13 वर्ष और उससे बड़े किशोर के लिए

यशायाह 8

किशोर (13 वर्ष और उससे बड़े) के लिए व्याख्या और बाइबल कहानी

बाइबल

व्याख्या

यशायाह अध्याय 8 उस समय लिखा गया जब यहूदा का राजा आहाज डर से काँप रहा था। उत्तर में इस्राएल और अराम की सेनाएँ मिलकर यरूशलेम पर हमला करने की तैयारी में थीं। हर तरफ अफवाहें, डर और राजनीतिक चालें चल रही थीं। ऐसे माहौल में परमेश्वर यशायाह से कहते हैं कि वे एक बड़ी पटिया पर एक अजीब नाम लिखें, महेर्शालाल्हाशबज, जिसका अर्थ है "लूट जल्दी आती है, शिकार शीघ्र आता है।" यह कोई हल्का नाम नहीं था। यह एक चेतावनी थी, लिखी हुई, गवाहों के सामने प्रमाणित की हुई, ताकि बाद में कोई यह न कह सके कि यह सिर्फ अफवाह थी।

फिर यशायाह का अपना बेटा जन्म लेता है, और परमेश्वर उसी नाम से उसे बुलाने का आदेश देते हैं। इससे पहले कि यह बच्चा "बापू" या "माँ" बोलना सीखे, दमिश्क और सामरिया की संपत्ति अश्शूर का राजा लूट लेगा। यह भविष्यवाणी जल्द ही सच साबित हुई। परमेश्वर यहाँ एक तस्वीर खींचते हैं, शीलोह का धीरे बहने वाला सोता, यानी परमेश्वर पर भरोसा, जिसे यहूदा के लोगों ने तुच्छ समझा। इसके बदले उन्होंने अश्शूर की ताकत पर भरोसा किया। परिणाम यह होगा कि वही महानद, अश्शूर की सेना, बाढ़ की तरह उमड़ेगी और यहूदा के गले तक पहुँच जाएगी।

फिर अचानक एक नाम आता है जो पूरी किताब में गूँजता है, "इम्मानुएल", अर्थात परमेश्वर हमारे साथ। यह वही नाम है जो अध्याय 7 में भी आया था, एक चिन्ह के रूप में। यशायाह आगे कहता है कि चाहे राष्ट्र हल्ला मचाएँ, योजनाएँ बनाएँ, कमर कसें, वे सफल नहीं होंगे, क्योंकि परमेश्वर हमारे साथ हैं। फिर परमेश्वर खुद यशायाह को चेतावनी देते हैं कि वह लोगों की तरह न सोचे, न उनके डर से डरे। सेनाओं के यहोवा ही पवित्र माने जाएँ, वही भय योग्य हैं। और यहीं वह कठिन सच्चाई आती है, परमेश्वर खुद इस्राएल और यरूशलेम के लिए "ठोकर का पत्थर" और "फंदा" बन जाएँगे। जो भरोसा नहीं करते, वे उन्हीं पर गिरकर चकनाचूर होंगे।

अध्याय के अंत में यशायाह अपने चेलों के बीच शिक्षा को सुरक्षित रखने की बात करता है, क्योंकि वह जानता है कि परमेश्वर कुछ समय के लिए अपना मुख छिपाएँगे, फिर भी वह उनकी प्रतीक्षा करेगा। वह और उसके बच्चे "चिन्ह और चमत्कार" हैं। और अंत में, एक चेतावनी उन लोगों के लिए जो मरे हुओं से, ओझाओं से मार्गदर्शन माँगते हैं, जबकि जीवित परमेश्वर उनके पास ही है। जो लोग व्यवस्था और सत्य को नहीं मानते, उनके लिए आगे केवल अंधकार, भूख और क्रोध है।

इसका अर्थ क्या है?

