आमोस 2
प्राथमिक आयु (6 से 12 वर्ष) के लिए व्याख्या और बाइबल कहानी
व्याख्या
आमोस नबी एक चरवाहा था, पर परमेश्वर ने उसे एक कठिन संदेश देने भेजा। आमोस अध्याय 2 में वे एक के बाद एक देशों का नाम लेते हैं। पहले मोआब की बारी आती है। मोआब ने एदोम के राजा की हड्डियों को जलाकर चूना बना दिया था, यानी मरे हुए के शरीर का भी कोई आदर नहीं रखा। इसलिए परमेश्वर कहते हैं कि वे मोआब को दण्ड देंगे।
फिर यहूदा की बारी आती है, यानी परमेश्वर के अपने लोगों में से आधा हिस्सा। उन्होंने यहोवा की व्यवस्था को तुच्छ जाना, यानी परमेश्वर के नियमों को कुछ भी नहीं समझा, और झूठे देवताओं के पीछे भटक गए।
फिर अंत में इस्राएल की बारी आती है, बाकी बचे हुए परमेश्वर के लोग। और यहाँ सूची सबसे लंबी और सबसे दुखद हो जाती है। उन्होंने निर्दोष लोगों को पैसे के लिए बेच डाला, गरीबों को जूतियों की कीमत पर बेचा। वे कमजोर लोगों को दबाते थे, और बाप-बेटा दोनों एक ही स्त्री के पास जाते थे, जिससे परमेश्वर का पवित्र नाम अपवित्र हुआ। वे लोगों के कपड़े गिरवी रखकर वेदियों के पास उन्हीं पर सो जाते थे, और अन्याय से कमाए पैसों से दाखमधु पीते थे।
परमेश्वर याद दिलाते हैं कि उन्होंने इस्राएल के लिए कितना कुछ किया। उन्होंने उन्हें मिस्र से निकाला, चालीस साल जंगल में उनकी रखवाली की, और उन्हें वह देश दिया जहाँ पहले शक्तिशाली एमोरी लोग रहते थे। उन्होंने उनमें से कुछ को नबी और कुछ जवानों को नाज़ीर, यानी विशेष रूप से परमेश्वर को समर्पित लोग, बनाया। पर इस्राएल ने नाज़ीरों को दाखमधु पिलाकर उनका समर्पण तुड़वाया, और नबियों को चुप करा दिया। इसलिए परमेश्वर कहते हैं कि वे उन्हें ऐसे दबाएँगे जैसे भारी गाड़ी को दबाया जाता है, और उस दिन कोई भी, चाहे कितना भी ताकतवर या तेज़ हो, बच नहीं पाएगा।
इसका अर्थ क्या है?
यह अध्याय चौंकाने वाला है। इस्राएल के लोग सोचते होंगे, "हाँ, मोआब और यहूदा को दण्ड मिलना चाहिए, वे तो बुरे हैं।" पर फिर अचानक आमोस उनकी ही तरफ उंगली उठाते हैं, और सूची सबसे लंबी उन्हीं की होती है। परमेश्वर के अपने लोग होने का मतलब यह नहीं कि वे सही काम करने से छूट गए हैं। बल्कि उल्टा, क्योंकि परमेश्वर ने उन पर इतनी कृपा की, उनसे ज़्यादा उम्मीद की जाती है।
यहाँ एक कठिन सवाल उठता है। क्या परमेश्वर इतने कड़े क्यों हैं? पर ज़रा सोचिए, गरीब को जूतियों की कीमत पर बेच देना, यह कोई छोटी बात नहीं। परमेश्वर का गुस्सा इसलिए है क्योंकि वे कमजोर और सताए हुए लोगों से प्रेम करते हैं।
समान सूत्र
परमेश्वर ने इस्राएल को मिस्र से निकाला, यह एक बड़ी घटना थी जिसे वाचा कहा जाता है, यानी परमेश्वर का अपने लोगों के साथ किया गया वादा। परमेश्वर ने वादा निभाया, उन्हें देश दिया, नबी और नाज़ीर दिए। पर इस्राएल ने अपनी तरफ से वाचा को तोड़ा। यह पूरी बाइबल की कहानी है, परमेश्वर बार-बार वफादार रहते हैं, पर लोग बार-बार भटकते हैं। बाद में यीशु मसीह इस टूटी हुई वाचा को नए सिरे से जोड़ने आए, न्याय और दया दोनों को अपने ऊपर उठाकर।
आपके लिए
कभी-कभी हम सोचते हैं कि चर्च जाना या परमेश्वर को जानना काफी है। पर आमोस कहते हैं कि असली विश्वास दिखता है इसमें कि हम कमजोर लोगों के साथ कैसा व्यवहार करते हैं। क्या आप कभी किसी को छोटा या बेकार समझते हैं क्योंकि वह गरीब है या अलग दिखता है? परमेश्वर उन लोगों को देखते हैं जिन्हें बाकी सब नज़रअंदाज़ करते हैं।
बात करें
अगर परमेश्वर ने इस्राएल को इतनी कृपा दी थी, तो क्या आपको लगता है कि उनका गुस्सा जायज़ था, या बहुत ज़्यादा था?
