न्यायियों 14
प्राथमिक आयु (6 से 12 वर्ष) के लिए व्याख्या और बाइबल कहानी
व्याख्या
शिमशोन एक इस्राएली था। परमेश्वर ने उसे बहुत बड़ी ताकत दी थी। एक दिन वह तिम्नाह नाम के शहर गया। वहाँ उसने एक पलिश्ती लड़की को देखा। पलिश्ती लोग इस्राएल के दुश्मन थे। फिर भी शिमशोन ने अपने माता-पिता से कहा, "मेरा विवाह उसी से करा दो।" माता-पिता ने पूछा, "क्या अपने ही लोगों में कोई लड़की नहीं है?" पर शिमशोन नहीं माना।
वे लोग तिम्नाह की ओर चल पड़े। रास्ते में अंगूर के बगीचे के पास अचानक एक जवान शेर गरजते हुए शिमशोन के सामने आ गया। क्या वह डर गया होगा? शायद एक पल के लिए हाँ। पर तभी परमेश्वर का आत्मा उस पर बल से उतरा। शिमशोन के हाथ में कोई हथियार नहीं था, फिर भी उसने शेर को ऐसे चीर डाला जैसे कोई छोटा बकरी का बच्चा हो। यह बात उसने अपने माता-पिता को नहीं बताई।
कुछ दिन बाद शिमशोन फिर उसी रास्ते से गया। उसने शेर की लाश देखने के लिए रास्ता मोड़ा। वहाँ उसे कुछ अनोखा दिखा, मधुमक्खियों का झुंड और मीठा शहद, शेर की लाश के अंदर ही। उसने हाथ से शहद निकाला, खाया और माता-पिता को भी दिया, पर उन्हें यह नहीं बताया कि यह शहद कहाँ से आया है।
फिर शिमशोन के विवाह का भोज हुआ। वहाँ तीस पलिश्ती जवान उसके साथी बने। शिमशोन ने उनके सामने एक पहेली रखी, "खानेवाले में से खाना, और बलवन्त में से मीठी वस्तु निकली।" शर्त यह थी, सात दिन में उत्तर बताओ, वरना तीस कुर्ते दोगे।
इसका क्या अर्थ है?
तीन दिन तक वे जवान पहेली नहीं समझ पाए। वे गुस्से में आ गए। उन्होंने शिमशोन की पत्नी को धमकाया, "अपने पति से उत्तर निकलवा, नहीं तो तुझे और तेरे पिता के घर को आग लगा देंगे।" पत्नी रोने लगी। वह सातों दिन रोती रही और कहती रही, "तू मुझसे प्रेम नहीं करता।" आखिरकार सातवें दिन शिमशोन हार गया और उसे पहेली का उत्तर बता दिया।
उन जवानों ने समय रहते सही उत्तर दे दिया। शिमशोन समझ गया कि किसी ने धोखा किया है। तब फिर परमेश्वर का आत्मा उस पर बल से उतरा। उसने अश्कलोन जाकर तीस पुरुषों को हराया और उनके कपड़े लेकर अपनी शर्त पूरी की। पर उसका क्रोध भड़क उठा था, और वह गुस्से में अपने घर लौट गया। इसके बाद उसकी पत्नी का विवाह किसी और से करा दिया गया।
यह कहानी हमें दिखाती है कि शिमशोन बहुत बलवान था, पर बहुत हठी भी था। वह अपनी इच्छा पर चलता था, सलाह नहीं सुनता था। फिर भी परमेश्वर ने उसे ताकत दी, क्योंकि परमेश्वर की अपनी एक बड़ी योजना थी।
समान सूत्र
पवित्रशास्त्र हमें बताता है कि यह सब परमेश्वर की ओर से था, क्योंकि वे पलिश्तियों के विरुद्ध दाँव ढूँढ़ रहे थे। शिमशोन को पता नहीं था, पर परमेश्वर अपने लोगों को बचाने की योजना बना रहे थे। बरसों बाद परमेश्वर ने एक और व्यक्ति भेजा, यीशु मसीह, जो भी बहुत बलवान थे, पर उनकी ताकत मांसपेशियों में नहीं, बल्कि प्रेम और आज्ञाकारिता में थी। शिमशोन अपनी इच्छा से चला, पर यीशु हमेशा पिता परमेश्वर की इच्छा से चले।
आपके लिए
कभी-कभी तुम्हें भी किसी बात पर बहुत ज़िद होती है, जैसे शिमशोन को हुई थी। अगली बार जब तुम्हारा मन कहे "मुझे यही चाहिए, चाहे कोई कुछ भी कहे," तो रुक जाओ। अपने माता-पिता से पूछो। परमेश्वर से पूछो। याद रखो, परमेश्वर हमारी ज़िद में भी काम कर सकते हैं, पर उनकी राह पर चलना कहीं बेहतर है।
बात करें
अगर तुम शिमशोन के माता-पिता की जगह होते, तो क्या कहते जब उसने ज़िद की?
