6 से 12 वर्ष के बच्चे के लिए

यहेजकेल 2

प्राथमिक आयु (6 से 12 वर्ष) के लिए व्याख्या और बाइबल कहानी

बाइबल

The Explanation

एक आदमी का नाम था यहेजकेल। एक दिन उसने कुछ अनोखा देखा और सुना। परमेश्वर की आवाज़ ने उससे कहा, "हे मनुष्य के सन्तान, अपने पाँवों के बल खड़ा हो, मैं तुझ से बातें करूँगा।"

जैसे ही यह आवाज़ सुनाई दी, कुछ अद्भुत हुआ। परमेश्वर का आत्मा यहेजकेल में समा गया और उसे अपने पाँवों पर खड़ा कर दिया। वह अब सुनने के लिए तैयार था।

परमेश्वर ने उसे एक काम दिया। "मैं तुझे इस्राएल के लोगों के पास भेजता हूँ," परमेश्वर ने कहा। पर ये कोई आसान लोग नहीं थे। ये वे लोग थे जिन्होंने परमेश्वर की बात न मानने का फैसला कर लिया था। उनके दादा-परदादा भी ऐसे ही थे, और अब वे भी वैसे ही निर्लज्ज और हठीले थे।

क्या तुम कभी किसी ऐसे काम में गए हो जहाँ तुम्हें पता था कि लोग तुम्हारी बात नहीं सुनेंगे? यहेजकेल के लिए भी यह वैसा ही था। पर परमेश्वर ने उसे हिम्मत दी। "उनसे न डरना," परमेश्वर ने कहा। "चाहे तुझे काँटों और बिच्छुओं के बीच भी रहना पड़े, उनके वचनों से मत डरना। उनके मुँह देखकर तेरा मन कच्चा न हो।"

फिर परमेश्वर ने कुछ अजीब सा कहा। उन्होंने यहेजकेल से कहा कि वह अपना मुँह खोले और एक चीज़ को खा ले। यहेजकेल ने ऊपर देखा, और वहाँ एक हाथ था जो उसकी तरफ बढ़ा हुआ था। उस हाथ में एक पुस्तक थी। यह पुस्तक एक ऐसी किताब की तरह थी जिस पर दोनों तरफ लिखा हुआ था। उसमें जो लिखा था वह खुशी की बातें नहीं थीं। उसमें विलाप और शोक और दुःख की बातें लिखी थीं।

What Does This Mean?

परमेश्वर यहेजकेल को एक भविष्यद्वक्ता बना रहे थे, यानी एक ऐसा आदमी जो परमेश्वर की बातें दूसरों को बताए। यह काम डरावना लग सकता था। जिन लोगों के पास उसे जाना था, वे गुस्सैल और हठीले थे। शायद वे सुनते भी नहीं। पर परमेश्वर ने साफ कहा, चाहे वे सुनें या न सुनें, फिर भी तू मेरे वचन उनसे कहना।

सबसे ज़रूरी बात यह थी कि यहेजकेल खुद परमेश्वर की बात को पहले माने। "तू विद्रोही न बनना," परमेश्वर ने कहा। इससे पहले कि यहेजकेल दूसरों को संदेश दे, उसे खुद उस संदेश को ग्रहण करना था, उसे जैसे खा लेना था।

The Common Thread

यह कहानी हमें याद दिलाती है कि परमेश्वर हमेशा अपने लोगों से बात करने का रास्ता ढूँढ़ते हैं, भले ही लोग सुनना न चाहें। बाद में परमेश्वर ने अपना सबसे बड़ा संदेश भेजा, अपने पुत्र यीशु मसीह को। यीशु मसीह भी ऐसे लोगों के पास आए जो हमेशा उनकी बात मानने को तैयार नहीं थे। पर यीशु मसीह भी नहीं डरे। जैसे यहेजकेल को वह पुस्तक खानी थी, वैसे ही हमें भी परमेश्वर का वचन अपने भीतर गहराई से उतारना है, ताकि वह हमारा हिस्सा बन जाए।

