3 से 6 वर्ष के बच्चे के लिए

तीतुस 1

नन्हे और पूर्व-विद्यालय बच्चे (आयु 3-6) के लिए व्याख्या और बाइबल कहानी

बाइबल

व्याख्या

समुद्र के बीच एक टापू था। उसका नाम था क्रेते।

चारों तरफ पानी। नीला, नीला पानी। हवा में नमक की गंध थी। लहरें किनारे पर आती थीं। छप। छप। और फिर छप।

उस टापू पर एक आदमी रहता था। उसका नाम था तीतुस।

तीतुस थोड़ा अकेला था। उसका सबसे प्यारा दोस्त पौलुस बहुत दूर था। समुद्र के उस पार।

और फिर, एक दिन… एक नाव आई। नाव में एक चिट्ठी थी। पौलुस की चिट्ठी!

तीतुस ने चिट्ठी खोली। उसने पढ़ना शुरू किया।

"मेरे प्यारे तीतुस," पौलुस ने लिखा था। "तुम मेरे बेटे जैसे हो।"

तीतुस मुस्कुराया।

पौलुस ने आगे लिखा। "उस टापू पर बहुत काम है। कुछ लोग वहाँ झूठ बोलते हैं। वे लोगों को उलटी-सीधी बातें सिखाते हैं। उनकी बात मत सुनना।"

"तुम अच्छे लोगों को ढूँढ़ो, तीतुस। हर गाँव में। ऐसे लोग जो परमेश्वर की बात सच-सच बताएँ।"

और पौलुस ने लिखा कि वे लोग कैसे होने चाहिए।

ऐसे लोग जो अपना दरवाज़ा खोलते हैं। जो मेहमान को अंदर बुलाते हैं। जो गरम रोटी बाँट देते हैं।

ऐसे लोग जो जल्दी गुस्सा नहीं होते। जो किसी को मारते नहीं। जो पैसों के पीछे नहीं दौड़ते।

ऐसे लोग जो भलाई करना चाहते हैं।

इसका क्या अर्थ है?

पर चिट्ठी में एक बात सबसे सुंदर थी।

पौलुस ने लिखा: परमेश्वर झूठ नहीं बोल सकते।

सुनो, यह कितनी बड़ी बात है। परमेश्वर कभी झूठ नहीं बोलते। कभी नहीं। एक बार भी नहीं।

जो वे कहते हैं, वह होता है। हमेशा।

बहुत, बहुत पहले परमेश्वर ने एक वादा किया था। एक वादा हमेशा के जीवन का। और परमेश्वर अपना वादा भूलते नहीं।

जोड़ने वाला धागा

तीतुस चिट्ठी पकड़कर बैठा रहा। बाहर लहरें आ रही थीं। छप। छप।

और उसे याद आया।

परमेश्वर ने बहुत पहले वादा किया था। और फिर, ठीक सही समय पर, यीशु आए।

यीशु हमें बचाते हैं। पौलुस ने चिट्ठी में यही लिखा था।

परमेश्वर ने अपना वादा पूरा किया। उन्होंने यीशु को भेज दिया।

तुम्हारे लिए

तीतुस ने चिट्ठी मोड़कर रख दी। और वह उठ खड़ा हुआ। उसे काम करना था।

पता है, तुम भी कुछ कर सकते हो। आज ही।

तुम अपना दरवाज़ा खोल सकते हो। तुम किसी को अपनी रोटी दे सकते हो। तुम सच बोल सकते हो, झूठ नहीं।

क्योंकि परमेश्वर भी सच बोलते हैं। हमेशा।

और अगर कोई तुमसे पूछे, "परमेश्वर कैसे हैं?" तो तुम कह सकते हो: "वे अच्छे हैं। और वे झूठ नहीं बोलते।"

इस पर बात करें

क्या तुम किसी को अपने घर बुलाना चाहोगे? किसको?

परमेश्वर कभी झूठ नहीं बोलते। यह सुनकर तुम्हें कैसा लगता है?

