तीतुस 3
नन्हे और पूर्व-विद्यालय बच्चे (आयु 3-6) के लिए व्याख्या और बाइबल कहानी
व्याख्या
एक बार पौलुस नाम के एक भले आदमी थे। वे तीतुस को एक चिट्ठी लिखते थे। तीतुस उनका दोस्त था।
पौलुस ने लिखा, "लोगों से प्यार से बात करो। किसी से मत लड़ो।"
फिर पौलुस ने कुछ याद किया। बहुत पुरानी बात। उसने कहा, "हम भी पहले बुरे थे। हम एक दूसरे से बैर रखते थे।"
लेकिन फिर कुछ हुआ। कुछ बहुत सुंदर हुआ।
परमेश्वर ने अपना प्यार दिखाया। एकदम अचानक। जैसे सूरज बादलों के पीछे से निकल आता है।
पौलुस ने लिखा, "परमेश्वर ने हमें बचाया। हमारे अच्छे कामों के कारण नहीं। बस अपनी दया से।"
इसका अर्थ क्या है?
सोचो, एक बच्चा कीचड़ में गिर गया है। पूरा शरीर गंदा है। वह खुद को साफ नहीं कर सकता।
फिर कोई आता है। उसे धीरे से उठाता है। गुनगुने पानी से नहलाता है। साफ कपड़े पहनाता है।
परमेश्वर ने ऐसा ही किया। पौलुस ने लिखा, "नये जन्म के स्नान" से उसने हमें नया बनाया।
हम खुद को साफ नहीं कर सकते थे। परमेश्वर ने हमें नहलाया। धीरे से। प्यार से।
समान सूत्र
यह सब कैसे हुआ? पौलुस बताता है।
परमेश्वर ने यीशु मसीह को भेजा। यीशु के द्वारा परमेश्वर ने पवित्र आत्मा हम पर उंडेला।
जैसे कोई बड़े घड़े से पानी उंडेलता है। खूब सारा पानी। ऊपर से नीचे तक।
इस तरह परमेश्वर ने हमें बचाया। यीशु के कारण।
अब हमें एक आशा मिली है। हमेशा के जीवन की आशा। पौलुस कहता है, हम उसके वारिस बने हैं।
तुम्हारे लिए
तुमने कभी कीचड़ में हाथ गंदे किए हैं? फिर मम्मी ने हाथ धोए?
परमेश्वर भी हमें ऐसे ही धोते हैं। हमारे अंदर को।
तुम अच्छे काम कर सकते हो। किसी को खिलौना दे सकते हो। किसी से प्यार से बोल सकते हो।
लेकिन याद रखो, परमेश्वर पहले प्यार करते हैं। हम उनके प्यार के कारण अच्छे काम करते हैं।
बात करें
तुम्हें कब लगा कि तुम गंदे हो और किसी ने तुम्हें साफ किया?
परमेश्वर ने यीशु को क्यों भेजा?
साथ में प्रार्थना
प्यारे परमेश्वर,
धन्यवाद कि आपने हमें प्यार किया।
धन्यवाद कि यीशु आए।
हमें भी दूसरों से प्यार करना सिखाइए।
आमीन।
तीतुस 3 के बारे में प्रश्न
पहली बार इसके बारे में पढ़ने वाले हर किसी के लिए छोटे उत्तर।
तीतुस 3 किस विषय में है?
तीतुस 3 क्या कहता है?
तीतुस 3 हमें परमेश्वर के बारे में क्या सिखाता है?
नन्हे बच्चे तीतुस 3 से क्या सीख सकते हैं?
तीतुस 3 एक महत्वपूर्ण बाइबल कहानी क्यों है?
दूसरों ने क्या पाया
अनुग्रह की गहरी बातों के तुरंत बाद पौलुस यह लिखता है, "क्योंकि मैंने वहीं जाड़ा काटने का निश्चय किया है।" जाड़ा, यात्रा, किसको कहाँ भेजना है। विश्वास सिर्फ ऊँचे सत्यों में नहीं, ठंड की तैयारी में भी जिया जाता है। और देख, तीतुस अकेला नहीं छोड़ा गया, कोई उसकी जगह आ रहा है। तेरा काम तुझ पर टिका नहीं है।
किसी को बदनाम न करें, झगड़ालू न हों, कोमल स्वभाव के हों, और सब मनुष्यों के साथ बड़ी नम्रता के साथ रहें।" पौलुस अगली ही आयत में कारण बताता है: हम भी कभी वैसे ही थे, भटके हुए। जिस इंसान के बारे में तू आज कड़वी बात कहने जा रहा है, कल तू खुद उसी जगह खड़ा था। दया इसलिए नहीं कि वह अच्छा है, बल्कि इसलिए कि तुझ पर दया हुई।
ऐसा मनुष्य भटक गया है, और पाप करता रहता है और अपने आप को दोषी ठहराता है।" ध्यान दे, पौलुस यह नहीं कहता कि कलीसिया उसे दोषी ठहराती है। वह खुद को ठहराता है। दो बार समझाया गया, फिर भी उसने फूट को चुना। सुधार सुनने से इनकार करना सबसे चुपचाप आने वाला खतरा है। जब कोई तुझे प्रेम से टोकता है, तेरे भीतर क्या जागता है, आभार या बचाव?
पौलुस पत्री के अंत में बड़े सिद्धांतों के बाद एक छोटी सी बात कहता है: "जेनास व्यवस्थापक और अपुल्लोस को यत्न करके आगे पहुँचा दे, और देख कि उन्हें किसी वस्तु की घटी न होने पाए।" प्रेम यहाँ भाषण नहीं, सामान है। रास्ते का खर्च, खाना, जूते। सोच, आज तेरे आसपास कौन है जिसकी किसी चीज़ की घटी तू चुपचाप पूरी कर सकता है?
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