12 वर्ष और उससे अधिक आयु के किशोर के लिए

यूहन्ना 12

किशोर (12 वर्ष और अधिक) के लिए व्याख्या और बाइबल कहानी

बाइबल

व्याख्या

यूहन्ना 12 उस हफ़्ते की शुरुआत है जिसके बाद सब कुछ बदल जाता है। फसह से छह दिन पहले यीशु बैतनिय्याह में हैं, उसी घर में जहाँ लाज़र बैठा है, वही लाज़र जिसे उन्होंने कब्र से बाहर बुलाया था। भोजन चल रहा है। मार्था सेवा कर रही है। और तभी मरियम आधा सेर जटामासी का बहुमूल्य इत्र लेकर यीशु के पाँवों पर उलट देती है और अपने बालों से उनके पाँव पोंछती है। पूरा घर सुगन्ध से भर जाता है।

यहूदा इस्करियोती का हिसाब तुरंत तैयार है: तीन सौ दीनार, यानी लगभग एक मज़दूर की सालभर की कमाई। "यह इत्र बेचकर गरीबों को क्यों न दिया गया?" यूहन्ना बिना कोई परदा रखे बताता है कि यह सवाल करुणा से नहीं, चोरी से आया था। यहूदा थैली रखता था और उसमें से निकाल लेता था। यीशु मरियम का बचाव करते हैं: "उसे मेरे गाड़े जाने के दिन के लिये रहने दे।" वह इत्र कोई फ़िज़ूलख़र्ची नहीं था, वह एक अन्त्येष्टि की तैयारी थी। मरियम ने, जाने या अनजाने, जो समझा वह भीड़ नहीं समझ पाई।

बाहर लोग जमा हो रहे हैं, आधे यीशु के लिए और आधे लाज़र को देखने के लिए। और यहीं एक ठंडी सी पंक्ति आती है: प्रधान याजकों ने लाज़र को भी मार डालने की सम्मति की। एक जीवित गवाह इतना असुविधाजनक हो सकता है कि उसे मिटा देना आसान लगे।

अगले दिन यीशु यरूशलेम में प्रवेश करते हैं। लोग खजूर की डालियाँ लेकर निकलते हैं और चिल्लाते हैं, "होशाना! धन्य इस्राएल का राजा।" खजूर की डालियाँ जीत का प्रतीक थीं, लोग एक विजयी राजा चाहते थे जो रोम को खदेड़ दे। लेकिन यीशु घोड़े पर नहीं, गदहे के बच्चे पर बैठते हैं, जैसा भविष्यवक्ता ने लिखा था। चेले तब कुछ नहीं समझे; समझ बाद में आई।

फिर कुछ यूनानी फिलिप्पुस के पास आते हैं: "हम यीशु से भेंट करना चाहते हैं।" इस पर यीशु का जवाब हैरान करता है। वे मुलाक़ात का समय तय नहीं करते, वे कहते हैं: "वह समय आ गया है, कि मनुष्य के पुत्र कि महिमा हो।" और महिमा की उनकी परिभाषा यह है: गेहूँ का दाना जब तक भूमि में पड़कर मर नहीं जाता, अकेला रहता है; मरने के बाद ही बहुत फल लाता है।

और फिर यीशु अपना भीतर खोल देते हैं: "अब मेरा जी व्याकुल हो रहा है।" वे इस घड़ी से बचने की प्रार्थना का विचार बोलते हैं और उसे छोड़ देते हैं: "परन्तु मैं इसी कारण इस घड़ी को पहुँचा हूँ। हे पिता अपने नाम की महिमा कर।" आकाश से आवाज़ आती है। भीड़ में कोई कहता है बादल गरजा, कोई कहता है स्वर्गदूत बोला। एक ही आवाज़, और लोग उसे अपने-अपने ढंग से खारिज कर देते हैं।

अध्याय के अंत में यूहन्ना एक कड़वी सच्चाई लिखता है: इतने चिन्ह देखने के बाद भी लोगों ने विश्वास नहीं किया, ठीक जैसा यशायाह ने कहा था। और सरदारों में से बहुतों ने विश्वास किया, पर खुलकर नहीं माना, क्योंकि आराधनालय से निकाले जाने का डर था। कारण साफ़ लिखा है: "मनुष्यों की प्रशंसा उनको परमेश्वर की प्रशंसा से अधिक प्रिय लगती थी।" यीशु आख़िर में पुकारकर कहते हैं कि वे जगत को दोषी ठहराने नहीं, उद्धार करने आए हैं, और वे ज्योति होकर आए हैं ताकि कोई अंधकार में न रहे।

इसका अर्थ क्या है?

