7 से 12 वर्ष के बच्चे के लिए

एज्रा 4

प्राथमिक आयु (7-12) के लिए व्याख्या और बाइबल कहानी

बाइबल

व्याख्या

जब यहूदी लोग बँधुआई से लौटकर यरूशलेम में परमेश्वर का मन्दिर फिर से बनाने लगे, तो सब लोग खुश नहीं थे। यहूदा और बिन्यामीन के कुछ पड़ोसी लोग आए और बोले, "हमें भी साथ बनाने दो, हम भी तुम्हारे परमेश्वर को खोजते हैं।" यह सुनकर अच्छा लगता है, पर जरुब्बाबेल और येशुअ, जो उस समय के अगुवे थे, उन्होंने साफ मना कर दिया। उन्होंने कहा कि यह मन्दिर फारस के राजा कुस्रू की आज्ञा के अनुसार इस्राएल के परमेश्वर यहोवा के लिए ही बनेगा, किसी और के साथ नहीं।

इस इनकार के बाद वे पड़ोसी लोग दुश्मन बन गए। उन्होंने यहूदियों को डराया, उनका हौसला तोड़ा, और सालों तक रुकावट डालते रहे। जब अर्तक्षत्र राजा बना, तो उन्होंने एक चिट्ठी लिखी जिसमें झूठे आरोप लगाए गए कि यरूशलेम एक बलवा करनेवाला नगर है और अगर इसकी दीवार बन गई तो राजा को हानि होगी। राजा ने जांच करने के बाद आदेश दिया कि काम रोक दिया जाए। सैनिक यरूशलेम पहुँचे और बलपूर्वक काम रोक दिया। मन्दिर बनाने का काम सालों तक रुका रहा, जब तक दारा राजा का राज्य नहीं आया।

इसका क्या अर्थ है?

यह अध्याय हमें एक मुश्किल सच बताता है, परमेश्वर का काम करना हमेशा आसान नहीं होता। जरुब्बाबेल और येशुअ ने सही काम किया जब उन्होंने उन लोगों को मना किया, पर इसकी कीमत चुकानी पड़ी। दुश्मनी बढ़ी, झूठी बातें फैलाई गईं, और काम रुक गया। बाइबल यहाँ कोई मीठी कहानी नहीं बताती कि अंत में सब ठीक हो गया। यह ईमानदारी से बताती है कि सालों तक मन्दिर अधूरा पड़ा रहा।

ध्यान देने की बात यह है कि दुश्मनों ने झूठ नहीं बोला कि वे यहोवा को नहीं जानते, बल्कि उन्होंने कहा कि वे भी उसी परमेश्वर की खोज में हैं। कभी-कभी सबसे बड़ी रुकावट वे लोग होते हैं जो अच्छे इरादे का दिखावा करते हैं, पर उनका दिल कुछ और चाहता है। यह पहचानना आसान नहीं है, और यहूदी अगुवों को यह पहचानने के लिए हिम्मत और बुद्धि दोनों चाहिए थी।

सिलसिला

परमेश्वर ने कुस्रू के द्वारा वादा किया था कि मन्दिर फिर बनेगा। यह एक प्रतिज्ञा थी, परमेश्वर का वह वचन जिसे वे निभाते हैं चाहे रास्ता कठिन हो। इस अध्याय में लगता है जैसे वह प्रतिज्ञा रुक गई, बल्कि हार गई। पर यही बाइबल की पूरी कहानी का ढंग है, परमेश्वर की योजनाएँ अक्सर रुकावटों से गुजरती हैं, पर मिटती नहीं। सालों बाद मन्दिर फिर से बनना शुरू हुआ और पूरा भी हुआ। और बहुत बाद में, यीशु मसीह ने खुद अपने बारे में कहा कि वे ही असली मन्दिर हैं, वह जगह जहाँ परमेश्वर और इंसान मिलते हैं। दुश्मनों ने उन्हें भी रोकने की कोशिश की, उन्हें मार भी डाला, पर परमेश्वर की योजना फिर भी पूरी हुई। रुकावट आखिरी शब्द नहीं होती।

