7 से 12 वर्ष के बच्चे के लिए

सभोपदेशक 11

प्राथमिक आयु (7-12) के लिए व्याख्या और बाइबल कहानी

बाइबल

व्याख्या

सभोपदेशक 11 में लेखक हमें कुछ अजीब सी सलाह देता है। वह कहता है, "अपनी रोटी जल के ऊपर डाल दे, क्योंकि बहुत दिन के बाद तू उसे फिर पाएगा" (पद 1)। यह उस समय के व्यापारियों की तरह है जो अपना माल जहाज़ों में समुद्र के पार भेजते थे, यह जानते हुए भी कि जोखिम है, पर भरोसा रखते थे कि उन्हें उसका फल मिलेगा। लेखक कहता है, बाँट दो, दे दो, भले ही तुम्हें अभी नतीजा न दिखे।

फिर वह बादलों और पेड़ों की बात करता है (पद 3)। बादल जब भरे होते हैं तो पानी बरसा ही देते हैं, यह उनके वश में नहीं है। पेड़ जिस दिशा में गिरता है, वहीं पड़ा रहता है, उसे कोई बदल नहीं सकता। इसी तरह जीवन में भी कुछ बातें हमारे हाथ में नहीं होती।

पद 4 एक किसान की तस्वीर देता है जो हवा और बादलों को ताकता रहता है, यह सोचकर कि सही समय का इंतज़ार करे। पर लेखक कहता है, ऐसा किसान न तो बीज बो पाएगा, न कटनी काट पाएगा। हमें नहीं मालूम कि परमेश्वर कैसे काम करते हैं, ठीक जैसे हम नहीं जानते कि हवा किस राह चलती है या माँ के गर्भ में बच्चे की हड्डियाँ कैसे बढ़ती हैं (पद 5)। इसलिए सलाह यह है, "भोर को अपना बीज बो, और साँझ को भी अपना हाथ न रोक" (पद 6), यानी दोनों समय काम करते रहो, क्योंकि तुम नहीं जानते कि किसमें सफलता मिलेगी।

आखिरी हिस्से में लेखक जवानों से सीधे बात करता है। वह कहता है, उजियाला अच्छा लगता है, आँखों को धूप देखना सुखद है (पद 7)। जीवन के दिनों में आनन्द मनाओ (पद 9), पर यह भी याद रखो कि परमेश्वर तुमसे हिसाब लेंगे। और यह भी कि अंधियारे के दिन भी आएँगे, क्योंकि जो कुछ होता है वह "व्यर्थ" है, यानी उसकी पूरी गहराई हम कभी समझ नहीं पाते।

इसका क्या मतलब है?

यह अध्याय हमें सिखाता है कि जीवन में बहुत कुछ है जो हम नियंत्रित नहीं कर सकते। हम नहीं जानते कि कल क्या होगा, कौन सी योजना सफल होगी, कौन सी नहीं। पर इसका मतलब यह नहीं कि हम हाथ बाँधकर बैठ जाएँ। लेखक कहता है, फिर भी बीज बोओ, फिर भी बाँटो, फिर भी काम करो। भरोसा रखना और डरते हुए इंतज़ार करना, दोनों अलग बातें हैं।

यह भी दिलचस्प है कि लेखक जवानों को आनन्द मनाने के लिए कहता है, पर साथ ही यह याद दिलाता है कि परमेश्वर हमारा न्याय करेंगे। यानी खुशी और ज़िम्मेदारी साथ चल सकती हैं। कभी-कभी हमें लगता है कि परमेश्वर की बात मानने का मतलब है मज़े न करना, पर यह अध्याय ऐसा नहीं कहता।