क्या तुम्हें कभी किसी बात पर बहुत ज़िद हुई है? तब क्या हुआ था?
साथ में प्रार्थना
प्रिय परमेश्वर, धन्यवाद कि आप हमारी कहानियों में भी काम करते हैं, चाहे हम कितने भी ज़िद्दी क्यों न हों। हमें सिखाइए कि हम अपनी मर्ज़ी से नहीं, बल्कि आपकी राह पर चलें। यीशु मसीह के नाम में, आमीन।
न्यायियों 14 के बारे में प्रश्न
पहली बार इसके बारे में पढ़ने वाले हर किसी के लिए छोटे उत्तर।
न्यायियों 14 किस विषय में है?
न्यायियों 14 क्या कहता है?
न्यायियों 14 हमें परमेश्वर के बारे में क्या सिखाता है?
बच्चे न्यायियों 14 से क्या सीख सकते हैं?
न्यायियों 14 एक महत्वपूर्ण बाइबल कहानी क्यों है?
दूसरों ने क्या पाया
शिमशोन उस रास्ते पर था जो उसके माँ बाप को अच्छा नहीं लगा था, फिर भी "यहोवा का आत्मा उस पर बलपूर्वक उतरा।" पर ध्यान दे, जीत के तुरंत बाद लिखा है कि उसने अपने माता पिता को नहीं बताया कि उसने क्या किया। यहीं से छिपाने की आदत शुरू हुई, जो आगे चलकर उसे ले डूबी। परमेश्वर तुझे सामर्थ्य दे, तो उसे अकेले में छिपाकर मत रख। जो जीत किसी के साथ बाँटी नहीं जाती, वह धीरे धीरे घमंड बन जाती है।
शिमशोन का पहला दर्ज किया गया वाक्य है, "तिम्ना में मैंने एक पलिश्ती स्त्री को देखा है; इसलिए अब उससे मेरा ब्याह करा दो।" न कोई प्रार्थना, न कोई सवाल। बस देखा, और चाहा। और कहानी के अंत में पलिश्ती उसी की आँखें निकाल लेते हैं। जो आँख परमेश्वर से नहीं पूछती, वही आँख एक दिन सबसे महँगी पड़ती है। आज तेरी चाहत कहाँ से जन्म ले रही है, देखने से या माँगने से?
शिमशोन की पत्नी के सामने कोई विकल्प नहीं छोड़ा गया था। "हम तुझे तेरे पिता के घराने समेत आग में जला देंगे।" जो लोग पहेली नहीं बूझ सके, उन्होंने अपनी हार का बोझ एक डरी हुई स्त्री पर डाल दिया। सोचो, तुम्हारे ऊपर जो दबाव आज पड़ रहा है, कहीं वह किसी और की नाकामी का बोझ तो नहीं? और जो दबाव तुम किसी पर डाल रहे हो, वह किसका है?
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