यहोशू 9
प्राथमिक आयु (7-12) के लिए व्याख्या और बाइबल कहानी
व्याख्या
खबर तेजी से फैल रही थी। यरीहो गिर गया, आई गिर गया, और कनान देश के राजा डर के साथ जाग उठे। उन्होंने तय किया: अलग-अलग लड़ने से कुछ नहीं होगा, हम सब मिलकर यहोशू और इस्राएल के विरुद्ध लड़ेंगे।
लेकिन गिबोन के लोगों ने कुछ और सोचा। वे लड़ना नहीं चाहते थे, क्योंकि वे समझ गए थे कि इस्राएल के पीछे कोई साधारण सेना नहीं, बल्कि परमेश्वर स्वयं हैं। तो उन्होंने चालाकी की। कल्पना करो: वे अपने गधों पर पुराने, फटे बोरे लादते हैं। मदिरा के कुप्पे ऐसे चुनते हैं जो जगह-जगह से फट गए और सीये हुए हैं। पैरों में घिसी हुई, पैबन्द लगी जूतियाँ। और रोटी? जान-बूझकर सूखी और फफूंदी लगी रोटी, जिससे लगे कि वह हफ्तों से थैले में पड़ी है।
इस भेष में वे गिलगाल की छावनी में आते हैं और कहते हैं: "हम दूर देश से आए हैं; इसलिए अब तुम हम से वाचा बाँधो।" वाचा का मतलब है एक पक्का करार, एक ऐसा वादा जिसे तोड़ा नहीं जा सकता।
इस्राएली मूर्ख नहीं थे। उन्होंने पूछा: "क्या जाने तुम हमारे मध्य में ही रहते हो?" यह ठीक सवाल था। लेकिन गिबोनियों के पास तैयार जवाब था। वे परमेश्वर के कामों की चर्चा करते हैं, मिस्र की, सीहोन और ओग की। और फिर वे अपना सबूत दिखाते हैं: देखो यह रोटी, तब गरम और ताजी थी, अब फफूंदी लगी है। देखो ये कुप्पे, ये कपड़े, ये जूतियाँ।
और अब आता है वह छोटा वाक्य जिस पर पूरा अध्याय टिका है: "तब उन पुरुषों ने यहोवा से बिना सलाह लिये उनके भोजन में से कुछ ग्रहण किया।" उन्होंने सूखी रोटी पर भरोसा किया, परमेश्वर से पूछा नहीं। यहोशू ने मेल किया, वाचा बाँधी, और प्रधानों ने शपथ खाई।
तीन दिन बाद सच्चाई सामने आ गई: ये लोग पड़ोसी हैं, बिलकुल पास रहते हैं। सारी मण्डली अपने प्रधानों पर कुड़कुड़ाने लगी। लेकिन प्रधानों ने कहा: हमने यहोवा के नाम की शपथ खाई है, अब हम उन्हें छू नहीं सकते। वादा तो झूठ के आधार पर हुआ था, फिर भी परमेश्वर का नाम उसमें लगा था, और उस नाम को हल्का करना उनके लिए अनसोचनीय था।
यहोशू ने गिबोनियों से आँख मिलाकर पूछा: तुमने क्यों छल किया? उनका जवाब ईमानदार है: "हम लोगों को तुम्हारे कारण से अपने प्राणों के लाले पड़ गए।" हमें अपनी जान का डर था। और फिर वे कहते हैं: "अब हम तेरे वश में हैं, जैसा बर्ताव तुझे भला लगे… वैसा ही व्यवहार हमारे साथ कर।"
वे जीवित रहे, पर स्वतंत्र नहीं। वे लकड़हारे और पानी भरनेवाले बने, और ध्यान दो कहाँ के लिए: परमेश्वर की वेदी के लिए, उस स्थान के लिए जिसे यहोवा चुनेंगे।
इसका अर्थ क्या है?
यहाँ दो गलतियाँ हैं, और बाइबल दोनों को छिपाती नहीं।
गिबोनियों ने झूठ बोला। पर उनका डर सच्चा था, और उनका विश्वास भी कुछ हद तक सच्चा था: वे मानते थे कि इस्राएल का परमेश्वर असली है।
इस्राएल की गलती और गहरी है। उन्होंने आँखों से देखा, हाथ से छुआ, स्वाद चखा, और परमेश्वर से एक शब्द भी नहीं पूछा। वे इसलिए धोखा खाए नहीं कि वे बुद्धिमान न थे, बल्कि इसलिए कि उन्हें लगा उन्हें पूछने की जरूरत नहीं है।
और फिर भी वे अपनी शपथ पर कायम रहे, चाहे लोग बड़बड़ाए। क्योंकि परमेश्वर के नाम पर किया गया वादा कोई खेल नहीं है।
एक बात मुझे भी पूरी तरह समझ नहीं आती: क्या यहोशू का यह करार सही था या गलत? पाठ साफ-साफ नहीं कहता। वह इतना ही कहता है कि यह जल्दबाजी में हुआ, और फिर भी परमेश्वर ने इन लोगों को अपनी वेदी के पास जगह दे दी।
जोड़ने वाला सूत्र
गौर करो: जो लोग नाश होने वाले थे, वे परमेश्वर के घर में काम करने लगे। लकड़ी काटना और पानी भरना छोटा काम है, पर वह वेदी के लिए था, उस जगह के लिए जहाँ परमेश्वर से मेल होता था।
यह पूरी बाइबल की धुन है। जो बाहर के हैं, जिनके पास कोई हक नहीं, वे परमेश्वर के पास आ जाते हैं। यीशु मसीह ने इसी काम को पूरा किया: उन्होंने अपना जीवन देकर हमें, जो अजनबी थे, परमेश्वर के घर के अंदर ले आया। और उन्होंने अपनी वाचा तब भी नहीं तोड़ी जब उसे निभाना उन्हें बहुत महँगा पड़ा। इस्राएल के प्रधानों ने अपनी शपथ की कीमत चुकाई। यीशु ने अपने वादे की कीमत क्रूस पर चुकाई।
तुम्हारे लिए
दो चीजें।
पहली: कभी-कभी हम भी "सूखी रोटी" देखकर फैसला कर लेते हैं। कोई दोस्त बहुत भरोसेमंद लगता है, कोई योजना बहुत बढ़िया लगती है, और हमें लगता है कि प्रार्थना करने की जरूरत नहीं, यह तो साफ मामला है। बड़े फैसले शांत होकर परमेश्वर के सामने रखना क
यहोशू 9 के बारे में प्रश्न
पहली बार इसके बारे में पढ़ने वाले हर किसी के लिए छोटे उत्तर।
यहोशू 9 किस विषय में है?
यहोशू 9 क्या कहता है?
यहोशू 9 हमें परमेश्वर के बारे में क्या सिखाता है?
बच्चे यहोशू 9 से क्या सीख सकते हैं?
यहोशू 9 एक महत्वपूर्ण बाइबल कहानी क्यों है?
दूसरों ने क्या पाया
गिबोनियों की फटी जूतियाँ और सूखी रोटी देखकर इस्राएलियों को लगा, सबूत तो सामने है। पर लिखा है, "तब उन पुरुषों ने उनके भोजन में से कुछ ले लिया, परन्तु यहोवा से सलाह न ली।" उन्होंने जाँच की, बस पूछा नहीं। आज भी सबसे बड़ा धोखा वहीं होता है जहाँ बात इतनी साफ़ लगती है कि प्रार्थना करना ज़रूरी ही नहीं लगता। तेरा कौन सा फ़ैसला अभी परमेश्वर से बिना पूछे तैयार खड़ा है?
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