़ना असल में परमेश्वर पर भरोसा करना है।
सूत्र
पौलुस यहाँ कोई नई नैतिकता नहीं गढ़ रहे। वे अपने प्रभु की आवाज़ दोहरा रहे हैं, जिन्होंने पहाड़ पर कहा था कि सतानेवालों के लिए प्रार्थना करो, और जिन्होंने क्रूस पर लटके-लटके अपने जल्लादों के लिए क्षमा माँगी। यही वह जगह है जहाँ पुराने नियम की लंबी रेखा आकर टूटती और पूरी होती है: भजनों में सतानेवालों के विरुद्ध पुकार भरी पड़ी है, "बदला लेना मेरा काम है" व्यवस्थाविवरण से आता है, यानी बदला हमेशा से परमेश्वर का अधिकार था, कभी पीड़ित का नहीं। मसीह में वह अधिकार सिर्फ़ सुरक्षित नहीं रहा, वह क्रूस पर चुका दिया गया। इसलिए आशीष देना भावुकता नहीं, गवाही है: तुम्हारे भीतर वही जीवन काम कर रहा है जिसने शत्रु रहते हुए तुम्हें अपनाया।
दर्पण
आपके पास शायद सीसे की चादर नहीं है, पर एक ब्लॉक की गई नंबर की सूची है, एक वॉट्सऐप ग्रुप है जिसमें उस आदमी का ज़िक्र आते ही आपका जबड़ा कस जाता है, एक रिश्तेदार है जिसने ज़मीन के बँटवारे में आपके साथ बेईमानी की। और है वह छोटा-सा सुख जब उसका नुकसान हो जाए। श्राप आज ठंडे तानों, चुप्पी और उस मौन प्रार्थना में जीता है जिसमें हम परमेश्वर से चाहते हैं कि वे हमारा हिसाब चुका दें। पौलुस उस मीठे ज़हर को छीन लेते हैं। आज ही एक काम कीजिए: जिस व्यक्ति का नाम आते ही आपके भीतर कड़वाहट उठती है, उसका नाम कागज़ पर लिखिए और ज़ोर से बोलकर परमेश्वर से उसकी भलाई माँगिए, नाम लेकर, एक ठोस भलाई।
संदर्भ
पत्र लगभग सन् 57 में लिखा गया, ऐसे शहर की कलीसिया के लिए जहाँ कुछ ही साल पहले सम्राट क्लौदियुस ने यहूदियों को निकाल बाहर किया था। लौटकर आए विश्वासी अपने घर, दुकानें, प्रतिष्ठा दोबारा जोड़ रहे थे। ये लोग किराए के तंग मकानों की ऊपरी मंज़िलों में, कारीगरों की गलियों में इकट्ठे होते थे; भीड़, धुआँ, पड़ोसियों की निगरानी। "सतानेवाले" उनके लिए कोई दूर का सम्राट नहीं था, बल्कि वह मालिक था जिसने गुलाम को नई आस्था के कारण पिटवाया, वह परिवार जिसने बेटी को घर से निकाल दिया, वह संघ जिसने देवताओं के भोज में न आने पर काम छीन लिया। कानूनी सहारा लगभग नहीं था। बदले का एकमात्र सुलभ रास्ता जीभ थी, और पौलुस वही बंद कर रहे हैं।
एक बारीकी
ध्यान दीजिए कि पौलुस "क्षमा करो" नहीं कहते, न "सह लो" कहते हैं। वे कहते हैं "आशीष दो", और आशीष हमेशा परमेश्वर की ओर मुड़कर बोली जाती है। यह निष्क्रिय सहनशीलता नहीं, सक्रिय पहल है: आप सतानेवाले के जीवन के लिए परमेश्वर से भलाई माँगते हैं। साथ ही यह आपको ऐसी जगह खड़ा करता है जहाँ आप न्यायाधीश नहीं रह जाते, क्योंकि जो आशीष माँगता है वह दंड की माँग वापस ले लेता है। और दोहराव पर गौर कीजिए, "आशीष दो, श्राप न दो।" पौलुस जानते हैं कि मनुष्य का मन बीच का रास्ता खोजता है: बोलूँगा नहीं, बस चाहूँगा। उस बीच के रास्ते को भी वे काट देते हैं।
पहले सुननेवाले
जिन कानों ने यह पत्र पहली बार सुना, उनमें कई गुलामों के कान थे, कुछ आज़ाद किए गए दासों के, कुछ छोटे व्यापारियों के। उन्होंने इस वाक्य में वह सुना जो हम अक्सर नहीं सुनते: एक असंभव माँग, जो साथ ही अपमान से मुक्ति भी थी। जिसे रोज़ नीचा दिखाया जाता है, उसका मन बदले के सपनों से भर जाता है, और वे सपने उसे भीतर से खा जाते हैं। पौलुस उन्हें कहते हैं, तुम्हें अपने सतानेवाले की तरह बनने की ज़रूरत नहीं; तुम्हारे पास देने को आशीष है, यह गरीब की सबसे बड़ी सम्पत्ति है। और यह वाक्य अकेला नहीं आता, इसके चारों ओर पहुनाई, रोनेवालों के साथ रोना, दीनों के साथ संगति है। आशीष एक ऐसे समुदाय में साँस लेती है जो पहले से एक-दूसरे को थामे हुए है।
चिंतन
पिछले महीने आपने जिस व्यक्ति के बारे में सबसे कठोर बात कही या सोची, अगर परमेश्वर सचमुच उसकी भलाई कर दें, तो आपके भीतर क्या टूटेगा?
आप श्राप को किन "सभ्य" रूपों में जीवित रखते हैं: चुप्पी, तंज़, दूसरों से उसकी कहानी सुनाना?
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Romans 12:14 के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
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Romans 12 पर समुदाय क्या साझा करता है
इस अंश पर पाठकों और संपादकीय टीम से अंतर्दृष्टि, प्रार्थनाएँ और धन्यवाद।
पिता, धन्यवाद कि आपने हमें बदला लेने के बोझ से छुड़ाया। आपका वचन सिखाता है, "बुराई के बदले किसी से बुराई न करो," और यही हमारे मन की शांति बनता है। धन्यवाद कि आप हमें वह करने की शक्ति देते हैं जो सब लोगों के सामने भला है।
पिता, मुझे अपने बारे में सच्ची समझ दे। न इतना बड़ा समझूँ कि दूसरों को छोटा कर दूँ, न इतना कम कि तेरा दिया हुआ भूल जाऊँ। जो विश्वास तूने मुझे सौंपा है, उसी नाप से चलना सिखा, संयम और नम्रता के साथ।
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