जकर्याह 7
प्राथमिक आयु (7-12) के लिए व्याख्या और बाइबल कहानी
व्याख्या
जकर्याह की किताब में तारीख़ें बड़ी सावधानी से लिखी गई हैं। यह घटना "दारा राजा के चौथे वर्ष में किसलेव नामक नौवें महीने के चौथे दिन को" हुई, यानी सर्दियों के एक निश्चित दिन। इस समय इस्राएल के लोग बाबेल की बंधुआई से लौट आए थे। यरूशलेम का मंदिर, जो सत्तर साल पहले जलकर खंडहर बन गया था, फिर से बन रहा था। हथौड़े चल रहे थे, पत्थर जुड़ रहे थे, और लोगों के मन में एक सवाल उठ रहा था।
बेतेल नामक शहर से दो आदमी, शरेसेर और रेगेम्मेलेक, यरूशलेम भेजे गए। उनका सवाल था: "क्या हमें उपवास करके रोना चाहिये जैसे कि कितने वर्षों से हम पाँचवें महीने में करते आए हैं?" पाँचवाँ महीना वह महीना था जिसमें मंदिर नष्ट हुआ था। सत्तर साल से हर साल उस दिन लोग खाना छोड़ देते, रोते, शोक मनाते। पर अब जब मंदिर फिर बन रहा है, तो क्या इस दुख की रस्म को जारी रखना ज़रूरी है? यह एक ईमानदार सवाल है।
परमेश्वर का उत्तर सीधा "हाँ" या "नहीं" नहीं है। वे उलटकर एक सवाल पूछते हैं: "तब क्या तुम सचमुच मेरे ही लिये उपवास करते थे?" और फिर: जब तुम खाते-पीते हो, तो क्या वह भी अपने ही लिये नहीं करते? यानी: तुमने सत्तर साल तक रस्म निभाई, लेकिन क्या तुम्हारा मन असल में मुझ पर लगा था, या तुम अपने ही दुख में डूबे थे?
फिर परमेश्वर उन्हें याद दिलाते हैं कि पुराने भविष्यद्वक्ता क्या पुकारकर कहते रहे थे: "खराई से न्याय चुकाना, और एक दूसरे के साथ कृपा और दया से काम करना, न तो विधवा पर अंधेर करना, न अनाथों पर, न परदेशी पर, और न दीन जन पर।" और इससे भी गहरा: "न अपने-अपने मन में एक दूसरे की हानि की कल्पना करना।" परमेश्वर को केवल हाथ नहीं, मन भी चाहिए।
लोगों ने क्या किया? पाठ बिल्कुल साफ़ है और सुंदर नहीं: उन्होंने ध्यान देना न चाहा, हठ किया, अपने कानों को बन्द कर लिया, और अपने हृदय को "पत्थर सा" बना लिया। इसके बाद जो होता है, वह पढ़ना कठिन है। परमेश्वर कहते हैं: जैसे मेरे पुकारने पर उन्होंने नहीं सुना, वैसे ही उनके पुकारने पर मैं भी न सुनूँगा। और वे आँधी की तरह जातियों के बीच तितर-बितर कर दिए गए, और वह "मनोहर देश" उजाड़ पड़ा रहा।
इसका अर्थ क्या है?
यहाँ दो बातें साथ चलती हैं। पहली: परमेश्वर धार्मिक रस्मों के विरुद्ध नहीं हैं, पर वे दिखावे से खुश नहीं होते। कोई साल में एक दिन रो सकता है और बाकी 364 दिन दूसरों के साथ बेरहमी कर सकता है। परमेश्वर उस अंतर को देखते हैं। उनके लिए यह सवाल ज़्यादा बड़ा है कि तुम विधवा, अनाथ, परदेशी और गरीब के साथ कैसा व्यवहार करते हो, बजाय इसके कि तुम किस महीने में उपवास करते हो।
दूसरी बात, जो आसान नहीं है: पत्थर बने मन के परिणाम होते हैं। जब कोई बहुत लंबे समय तक कान बंद रखता है, तो सुनना ही मुश्किल हो जाता है। परमेश्वर का यह कहना कि "मैं भी न सुनूँगा" पढ़कर धक्का लगता है। मैं ईमानदारी से कहूँ: मुझे यह वाक्य आज भी कठिन लगता है, और यह पाठ इसका कोई मीठा स्पष्टीकरण नहीं देता। लेकिन एक बात ध्यान दो। यह सब जकर्याह उन लोगों को सुना रहे हैं जो लौट आए हैं। यानी परमेश्वर की चुप्पी सदा के लिए नहीं रही। वे फिर बोले।
जोड़ने वाला धागा
परमेश्वर की चाहत कभी नहीं बदली: न्याय, कृपा, दया, और एक ऐसा मन जो दूसरे की हानि की कल्पना भी न करे। यीशु मसीह ने ठीक यही परमेश्वर दिखाया। उन्होंने उन लोगों की तरफ़ हाथ बढ़ाया जिनका कोई नहीं था, और उन धर्मी दिखने वालों को चुनौती दी जिनके भीतर पत्थर था। और वह जो जकर्याह 7 में सबसे बड़ी समस्या है, यानी पत्थर जैसा हृदय, उसी को परमेश्वर बदलना चाहते हैं। यीशु के द्वारा वे पत्थर की जगह एक जीवित, सुनने वाला मन देना चाहते हैं। यीशु के कान कभी बंद नहीं होते; जो उन्हें पुकारता है, वह सुने जाते हैं।
तुम्हारे लिए
तुम भी कुछ रस्में निभाते हो: खाने से पहले प्रार्थना, रविवार को गिरजा, कभी-कभी बाइबल पढ़ना। ये अच्छी चीज़ें हैं। पर आज एक सवाल अपने आप से पूछो: यह मैं किसके लिए करता हूँ? परमेश्वर के लिए, या इसलिए कि दूसरे देख रहे हैं?