इस अध्याय में चार तरह के लोग हैं, और चारों आज भी मौजूद हैं। मरियम, जो हिसाब लगाना बंद कर देती है और सब कुछ उलट देती है। यहूदा, जो धार्मिक भाषा में अपना स्वार्थ छिपाता है। भीड़, जो यीशु को चाहती है, लेकिन अपनी शर्तों पर, अपनी उम्मीदों के मुताबिक़। और वे सरदार, जो भीतर से मानते हैं पर बाहर से चुप रहते हैं, क्योंकि लोगों की राय परमेश्वर की राय से भारी पड़ती है।

यीशु इनमें से किसी की भी अपेक्षा पूरी नहीं करते। वे महिमा को मरने के रूप में परिभाषित करते हैं। वे राजा बनते हैं, पर गदहे पर। वे कहते हैं कि जो अपने प्राण को कसकर पकड़े रखता है, वही उसे खो देता है। यह कोई प्रेरणादायक वाक्य नहीं, यह उनके अपने रास्ते का विवरण है, और उस रास्ते पर चलने का बुलावा।

और ध्यान दो कि यीशु घबराहट को छिपाते नहीं। "अब मेरा जी व्याकुल हो रहा है" उन्हीं होंठों से निकलता है जो कहते हैं "हे पिता अपने नाम की महिमा कर।" आज्ञाकारिता का मतलब भावशून्य होना नहीं है। इसका मतलब है काँपते हुए भी उस दिशा में क़दम रखना।

जोड़ने वाला सूत्र

यह पूरा अध्याय एक ही बिंदु की ओर इशारा करता है: क्रूस। "मैं यदि पृथ्वी पर से ऊँचे पर चढ़ाया जाऊँगा, तो सब को अपने पास खीचूँगा।" यूहन्ना खुद बता देता है कि यीशु किस मृत्यु की बात कर रहे थे। ऊँचे उठाया जाना यहाँ सिंहासन नहीं, कीलें हैं, और वही उनका सिंहासन है।

पुराने नियम के धागे यहाँ आकर मिलते हैं: भजन 118 का "प्रभु के नाम से आता है", सिय्योन की बेटी का गदहे पर आने वाला राजा, यशायाह का ठुकराया गया सेवक, दानिय्येल का सर्वदा रहने वाला मनुष्य का पुत्र। मरियम का इत्र उस देह पर पहले से डाला जा चुका है जो कुछ दिनों में कब्र में रखी जाएगी, और जो उस कब्र को खाली छोड़ देगी। लाज़र, जो कब्र से बाहर चलकर आया, इस बात का जीवित चिन्ह है कि यह कहानी मृत्यु पर ख़त्म नहीं होती।

तुम्हारे लिए

आयत 43 पर रुको: "मनुष्यों की प्रशंसा उनको परमेश्वर की प्रशंसा से अधिक प्रिय लगती थी।" ये लोग नास्तिक नहीं थे। वे विश्वास करते थे। वे बस यह क़ीमत नहीं चुकाना चाहते थे कि लोग क्या कहेंगे। तुम्हारी दुनिया में यह क़ीमत स्क्रीन पर वसूल होती है: कौन तुम्हें अजीब समझेगा, किस ग्रुप में तुम्हारा मज़ाक बनेगा, कौन-सा पक्ष लेना सुरक्षित है। ईमानदारी से पूछो, तुम्हारे विश्वास का कितना हिस्सा सार्वजनिक है और कितना छिपा हुआ?

दूसरी बात मरियम से सीखो। वह वह चीज़ देती है जिसे रोककर रखना ज़्यादा समझदारी होती। और उसे इसके लिए ताना भी मिलता है, आध्यात्मिक तर्क के साथ। तुम्हारे जीवन में भी कुछ ऐसा है जो सबसे कीमती है: समय, प्रतिभा, वह साल जिसे तुम अपने करियर के लिए बचाकर रखना चाहते हो। यीशु के लिए उसे उलट देना बर्बादी नहीं लगेगा, हालाँकि किसी को लग सकता है।

और गेहूँ के दाने वाली बात को हल्के में न लो। यह मानता है कि कुछ मरना पड़ेगा, तुम्हारी छवि, तुम्हारा नियंत्रण, यह ज़िद कि ज़िंदगी तुम्हारे मन के मुताबिक़ चले। जो सुरक्षित मिट्टी के ऊपर पड़ा रहता है, वह अकेला रह जाता है।

बातचीत के लिए

तुम्हारे विश्वास का कोई हिस्सा है जिसे तुम जानबूझकर छिपाकर रखते हो? किसके सामने, और सच में डर किस चीज़ का है?

यीशु कहते हैं कि जो अपने प्राण को प्रिय जानता है वह उसे खो देता है। तुम्हारी ज़िंदगी में वह एक चीज़ क्या है जिसे तुम सबसे कसकर पकड़े हुए हो?