For You

तुम भी कभी किसी को परमेश्वर की बात बता सकते हो, भले ही तुम्हें लगे कि वह सुनेगा नहीं। शायद तुम्हारा कोई दोस्त है जो यीशु मसीह के बारे में नहीं जानता। डरने की ज़रूरत नहीं है। परमेश्वर यहेजकेल के साथ खड़े रहे, और वे तुम्हारे साथ भी खड़े रहेंगे। जब तुम बाइबल पढ़ो, उसे ऐसे पढ़ो जैसे तुम उसे अपने दिल में उतार रहे हो, न कि सिर्फ आँखों से देख रहे हो।

Talk About It

यहेजकेल को डर क्यों लग सकता था, और परमेश्वर ने उसे क्या कहकर हिम्मत दी?

क्या तुम्हें लगता है कि परमेश्वर की बात सुनना और मानना आसान है या मुश्किल? क्यों?

Praying Together

हे परमेश्वर, जैसे आपने यहेजकेल को हिम्मत दी, वैसे ही हमें भी हिम्मत दीजिए। हमें डर न लगे जब हम आपकी बातें दूसरों को बताएँ। हमारे दिल में अपना वचन गहराई से उतार दीजिए, ताकि हम उसे याद रखें और उस पर चलें। यीशु मसीह के नाम से, आमीन।

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यहेजकेल 2 के बारे में प्रश्न

पहली बार इसके बारे में पढ़ने वाले हर किसी के लिए छोटे उत्तर।

यहेजकेल 2 किस विषय में है?
एक आदमी का नाम था यहेजकेल। एक दिन उसने कुछ अनोखा देखा और सुना। परमेश्वर की आवाज़ ने उससे कहा, "हे मनुष्य के सन्तान, अपने पाँवों के बल खड़ा हो, मैं तुझ से बातें करूँगा।"
यहेजकेल 2 क्या कहता है?
परमेश्वर ने उसे एक काम दिया। "मैं तुझे इस्राएल के लोगों के पास भेजता हूँ," परमेश्वर ने कहा। पर ये कोई आसान लोग नहीं थे। ये वे लोग थे जिन्होंने परमेश्वर की बात न मानने का फैसला कर लिया था। उनके दादा-परदादा भी ऐसे ही थे, और अब वे भी वैसे ही निर्लज्ज और हठीले थे।
यहेजकेल 2 हमें परमेश्वर के बारे में क्या सिखाता है?
फिर परमेश्वर ने कुछ अजीब सा कहा। उन्होंने यहेजकेल से कहा कि वह अपना मुँह खोले और एक चीज़ को खा ले। यहेजकेल ने ऊपर देखा, और वहाँ एक हाथ था जो उसकी तरफ बढ़ा हुआ था। उस हाथ में एक पुस्तक थी। यह पुस्तक एक ऐसी किताब की तरह थी जिस पर दोनों तरफ लिखा हुआ था। उसमें जो लिखा था वह खुशी की बातें नहीं थीं। उसमें विलाप और शोक और दुःख की बातें लिखी थीं।
बच्चे यहेजकेल 2 से क्या सीख सकते हैं?
सबसे ज़रूरी बात यह थी कि यहेजकेल खुद परमेश्वर की बात को पहले माने। "तू विद्रोही न बनना," परमेश्वर ने कहा। इससे पहले कि यहेजकेल दूसरों को संदेश दे, उसे खुद उस संदेश को ग्रहण करना था, उसे जैसे खा लेना था।
यहेजकेल 2 एक महत्वपूर्ण बाइबल कहानी क्यों है?
तुम भी कभी किसी को परमेश्वर की बात बता सकते हो, भले ही तुम्हें लगे कि वह सुनेगा नहीं। शायद तुम्हारा कोई दोस्त है जो यीशु मसीह के बारे में नहीं जानता। डरने की ज़रूरत नहीं है। परमेश्वर यहेजकेल के साथ खड़े रहे, और वे तुम्हारे साथ भी खड़े रहेंगे। जब तुम बाइबल पढ़ो, उसे ऐसे पढ़ो जैसे तुम उसे अपने दिल में उतार रहे हो, न कि सिर्फ आँखों से देख रहे हो।

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