आपके लिए

शायद तुमने भी कभी महसूस किया हो कि जब तुम कुछ अच्छा करने की कोशिश करते हो, कोई तुम्हें रोकता है या मजाक बनाता है। या शायद किसी ने दिखावा किया कि वह तुम्हारा दोस्त है, पर असल में वह तुम्हें नुकसान पहुँचाना चाहता था। जरुब्बाबेल और येशुअ ने "ना" कहने की हिम्मत दिखाई, तब भी जब इसका मतलब दुश्मनी बढ़ना था। कभी-कभी सही काम करने का मतलब यह नहीं कि सब तुरंत ठीक हो जाएगा। पर परमेश्वर देखते हैं जब तुम सच्चाई पर टिके रहते हो, भले ही नतीजा अभी न दिखे।

बात करें

अगर तुम जरुब्बाबेल की जगह होते, तो क्या तुम्हें उन लोगों को मना करना कठिन लगता? क्यों?

इस अध्याय में काम कई सालों तक रुका रहा। तुम्हें क्या लगता है, उन दिनों यहूदी लोग परमेश्वर के बारे में क्या सोचते रहे होंगे?

साथ में प्रार्थना

प्रभु, कभी-कभी हमारे अच्छे काम में भी रुकावटें आती हैं, और हमें समझ नहीं आता कि आप कहाँ हैं। हमें जरुब्बाबेल जैसी हिम्मत दीजिए कि हम सच्चाई पर टिके रहें, और हमें यह भरोसा दीजिए कि आपकी प्रतिज्ञा कभी नहीं मिटती। आमीन।

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एज्रा 4 के बारे में प्रश्न

पहली बार इसके बारे में पढ़ने वाले हर किसी के लिए छोटे उत्तर।

एज्रा 4 किस विषय में है?
जब यहूदी लोग बँधुआई से लौटकर यरूशलेम में परमेश्वर का मन्दिर फिर से बनाने लगे, तो सब लोग खुश नहीं थे। यहूदा और बिन्यामीन के कुछ पड़ोसी लोग आए और बोले, "हमें भी साथ बनाने दो, हम भी तुम्हारे परमेश्वर को खोजते हैं।" यह सुनकर अच्छा लगता है, पर जरुब्बाबेल और येशुअ, जो उस समय के अगुवे थे, उन्होंने साफ मना कर दिया। उन्होंने कहा कि यह मन्दिर फारस के राजा कुस्रू की आज्ञा के अनुसार इस्राएल के परमेश्वर यहोवा के लिए ही बनेगा, किसी और के साथ नहीं।
एज्रा 4 क्या कहता है?
यह अध्याय हमें एक मुश्किल सच बताता है, परमेश्वर का काम करना हमेशा आसान नहीं होता। जरुब्बाबेल और येशुअ ने सही काम किया जब उन्होंने उन लोगों को मना किया, पर इसकी कीमत चुकानी पड़ी। दुश्मनी बढ़ी, झूठी बातें फैलाई गईं, और काम रुक गया। बाइबल यहाँ कोई मीठी कहानी नहीं बताती कि अंत में सब ठीक हो गया। यह ईमानदारी से बताती है कि सालों तक मन्दिर अधूरा पड़ा रहा।
एज्रा 4 हमें परमेश्वर के बारे में क्या सिखाता है?
परमेश्वर ने कुस्रू के द्वारा वादा किया था कि मन्दिर फिर बनेगा। यह एक प्रतिज्ञा थी, परमेश्वर का वह वचन जिसे वे निभाते हैं चाहे रास्ता कठिन हो। इस अध्याय में लगता है जैसे वह प्रतिज्ञा रुक गई, बल्कि हार गई। पर यही बाइबल की पूरी कहानी का ढंग है, परमेश्वर की योजनाएँ अक्सर रुकावटों से गुजरती हैं, पर मिटती नहीं। सालों बाद मन्दिर फिर से बनना शुरू हुआ और पूरा भी हुआ। और बहुत बाद में, यीशु मसीह ने खुद अपने बारे में कहा कि वे ही असली मन्दिर हैं, वह जगह जहाँ परमेश्वर और इंसान मिलते हैं। दुश्मनों ने उन्हें भी रोकने की कोशिश की, उन्हें मार भी डाला, पर परमेश्वर की योजना फिर भी पूरी हुई। रुकावट आखिरी शब्द नहीं होती।
बच्चे एज्रा 4 से क्या सीख सकते हैं?
अगर तुम जरुब्बाबेल की जगह होते, तो क्या तुम्हें उन लोगों को मना करना कठिन लगता? क्यों?
एज्रा 4 एक महत्वपूर्ण बाइबल कहानी क्यों है?
प्रभु, कभी-कभी हमारे अच्छे काम में भी रुकावटें आती हैं, और हमें समझ नहीं आता कि आप कहाँ हैं। हमें जरुब्बाबेल जैसी हिम्मत दीजिए कि हम सच्चाई पर टिके रहें, और हमें यह भरोसा दीजिए कि आपकी प्रतिज्ञा कभी नहीं मिटती। आमीन।