मिलकर प्रार्थना

प्रभु यीशु, आपने घबराहट में भी पिता की महिमा चुनी। हमें वह साहस दें कि हम लोगों की प्रशंसा से ज़्यादा परमेश्वर की प्रशंसा चाहें। जो हम कसकर पकड़े हैं, उसे खोलने में हमारी मदद करें। आप ज्योति हैं; हमें अंधकार में चलने न दें। आमीन।

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यूहन्ना 12 के बारे में प्रश्न

पहली बार इसके बारे में पढ़ने वाले हर किसी के लिए छोटे उत्तर।

यूहन्ना 12 किस विषय में है?
यूहन्ना 12 उस हफ़्ते की शुरुआत है जिसके बाद सब कुछ बदल जाता है। फसह से छह दिन पहले यीशु बैतनिय्याह में हैं, उसी घर में जहाँ लाज़र बैठा है, वही लाज़र जिसे उन्होंने कब्र से बाहर बुलाया था। भोजन चल रहा है। मार्था सेवा कर रही है। और तभी मरियम आधा सेर जटामासी का बहुमूल्य इत्र लेकर यीशु के पाँवों पर उलट देती है और अपने बालों से उनके पाँव पोंछती है। पूरा घर सुगन्ध से भर जाता है।
यूहन्ना 12 क्या कहता है?
फिर कुछ यूनानी फिलिप्पुस के पास आते हैं: "हम यीशु से भेंट करना चाहते हैं।" इस पर यीशु का जवाब हैरान करता है। वे मुलाक़ात का समय तय नहीं करते, वे कहते हैं: "वह समय आ गया है, कि मनुष्य के पुत्र कि महिमा हो।" और महिमा की उनकी परिभाषा यह है: गेहूँ का दाना जब तक भूमि में पड़कर मर नहीं जाता, अकेला रहता है; मरने के बाद ही बहुत फल लाता है।
यूहन्ना 12 हमें परमेश्वर के बारे में क्या सिखाता है?
यीशु इनमें से किसी की भी अपेक्षा पूरी नहीं करते। वे महिमा को मरने के रूप में परिभाषित करते हैं। वे राजा बनते हैं, पर गदहे पर। वे कहते हैं कि जो अपने प्राण को कसकर पकड़े रखता है, वही उसे खो देता है। यह कोई प्रेरणादायक वाक्य नहीं, यह उनके अपने रास्ते का विवरण है, और उस रास्ते पर चलने का बुलावा।
किशोर यूहन्ना 12 से क्या सीख सकते हैं?
आयत 43 पर रुको: "मनुष्यों की प्रशंसा उनको परमेश्वर की प्रशंसा से अधिक प्रिय लगती थी।" ये लोग नास्तिक नहीं थे। वे विश्वास करते थे। वे बस यह क़ीमत नहीं चुकाना चाहते थे कि लोग क्या कहेंगे। तुम्हारी दुनिया में यह क़ीमत स्क्रीन पर वसूल होती है: कौन तुम्हें अजीब समझेगा, किस ग्रुप में तुम्हारा मज़ाक बनेगा, कौन-सा पक्ष लेना सुरक्षित है। ईमानदारी से पूछो, तुम्हारे विश्वास का कितना हिस्सा सार्वजनिक है और कितना छिपा ह
यूहन्ना 12 एक महत्वपूर्ण बाइबल कहानी क्यों है?
यीशु कहते हैं कि जो अपने प्राण को प्रिय जानता है वह उसे खो देता है। तुम्हारी ज़िंदगी में वह एक चीज़ क्या है जिसे तुम सबसे कसकर पकड़े हुए हो?

दूसरों ने क्या पाया

अंतर्दृष्टि संपादकीय पर पद 13

खजूर की डालियाँ काटना आसान था। रास्ते में बिछाना, ऊँची आवाज़ में पुकारना, "हे इस्राएल के राजा!" यह सब मुफ़्त था। पर उसी हफ़्ते वही सड़कें खाली हो गईं, और वही राजा अकेला क्रूस तक चला।

अपने आप से पूछ: मैं यीशु की जय बोल रहा हूँ, या उस यीशु की जो मेरी उम्मीदों के हिसाब से चले? भीड़ में गाना सस्ता है। पीछे चलना महँगा।

अंतर्दृष्टि संपादकीय पर पद 45

यीशु ने यह बात पुकारकर कही, ठीक उस समय जब लोग उन्हें ठुकरा रहे थे: "जो मुझे देखता है, वह मेरे भेजनेवाले को देखता है।" सोचो, परमेश्वर कैसा है यह जानने के लिए तुम्हें आकाश की ओर टकटकी नहीं लगानी है। यीशु के चेहरे को देखो, जो रोते हैं, छूते हैं, क्षमा करते हैं। तुम्हारे मन में परमेश्वर की जो तस्वीर है, क्या वह यीशु जैसी है?

अंतर्दृष्टि संपादकीय पर पद 22

फिलिप्पुस अकेले यीशु के पास नहीं जाता। वह पहले अन्द्रियास को बताता है, और फिर दोनों मिलकर जाते हैं। यूनानी लोग यीशु से मिलना चाहते थे, पर फिलिप्पुस झिझका। शायद उसे लगा कि यह निर्णय अकेले लेना कठिन है।

क्या तुम्हारे जीवन में कोई अन्द्रियास है? कोई जिसके साथ चलकर तुम यीशु के पास किसी को ला सको? कभी कभी विश्वास अकेले नहीं, संगति में मजबूत होता है।

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