आप अपने स्कूल या घर में किसे "छोटा" समझकर नज़रअंदाज़ करने का खतरा महसूस करते हैं?
साथ में प्रार्थना
प्रभु, हमें माफ कीजिए जब हम कमजोरों को भूल जाते हैं। हमें ऐसी आँखें दीजिए जो हर व्यक्ति को वैसे ही देखें जैसे आप देखते हैं। धन्यवाद कि यीशु मसीह ने हमारे लिए वह रास्ता खोला जो हम खुद नहीं खोल सकते थे। आमीन।
आमोस 2 के बारे में प्रश्न
पहली बार इसके बारे में पढ़ने वाले हर किसी के लिए छोटे उत्तर।
आमोस 2 किस विषय में है?
आमोस 2 क्या कहता है?
आमोस 2 हमें परमेश्वर के बारे में क्या सिखाता है?
बच्चे आमोस 2 से क्या सीख सकते हैं?
आमोस 2 एक महत्वपूर्ण बाइबल कहानी क्यों है?
दूसरों ने क्या पाया
धनुर्धारी खड़ा न रह सकेगा, और फुर्ती से दौड़नेवाला न बचेगा, और न घोड़े पर सवार अपना प्राण बचा सकेगा।" जिन पर इस्राएल को सबसे ज़्यादा भरोसा था, वही सबसे पहले गिरे। तेरी भी कोई ताकत होगी, कोई हुनर, कोई बचत, कोई रिश्ता, जिसके भरोसे तू चैन से सोता है। पूछ अपने आप से, अगर वह कल न रहे, तो क्या परमेश्वर काफ़ी है?
फिर मैं तुम को मिस्र देश से निकाल लाया, और जंगल में चालीस वर्ष तक लिए फिरता रहा।" परमेश्वर सिर्फ़ निकालकर छोड़ नहीं देता, वह चालीस साल साथ चलता है। पर आमोस यह याद इसलिए दिला रहा है क्योंकि इस्राएल भूल चुका था। सोचो, तुम्हारे जीवन का वह जंगल जहाँ वह तुम्हें उठाए फिरा, क्या तुम अब भी उसका ज़िक्र करते हो?
यरूशलेम के भवन, वही जगह जहाँ परमेश्वर का मन्दिर खड़ा था। फिर भी आमोस कहता है, "इसलिए मैं यहूदा में आग भेजूँगा, और वह यरूशलेम के भवनों को भस्म कर देगी।" जो आग पड़ोसी जातियों पर गिरी थी, वही अब अपने ही लोगों पर। सच यह है कि परमेश्वर के करीब होने का नाम नहीं, उसकी बात मानना बचाता है। तेरी कौन सी आदत है जिसे तू इसलिए पाले हुए है क्योंकि तू सोचता है, मैं तो विश्वासी हूँ, मुझे कुछ नहीं होगा?
आसपास की जातियों पर दोष लगा था क्रूरता का, खून का, निर्दयता का। पर यहूदा पर? "उन्होंने यहोवा की व्यवस्था को तुच्छ जाना और उसकी विधियों को नहीं माना।" उनके पास परमेश्वर का वचन था, और वही उनके विरुद्ध गवाही बन गया।
और ध्यान दे, जो झूठ उन्हें भटकाता रहा, वह उनके पुरखाओं से चला आ रहा था। हर विरासत में मिली बात सच्ची नहीं होती। तेरी खुली बाइबिल तुझे धन्य बनाती है या जवाबदेह, यह इस पर है कि तू उसे मानता है या बस रखता है।
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