एक बड़ी कड़ी

यह किताब हमें साफ़ जवाब नहीं देती कि परमेश्वर हर बात कब और कैसे करते हैं, और यह ईमानदारी है, न कि कमज़ोरी। यीशु मसीह ने भी सिखाया कि हवा कहाँ से आती है और कहाँ जाती है, हम नहीं जान सकते, वैसे ही पवित्र आत्मा से नया जन्म पाने वालों के साथ होता है (यूहन्ना 3:8)। परमेश्वर के काम हमेशा हमारी समझ से बड़े होते हैं। पर बाइबल की बड़ी कहानी हमें यह भी बताती है कि यही परमेश्वर हमें छोड़ते नहीं। यीशु ने अपना जीवन "जल के ऊपर डाल दिया", यानी बिना यह देखे कि उसका फल कब मिलेगा, उसने अपना सब कुछ दे दिया, और तीसरे दिन उसे वह फल मिला, हमारा उद्धार।

तुम्हारे लिए

अगली बार जब तुम्हें लगे कि किसी काम का कोई फायदा नहीं, चाहे वह पढ़ाई हो, किसी दोस्त की मदद हो, या परमेश्वर से प्रार्थना करना हो, याद रखो कि बीज बोने वाले को कटनी का दिन तुरंत नहीं दिखता। तुम अपनी भलाई और मेहनत का फल हमेशा तुरंत नहीं देख पाओगे, पर इसका मतलब यह नहीं कि वह बेकार है। और जब तुम्हें आनन्द के दिन मिलें, खुलकर आनन्द मनाओ, क्योंकि परमेश्वर ने वह उजियाला और खुशी तुम्हें दी है।

आपस में बात करो

कभी तुमने कोई भलाई की हो और उसका फल तुम्हें बहुत देर बाद दिखा हो? वह कैसा लगा?

सभोपदेशक कहता है कि हम परमेश्वर के काम पूरी तरह नहीं समझ सकते। इससे तुम्हें अच्छा लगता है या मुश्किल?

एक साथ प्रार्थना

प्रभु, हम हमेशा नहीं समझ पाते कि आप कैसे काम करते हैं। फिर भी हमें भरोसा और हिम्मत दीजिए कि हम भलाई करते रहें, बाँटते रहें, और अपने दिनों में वह आनन्द मनाएँ जो आपने हमें दिया है। आमीन।

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सभोपदेशक 11 के बारे में प्रश्न

पहली बार इसके बारे में पढ़ने वाले हर किसी के लिए छोटे उत्तर।

सभोपदेशक 11 किस विषय में है?
सभोपदेशक 11 में लेखक हमें कुछ अजीब सी सलाह देता है। वह कहता है, "अपनी रोटी जल के ऊपर डाल दे, क्योंकि बहुत दिन के बाद तू उसे फिर पाएगा" (पद 1)। यह उस समय के व्यापारियों की तरह है जो अपना माल जहाज़ों में समुद्र के पार भेजते थे, यह जानते हुए भी कि जोखिम है, पर भरोसा रखते थे कि उन्हें उसका फल मिलेगा। लेखक कहता है, बाँट दो, दे दो, भले ही तुम्हें अभी नतीजा न दिखे।
सभोपदेशक 11 क्या कहता है?
पद 4 एक किसान की तस्वीर देता है जो हवा और बादलों को ताकता रहता है, यह सोचकर कि सही समय का इंतज़ार करे। पर लेखक कहता है, ऐसा किसान न तो बीज बो पाएगा, न कटनी काट पाएगा। हमें नहीं मालूम कि परमेश्वर कैसे काम करते हैं, ठीक जैसे हम नहीं जानते कि हवा किस राह चलती है या माँ के गर्भ में बच्चे की हड्डियाँ कैसे बढ़ती हैं (पद 5)। इसलिए सलाह यह है, "भोर को अपना बीज बो, और साँझ को भी अपना हाथ न रोक" (पद 6), यानी दोनों समय काम करते रहो, क्योंकि तुम नहीं जानते कि किसमें सफलता मिलेगी।
सभोपदेशक 11 हमें परमेश्वर के बारे में क्या सिखाता है?
यह अध्याय हमें सिखाता है कि जीवन में बहुत कुछ है जो हम नियंत्रित नहीं कर सकते। हम नहीं जानते कि कल क्या होगा, कौन सी योजना सफल होगी, कौन सी नहीं। पर इसका मतलब यह नहीं कि हम हाथ बाँधकर बैठ जाएँ। लेखक कहता है, फिर भी बीज बोओ, फिर भी बाँटो, फिर भी काम करो। भरोसा रखना और डरते हुए इंतज़ार करना, दोनों अलग बातें हैं।
बच्चे सभोपदेशक 11 से क्या सीख सकते हैं?
यह किताब हमें साफ़ जवाब नहीं देती कि परमेश्वर हर बात कब और कैसे करते हैं, और यह ईमानदारी है, न कि कमज़ोरी। यीशु मसीह ने भी सिखाया कि हवा कहाँ से आती है और कहाँ जाती है, हम नहीं जान सकते, वैसे ही पवित्र आत्मा से नया जन्म पाने वालों के साथ होता है (यूहन्ना 3:8)। परमेश्वर के काम हमेशा हमारी समझ से बड़े होते हैं। पर बाइबल की बड़ी कहानी हमें यह भी बताती है कि यही परमेश्वर हमें छोड़ते नहीं। यीशु ने अपना जीवन "जल के ऊपर डाल दिया", यानी बिना यह देखे कि उसका फल कब मिलेगा, उसने अपना सब कुछ दे दिया, और तीसरे दिन उसे वह फल मिला, हमारा उद्धार।
सभोपदेशक 11 एक महत्वपूर्ण बाइबल कहानी क्यों है?
कभी तुमने कोई भलाई की हो और उसका फल तुम्हें बहुत देर बाद दिखा हो? वह कैसा लगा?