यह अध्याय डर के बारे में है, और डर के समय हम किस पर भरोसा रखते हैं। यहूदा के लोग डरे हुए थे, इसलिए उन्होंने परमेश्वर का धीमा, भरोसेमंद सोता छोड़कर अश्शूर की ताकतवर नदी को चुना। हमें भी लगता है कि दिखने वाली, मापने वाली, तुरंत असर दिखाने वाली चीज़ें सुरक्षा देंगी, चाहे वह परीक्षा के नंबर हों, सोशल मीडिया की स्वीकृति हो, या किसी रिश्ते की गारंटी हो। परमेश्वर यहाँ साफ कहते हैं कि असली सुरक्षा किसी ताकतवर बाढ़ में नहीं, बल्कि उसी धीमे सोते में है, जो परमेश्वर पर निर्भरता है।

और फिर यह गहरी बात आती है, परमेश्वर खुद कुछ लोगों के लिए चट्टान हैं जिस पर वे टिकते हैं, और कुछ लोगों के लिए वही चट्टान ठोकर बन जाती है। परमेश्वर तटस्थ नहीं रहते। वे खुद निर्णायक बिंदु हैं। यह बात आरामदायक नहीं है, पर सच्ची है।

समान सूत्र

यह "इम्मानुएल" वाला नाम यूँ ही नहीं है। मत्ती 1:23 में इसे सीधे यीशु मसीह के जन्म से जोड़ा गया है। परमेश्वर हमारे साथ, यह वादा किसी एक राजनीतिक संकट के लिए नहीं था, यह उस दिन तक पहुँचता है जब परमेश्वर खुद मनुष्य बनकर हमारे बीच रहने आए। रोमियों 9:32,33 और मत्ती 21:44 में पौलुस और यीशु खुद इस "ठोकर के पत्थर" की बात को अपने ऊपर लागू करते हैं। यीशु मसीह वही पत्थर हैं। जो उन पर भरोसा करता है, वह कभी लज्जित नहीं होगा, पर जो उन्हें ठुकराता है, वही पत्थर उसके लिए विनाश बन जाता है। इब्रानियों 2:13 में भी यशायाह के शब्द, "देख, मैं और जो लड़के यहोवा ने मुझे सौंपे हैं", यीशु मसीह के मुख से उद्धृत किए गए हैं, जो खुद को और विश्वासियों को एक परिवार के रूप में पहचानते हैं।

तुम्हारे लिए

तुम्हारी जिंदगी में भी ऐसे पल आते हैं जब डर हावी हो जाता है, भविष्य की अनिश्चितता, रिश्तों का टूटना, परीक्षा का दबाव, या बस यह खालीपन कि कोई तुम्हें सचमुच समझता नहीं। उस समय सबसे आसान रास्ता लगता है किसी "अश्शूर" को पकड़ लेना, कोई ऐसी चीज़ जो तुरंत ताकत और भरोसा देने का दिखावा करे। पर यह अध्याय पूछता है, क्या तुम धीमे सोते पर भरोसा करने को तैयार हो? क्या तुम उस परमेश्वर की प्रतीक्षा कर सकते हो जो कभी-कभी चुप रहता है, पर कभी झूठा नहीं होता? यह आसान नहीं है। यशायाह खुद कहता है कि वह प्रतीक्षा करेगा, भले ही परमेश्वर ने अपना मुख छिपाया हो। यही परिपक्व विश्वास है, चीखने वाला नहीं, टिके रहने वाला।

बात करें

क्या तुम्हारी जिंदगी में कोई ऐसी "अश्शूर की नदी" है, कोई चीज़ जिस पर तुम परमेश्वर से ज़्यादा भरोसा करते हो ताकि सुरक्षित महसूस कर सको?

यीशु मसीह एक "ठोकर का पत्थर" भी हैं और एक "शरणस्थान" भी। इस दोहरेपन के बारे में तुम क्या सोचते हो, क्या यह तुम्हें डराता है या राहत देता है?

साथ प्रार्थना करें

प्रभु, जब डर हमें घेर लेता है और हर तरफ से शोर उठता है, तब हमें याद दिलाइए कि आप हमारे साथ हैं। हमें उस धीमे, भरोसेमंद सोते पर टिके रहना सिखाइए, भले ही वह धीमा लगे। हमें यीशु मसीह में वह चट्टान दिखाइए जिस पर हम बिना लज्जित हुए खड़े रह सकें। आमीन।