दूसरों ने क्या पाया

अंतर्दृष्टि संपादकीय पर पद 22

राजा के पत्र की आख़िरी पंक्ति देखिए: "सावधान रहो, इस बात में ढिलाई न करो।" काम रोकने में कितनी फुर्ती, कितनी तत्परता। और परमेश्वर का भवन? वह सालों तक अधूरा खड़ा रहा।

विरोध कभी सुस्त नहीं होता। पर जो काम परमेश्वर ने तुम्हें सौंपा है, उसे तुमने कब से "बाद में" कहकर टाल रखा है?

अंतर्दृष्टि संपादकीय पर पद 24

तब यरूशलेम में परमेश्वर के भवन का काम रुक गया, और वह फारस के राजा दारा के राज्य के दूसरे वर्ष तक रुका रहा।" सोलह साल। नींव पड़ी रही, दीवारें अधूरी रहीं, और लोग हर सुबह उस अधूरे काम को देखते रहे। तेरे जीवन में भी शायद कुछ ऐसा ही अधूरा पड़ा है। पर ध्यान दे, यह आयत "रुक गया" पर खत्म नहीं होती, वह एक तारीख बताती है। परमेश्वर ने रुकने का समय भी तय कर रखा था, और फिर से शुरू होने का भी।

अंतर्दृष्टि संपादकीय पर पद 3

जरुब्बाबेल और येशुअ ने मदद ठुकरा दी: "हमारे परमेश्वर के लिये भवन बनाना तुम्हारा नहीं हमारा ही काम है।" कितना कठिन रहा होगा, जब काम बड़ा था और हाथ कम। पर हर बढ़ा हुआ हाथ परमेश्वर की ओर से नहीं होता। क्या तुम्हारे जीवन में भी कोई ऐसी मदद है, जो काम तो आसान करती है, पर नींव कमज़ोर कर देती है?

अंतर्दृष्टि संपादकीय पर पद 10

पत्र में विरोधियों ने पहले अपना परिचय बड़े नामों से दिया, "महान और प्रतिष्ठित ओस्नप्पर" जिसने उन्हें लाकर सामरिया में बसाया था। ध्यान दे, ये लोग खुद उजाड़े गए और किसी और की मर्जी से बसाए गए थे। फिर भी अब दूसरों के बसने का विरोध कर रहे हैं। दर्द इंसान को कोमल भी बनाता है और कठोर भी। तेरे साथ जो हुआ, उसने तुझे किस ओर मोड़ा?

किसी अन्य आयु वर्ग की तलाश है?

हमारे पास छोटे बच्चों (3-6 वर्ष) और किशोरों (12 वर्ष और अधिक) के लिए विशेष संस्करण भी हैं।

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For parents and teachers: 7 से 12 वर्ष के उन बच्चों के लिए लिखा गया जो स्वयं पढ़ सकते हैं। पारिवारिक भक्ति और स्कूल में बाइबल पाठ के लिए उत्तम। This explanation is generated automatically by language models. While we strive for theological soundness, the software can make mistakes.

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