3 से 6 वर्ष के बच्चे के लिए

1 कुरिन्थियों 8

नन्हे और पूर्व-विद्यालय बच्चे (आयु 3-6) के लिए व्याख्या और बाइबल कहानी

बाइबल

व्याख्या

बाज़ार में एक जगह थी। वहाँ मूरतों की मूर्तियाँ खड़ी थीं। पत्थर की, सोने की, चाँदी की। वहाँ माँस भी बिकता था। वह माँस पहले मूरतों को चढ़ाया गया था।

योहन नाम का एक लड़का था। वह जानता था, मूरत कुछ भी नहीं है। केवल एक ही परमेश्वर है। पिता, जिससे सब कुछ बना। और एक ही प्रभु, यीशु मसीह।

योहन का एक दोस्त था। नाम राहुल। राहुल डरता था मूरतों से। बहुत डरता था। उसका मन कमज़ोर था, अभी तक।

एक दिन राहुल ने योहन को देखा। योहन मूरत के सामने माँस खा रहा था। राहुल का दिल काँप गया। वह सोचने लगा, "क्या मूरत सच में कुछ है?" उसका मन उलझ गया। बहुत उलझ गया।

इसका क्या अर्थ है?

जानना अच्छा है। पर जानना काफी नहीं है। योहन जानता था, माँस खाना बुरा नहीं है। भोजन परमेश्वर के पास नहीं ले जाता। न खाने से कुछ कम नहीं होता। खाने से कुछ ज़्यादा नहीं होता।

पर योहन ने सोचा राहुल के बारे में। "अगर मैं खाऊँ, राहुल दुखी हो जाएगा। उसका मन और उलझ जाएगा।" योहन ने प्रेम चुना। ज्ञान से बड़ा प्रेम।

समान सूत्र

यीशु मसीह राहुल के लिए भी मरे। राहुल कमज़ोर था, फिर भी उसके लिए मरे। इसलिए योहन ने कहा, "मैं माँस नहीं खाऊँगा। मैं अपने भाई को ठोकर नहीं खिलाऊँगा।"

यीशु ने भी ऐसा ही किया। वे ताकतवर थे। सबसे ताकतवर। फिर भी उन्होंने अपने आपको छोटा किया। कमज़ोरों के लिए, हमारे लिए।

तुम्हारे लिए

कभी तुम्हारे पास कुछ अच्छा होता है। कोई खिलौना, कोई मिठाई। पर तुम्हारा दोस्त उदास हो जाता है। तब तुम क्या करोगे?

तुम भी योहन जैसे बन सकते हो। अपने दोस्त के दिल को देखना। अपनी इच्छा से पहले, उसकी भलाई सोचना। यह प्रेम है। परमेश्वर को यह अच्छा लगता है।

आपस में बात करें

क्या तुमने कभी अपने दोस्त के लिए कुछ छोड़ा है?

योहन ने राहुल के लिए क्या किया?

साथ में प्रार्थना करें

प्रिय परमेश्वर, मुझे अपने दोस्तों से प्रेम करना सिखाइए। जैसे यीशु ने हमसे प्रेम किया। आमीन।

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1 कुरिन्थियों 8 के बारे में प्रश्न

पहली बार इसके बारे में पढ़ने वाले हर किसी के लिए छोटे उत्तर।

1 कुरिन्थियों 8 किस विषय में है?
बाज़ार में एक जगह थी। वहाँ मूरतों की मूर्तियाँ खड़ी थीं। पत्थर की, सोने की, चाँदी की। वहाँ माँस भी बिकता था। वह माँस पहले मूरतों को चढ़ाया गया था।
1 कुरिन्थियों 8 क्या कहता है?
योहन का एक दोस्त था। नाम राहुल। राहुल डरता था मूरतों से। बहुत डरता था। उसका मन कमज़ोर था, अभी तक।
1 कुरिन्थियों 8 हमें परमेश्वर के बारे में क्या सिखाता है?
जानना अच्छा है। पर जानना काफी नहीं है। योहन जानता था, माँस खाना बुरा नहीं है। भोजन परमेश्वर के पास नहीं ले जाता। न खाने से कुछ कम नहीं होता। खाने से कुछ ज़्यादा नहीं होता।
नन्हे बच्चे 1 कुरिन्थियों 8 से क्या सीख सकते हैं?
यीशु मसीह राहुल के लिए भी मरे। राहुल कमज़ोर था, फिर भी उसके लिए मरे। इसलिए योहन ने कहा, "मैं माँस नहीं खाऊँगा। मैं अपने भाई को ठोकर नहीं खिलाऊँगा।"
1 कुरिन्थियों 8 एक महत्वपूर्ण बाइबल कहानी क्यों है?
कभी तुम्हारे पास कुछ अच्छा होता है। कोई खिलौना, कोई मिठाई। पर तुम्हारा दोस्त उदास हो जाता है। तब तुम क्या करोगे?

दूसरों ने क्या पाया

अंतर्दृष्टि संपादकीय पर पद 5

यद्यपि आकाश में और पृथ्वी पर बहुत से तथाकथित ईश्वर हैं, (जैसे बहुत से ईश्वर और बहुत से प्रभु हैं)।" पौलुस इनकार नहीं करता कि ये नाम मौजूद हैं। वह बस उन्हें "तथाकथित" कहता है। आज भी बहुत से प्रभु तुझ पर हक जताते हैं, पैसा, लोगों की राय, डर। सवाल यह नहीं कि वे हैं या नहीं। सवाल यह है कि सुबह उठकर तू किसकी आवाज़ मानता है।

अंतर्दृष्टि संपादकीय पर पद 10

पौलुस यह नहीं पूछता कि तेरा ज्ञान सही है या नहीं। वह पूछता है कि तुझे कौन देख रहा है। "क्योंकि यदि कोई तुझ ज्ञानी को मूर्ति के मन्दिर में भोजन करते देखे, और वह निर्बल जन हो..." तेरी आज़ादी किसी कमज़ोर भाई के लिए रास्ता भी बन सकती है और ठोकर भी। आज कोई तुझे देखकर सीख रहा है। क्या सीख रहा है?

अंतर्दृष्टि संपादकीय पर पद 4

मूर्ति जगत में कोई वस्तु नहीं, और एक को छोड़ और कोई परमेश्वर नहीं।" पौलुस सही ज्ञान को मानता है, फिर भी आगे कहता है कि ज्ञान फुलाता है, प्रेम बनाता है। सोच, तेरा सही होना किसी कमज़ोर भाई को ठेस पहुँचा रहा है क्या? सच जानना बड़ी बात है, पर उस सच को प्रेम में थामना उससे भी बड़ी।

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For parents and teachers: विशेष रूप से 3 से 6 वर्ष के बच्चों को ज़ोर से पढ़कर सुनाने के लिए लिखा गया। इसे अपने बच्चे के साथ बातचीत की शुरुआत के रूप में उपयोग करें, एकमात्र स्रोत के रूप में नहीं। This explanation is generated automatically by language models. While we strive for theological soundness, the software can make mistakes.

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