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यशायाह 8 के बारे में प्रश्न

पहली बार इसके बारे में पढ़ने वाले हर किसी के लिए छोटे उत्तर।

यशायाह 8 किस विषय में है?
यशायाह अध्याय 8 उस समय लिखा गया जब यहूदा का राजा आहाज डर से काँप रहा था। उत्तर में इस्राएल और अराम की सेनाएँ मिलकर यरूशलेम पर हमला करने की तैयारी में थीं। हर तरफ अफवाहें, डर और राजनीतिक चालें चल रही थीं। ऐसे माहौल में परमेश्वर यशायाह से कहते हैं कि वे एक बड़ी पटिया पर एक अजीब नाम लिखें, महेर्शालाल्हाशबज, जिसका अर्थ है "लूट जल्दी आती है, शिकार शीघ्र आता है।" यह कोई हल्का नाम नहीं था। यह एक चेतावनी थी, लिखी हुई, गवाहों के सामने प्रमाणित की हुई, ताकि बाद में कोई यह न कह सके कि यह सिर्फ अफवाह थी।
यशायाह 8 क्या कहता है?
फिर अचानक एक नाम आता है जो पूरी किताब में गूँजता है, "इम्मानुएल", अर्थात परमेश्वर हमारे साथ। यह वही नाम है जो अध्याय 7 में भी आया था, एक चिन्ह के रूप में। यशायाह आगे कहता है कि चाहे राष्ट्र हल्ला मचाएँ, योजनाएँ बनाएँ, कमर कसें, वे सफल नहीं होंगे, क्योंकि परमेश्वर हमारे साथ हैं। फिर परमेश्वर खुद यशायाह को चेतावनी देते हैं कि वह लोगों की तरह न सोचे, न उनके डर से डरे। सेनाओं के यहोवा ही पवित्र माने जाएँ, वही भय योग्य हैं। और यहीं वह कठिन सच्चाई आती है, परमेश्वर खुद इस्राएल और यरूशलेम के लिए "ठोकर का पत्थर" और "फंदा" बन जाएँगे। जो भरोसा नहीं करते, वे उन्हीं पर गिरकर चकनाचूर होंगे।
यशायाह 8 हमें परमेश्वर के बारे में क्या सिखाता है?
यह अध्याय डर के बारे में है, और डर के समय हम किस पर भरोसा रखते हैं। यहूदा के लोग डरे हुए थे, इसलिए उन्होंने परमेश्वर का धीमा, भरोसेमंद सोता छोड़कर अश्शूर की ताकतवर नदी को चुना। हमें भी लगता है कि दिखने वाली, मापने वाली, तुरंत असर दिखाने वाली चीज़ें सुरक्षा देंगी, चाहे वह परीक्षा के नंबर हों, सोशल मीडिया की स्वीकृति हो, या किसी रिश्ते की गारंटी हो। परमेश्वर यहाँ साफ कहते हैं कि असली सुरक्षा किसी ताकतवर बाढ़ में नहीं, बल्कि उसी धीमे सोते में है, जो परमेश्वर पर निर्भरता है।
किशोर यशायाह 8 से क्या सीख सकते हैं?
यह "इम्मानुएल" वाला नाम यूँ ही नहीं है। मत्ती 1:23 में इसे सीधे यीशु मसीह के जन्म से जोड़ा गया है। परमेश्वर हमारे साथ, यह वादा किसी एक राजनीतिक संकट के लिए नहीं था, यह उस दिन तक पहुँचता है जब परमेश्वर खुद मनुष्य बनकर हमारे बीच रहने आए। रोमियों 9:32,33 और मत्ती 21:44 में पौलुस और यीशु खुद इस "ठोकर के पत्थर" की बात को अपने ऊपर लागू करते हैं। यीशु मसीह वही पत्थर हैं। जो उन पर भरोसा करता है, वह कभी लज्जित नहीं होगा, पर जो उन्हें ठुकराता है, वही पत्थर उसके लिए विनाश बन जाता है। इब्रानियों 2:13 में भी यशायाह के शब्द, "देख, मैं और जो लड़के यहोवा ने मुझे सौंपे हैं", यीशु मसीह के मुख से उद्धृत किए गए हैं, जो खुद को और विश्वासियों को एक परिवार के रूप में पहचानते हैं।
यशायाह 8 एक महत्वपूर्ण बाइबल कहानी क्यों है?
क्या तुम्हारी जिंदगी में कोई ऐसी "अश्शूर की नदी" है, कोई चीज़ जिस पर तुम परमेश्वर से ज़्यादा भरोसा करते हो ताकि सुरक्षित महसूस कर सको?

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