मिलकर प्रार्थना

प्रिय परमेश्वर,

आप सच बोलते हैं। हमेशा।

धन्यवाद कि आपने यीशु को भेजा।

मुझे भी सच बोलना सिखाइए।

और मुझे अच्छा बनाइए।

आमीन।

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तीतुस 1 के बारे में प्रश्न

पहली बार इसके बारे में पढ़ने वाले हर किसी के लिए छोटे उत्तर।

तीतुस 1 किस विषय में है?
चारों तरफ पानी। नीला, नीला पानी। हवा में नमक की गंध थी। लहरें किनारे पर आती थीं। छप। छप। और फिर छप।
तीतुस 1 क्या कहता है?
"मेरे प्यारे तीतुस," पौलुस ने लिखा था। "तुम मेरे बेटे जैसे हो।"
तीतुस 1 हमें परमेश्वर के बारे में क्या सिखाता है?
ऐसे लोग जो अपना दरवाज़ा खोलते हैं। जो मेहमान को अंदर बुलाते हैं। जो गरम रोटी बाँट देते हैं।
नन्हे बच्चे तीतुस 1 से क्या सीख सकते हैं?
बहुत, बहुत पहले परमेश्वर ने एक वादा किया था। एक वादा हमेशा के जीवन का। और परमेश्वर अपना वादा भूलते नहीं।
तीतुस 1 एक महत्वपूर्ण बाइबल कहानी क्यों है?
तीतुस ने चिट्ठी मोड़कर रख दी। और वह उठ खड़ा हुआ। उसे काम करना था।

दूसरों ने क्या पाया

अंतर्दृष्टि संपादकीय पर पद 6

पौलुस तीतुस को कहता है कि हर नगर में प्राचीन नियुक्त करे, और पहली कसौटी मंच नहीं, घर है: "जो निर्दोष हो, और एक ही पत्नी का पति हो, जिसके बच्चे विश्वासयोग्य हों।" कलीसिया में आपकी आवाज़ कितनी ऊँची है, यह मायने नहीं रखता। जो लोग आपके साथ रोज़ रहते हैं, वे आपके मसीह को कैसा देखते हैं? वहीं से सेवा शुरू होती है।

अंतर्दृष्टि संपादकीय पर पद 14

और यहूदियों की कथा कहानियों और उन मनुष्यों की आज्ञाओं पर मन न लगाएँ, जो सत्य से भटक जाते हैं।" गौर कीजिए, पौलुस यह नहीं कहता कि इन बातों से लड़ो, वह कहता है मन मत लगाओ। जिस पर हम ध्यान देते हैं, धीरे धीरे वही हमें आकार देता है। कहानियाँ सुनने में मीठी लगती हैं, नियम पवित्र दिखते हैं, पर दोनों मसीह की जगह ले सकते हैं। आज आपका मन सबसे ज़्यादा किस बात पर टिका है?

अंतर्दृष्टि संपादकीय पर पद 4

पौलुस तीतुस को "मेरा सच्चा पुत्र" कहता है, पर खून का रिश्ता नहीं था। रिश्ता बना "विश्वास की सहभागिता" से। कठिन क्रेते द्वीप पर अकेले छोड़े गए इस जवान को पत्र की पहली पंक्ति में ही पिता का प्यार मिलता है।

सोच, तेरे विश्वास में तुझे किसने जन्म दिया? और तू किसे अपना बेटा कहकर हौसला दे सकता है?

अंतर्दृष्टि संपादकीय पर पद 13

पौलुस तीतुस से कहता है कि कड़ी डाँट दे, पर उसका मकसद बताता है: "कि वे विश्वास में पक्के हो जाएँ।" डाँट का लक्ष्य किसी को गिराना नहीं, चंगा करना था। सोच, जिस व्यक्ति की सख़्त बात तुझे आज चुभ रही है, कहीं वह तुझे तोड़ने नहीं, तेरे विश्वास को सीधा करने के लिए कही गई हो? और तू जब सुधारता है, तेरे मन में यही चाह होती है या बस जीतने की?

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For parents and teachers: विशेष रूप से 3 से 6 वर्ष के बच्चों को ज़ोर से पढ़कर सुनाने के लिए लिखा गया। इसे अपने बच्चे के साथ बातचीत की शुरुआत के रूप में उपयोग करें, एकमात्र स्रोत के रूप में नहीं। This explanation is generated automatically by language models. While we strive for theological soundness, the software can make mistakes.

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