दूसरों ने क्या पाया

अंतर्दृष्टि संपादकीय पर पद 1

अपनी रोटी जल के ऊपर डाल दे, क्योंकि बहुत दिनों के बाद तू उसे फिर पाएगा।" पानी पर रोटी डालना बेवकूफी जैसा लगता है, कुछ लौटता दिखता ही नहीं। पर सुलैमान कहता है, दे दे, भले ही फल तुरन्त न दिखे। तूने जो भलाई चुपचाप की, जो माफ किया, जो सहारा दिया, वह बहता हुआ लगता है, पर परमेश्वर उसे गिनता है। क्या तू बिना रसीद के देना सीखेगा?

अंतर्दृष्टि संपादकीय पर पद 3

यदि बादल जल से भरे हों, तो वे पृथ्वी पर उसे बरसा देते हैं; और यदि वृक्ष दक्षिण या उत्तर की ओर गिरे, तो जिस स्थान पर वह गिरता है, वहीं पड़ा रहता है।"

बादल कब बरसेंगे, पेड़ किस ओर गिरेगा, यह तेरे हाथ में नहीं। पर बीज बोना तेरे हाथ में है। जो तू बदल नहीं सकता, उसकी चिंता में बैठा रहेगा, तो जो कर सकता था वह भी छूट जाएगा। आज उठ, बो दे।

अंतर्दृष्टि संपादकीय पर पद 9

जवानी एक तोहफ़ा है, और सभोपदेशक इससे इनकार नहीं करता। वह कहता है, "हे जवान, अपनी जवानी में आनन्द कर, और अपनी जवानी के दिनों में तेरा मन तुझे आनन्दित करे।" पर उसी साँस में वह जोड़ता है कि परमेश्वर तुझे इन सब बातों का न्याय में ले आएगा।

यह डराने के लिए नहीं, जगाने के लिए है। जी भरकर जी, पर याद रख कि हर हँसी, हर चुनाव किसी की आँखों के सामने हो रहा है जो तुझसे प्रेम करता है।

किसी अन्य आयु वर्ग की तलाश है?

हमारे पास छोटे बच्चों (3-6 वर्ष) और किशोरों (12 वर्ष और अधिक) के लिए विशेष संस्करण भी हैं।

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For parents and teachers: 7 से 12 वर्ष के उन बच्चों के लिए लिखा गया जो स्वयं पढ़ सकते हैं। पारिवारिक भक्ति और स्कूल में बाइबल पाठ के लिए उत्तम। This explanation is generated automatically by language models. While we strive for theological soundness, the software can make mistakes.

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