और दूसरी बात, जो और भी ठोस है। तुम्हारी कक्षा में कोई ऐसा है जिसे कोई नहीं चुनता, जिसकी भाषा अलग है, जिसके घर में मुश्किल है। परमेश्वर की "विधवा, अनाथ और परदेशी" आज वहीं बैठे हैं। कान बंद न करो। एक बार सुनना, एक बार साथ बैठना, यह परमेश्वर की नज़र में उपवास से बड़ा हो सकता है।
इस पर बात करो
जब परमेश्वर सवाल का जवाब सवाल से देते हैं, तो तुम्हें क्या लगता है, वे लोगों से क्या समझाना चाहते हैं?
"हृदय को पत्थर सा बना लेना" कैसा होता है? तुम कब किसी की बात जान-बूझकर नहीं सुनते?
मिलकर प्रार्थना
प्रभु, आप दिखावे से नहीं, मन से खुश होते हैं। मेरे भीतर जो पत्थर जैसा कठोर है, उसे नरम कीजिए। मेरे कान खोलिए, ताकि मैं आपकी और उनकी सुनूँ जिन्हें कोई नहीं सुनता। आमीन।
जकर्याह 7 के बारे में प्रश्न
पहली बार इसके बारे में पढ़ने वाले हर किसी के लिए छोटे उत्तर।
जकर्याह 7 किस विषय में है?
जकर्याह 7 क्या कहता है?
जकर्याह 7 हमें परमेश्वर के बारे में क्या सिखाता है?
बच्चे जकर्याह 7 से क्या सीख सकते हैं?
जकर्याह 7 एक महत्वपूर्ण बाइबल कहानी क्यों है?
दूसरों ने क्या पाया
वे लोग बेतेल से आए थे, एक धार्मिक सवाल लेकर: क्या हम उपवास करते रहें? उन्होंने याजकों से पूछा, पर उत्तर याजकों से नहीं आया। "तब सेनाओं के यहोवा का यह वचन मेरे पास पहुँचा:" परमेश्वर स्वयं बीच में आ गए, और उनका जवाब नियम के बारे में नहीं, मन के बारे में था। सत्तर साल से वे उपवास रख रहे थे, पर किसके लिए? कभी सोचा कि तुम्हारी लंबी आदतें असल में किसके लिए हैं?
ज़करयाह के समय लोग सत्तर साल से उपवास कर रहे थे, पाँचवें और सातवें महीने में। पर परमेश्वर उनसे एक चुभता हुआ सवाल पूछते हैं, "जब तुम खाते और पीते हो, तो क्या तुम अपने ही लिये नहीं खाते, और अपने ही लिये नहीं पीते?"
सोचिए, उपवास भी अपने लिए हो सकता है? हाँ। जब मैं रोता हूँ अपने दुख पर, अपने खोए हुए मंदिर पर, अपनी तकलीफ़ों पर, और भूल जाता हूँ कि परमेश्वर मुझसे क्या चाहते हैं, तब मेरी भक्ति भी बस मेरे इर्दगिर्द घूमने लगती है। आज खुद से पूछिए: मेरी प्रार्थना किसके लिए है?
जैसे मैं ने पुकारा, और वे नहीं सुनते थे, वैसे ही वे भी पुकारेंगे, परन्तु मैं नहीं सुनूँगा।"
कैसा गंभीर वचन। परमेश्वर वर्षों तक भविष्यद्वक्ताओं के द्वारा पुकारते रहे, पर लोग अपने कान बंद करते रहे। और जब मुसीबत आई, तब उन्होंने पुकारा, पर आकाश चुप रहा।
सोचो, आज जब वह तुझसे धीमी आवाज़ में बात करता है, तू क्या करता है? हर अनसुनी पुकार हमारे कान को थोड़ा और भारी बना देती है। आज उसकी आवाज़ सुन, कल के लिए मत टाल।
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