12 वर्ष और उससे अधिक आयु के किशोर के लिए

रोमियों 16

किशोर (12 वर्ष और अधिक) के लिए व्याख्या और बाइबल कहानी

बाइबल

व्याख्या

रोमियों की यह आख़िरी अध्याय पहली नज़र में सिर्फ़ एक नामों की सूची लगती है। पौलुस फीबे का ज़िक्र करता है, जो किंख्रिया की कलीसिया की सेविका थी और यह पत्री लेकर रोम आई थी। फिर आते हैं प्रिस्का और अक्विला, जिन्होंने पौलुस के प्राण के लिए अपना सिर जोखिम में डाला था। मरियम, त्रूफैना, त्रूफोसा, पिरसिस, ये सब स्त्रियाँ जिन्होंने "बहुत परिश्रम" किया, यह शब्द बार-बार दोहराया गया है। अन्द्रुनीकुस और यूनियास, जो पौलुस से पहले ही मसीही बन गए थे और कैद में उसके साथ रहे। कुल मिलाकर लगभग छब्बीस लोगों के नाम आते हैं, हर एक के साथ कुछ न कुछ व्यक्तिगत बात जुड़ी है।

फिर पौलुस अचानक स्वर बदलता है। वह चेतावनी देता है कि कुछ लोग हैं जो फूट डालते हैं, ठोकर खिलाते हैं, चिकनी-चुपड़ी बातों से सीधे मन के लोगों को बहका देते हैं। ऐसे लोग प्रभु मसीह की नहीं, अपने पेट की सेवा करते हैं। इसके बाद वह एक वादा देता है, शान्ति का परमेश्वर शैतान को उनके पाँवों के नीचे कुचल देगा, यह उत्पत्ति 3:15 की उस पुरानी भविष्यवाणी की गूंज है जहाँ पहली बार कहा गया था कि स्त्री का वंश साँप का सिर कुचलेगा।

पत्री का अंत एक भव्य स्तुति से होता है। पौलुस उस भेद की बात करता है जो सनातन से छिपा रहा और अब यीशु मसीह में प्रगट हुआ है, ताकि सब जातियाँ विश्वास से आज्ञा माननेवाली हो जाएँ। और अंत में एकमात्र बुद्धिमान परमेश्वर की महिमा युगानुयुग होती रहे, यही अंतिम शब्द है।

इसका क्या अर्थ है?

यह सूची इतनी लंबी क्यों है? क्योंकि पौलुस के लिए कलीसिया कोई अमूर्त विचार नहीं थी, कोई संगठन या ब्रांड नहीं थी। यह असली लोग थे, जिनका नाम, चेहरा, इतिहास और परिश्रम था। कोई जेल में साथ रहा था, कोई अपनी माँ जैसा था, कोई अपना जीवन जोखिम में डाल चुका था। विश्वास हमेशा किसी न किसी के साथ, किसी शरीर में, किसी समुदाय में जीया जाता है। यह अकेले का मामला नहीं है।

और फिर वह चेतावनी। पौलुस इतनी गर्मजोशी से नाम लेने के बाद अचानक सावधान करता है, क्योंकि प्यार और सतर्कता साथ चलते हैं। जो लोग सच्चाई को तोड़-मोड़कर पेश करते हैं, वे अक्सर सबसे ज़्यादा आकर्षक और नरम आवाज़ में बोलते हैं। यह आज भी सच है। हर चमकदार बात सच नहीं होती।

बड़ी कहानी से संबंध

यह पूरा अध्याय एक बड़ी कहानी के आख़िरी पन्ने जैसा है। जो भेद सनातन से छिपा था, वह अब यीशु मसीह में खुल गया है, यह इंगीत करता है कि पूरा इतिहास एक दिशा में बढ़ रहा था, यीशु की ओर। और वह वादा कि शैतान कुचला जाएगा, वह उत्पत्ति की पहली किताब से जुड़ता है, जहाँ मानवता के गिरने के बाद परमेश्वर ने पहली बार आशा का वचन दिया था। यह वचन सदियों तक चलता रहा, और अब पौलुस रोम की कलीसिया को बताता है कि यह वचन उनके अपने जीवन में पूरा हो रहा है। हर नाम, हर सेवा, हर परिश्रम इस बड़ी कहानी का हिस्सा है, जिसका केंद्र यीशु मसीह हैं।

तुम्हारे लिए

अपने बारे में सोचो। तुम्हारे विश्वास की कहानी में किन नामों का ज़िक्र होगा? कौन तुम्हारे लिए जोखिम उठाता है, कौन तुम्हारे साथ परिश्रम करता है? यह अध्याय याद दिलाता है कि विश्वास स्क्रीन के पीछे अकेले नहीं जीया जाता, यह किसी असली कलीसिया में, असली रिश्तों में जीया जाता है, जहाँ लोग एक-दूसरे को नाम से जानते हैं। अगर तुम्हारे विश्वास में कोई नहीं है जो तुम्हें इतना गहराई से जानता हो, तो यह सोचने की बात है।

और वह चेतावनी तुम्हारे लिए भी है। तुम्हारे आसपास बहुत आवाज़ें हैं जो चिकनी-चुपड़ी बातें करती हैं, सोशल मीडिया पर, दोस्तों में, कभी-कभी चर्च में भी। पौलुस कहता है, भलाई के लिए बुद्धिमान बनो, बुराई के लिए भोले नहीं। इसका मतलब है सोचना, परखना, आँख बंद करके किसी बात को मान न लेना, चाहे वह कितनी भी आकर्षक क्यों न लगे।

चर्चा करें

तुम्हारी ज़िंदगी में विश्वास किन असली लोगों के साथ जुड़ा है, और क्या तुम्हें किसी ऐसे समुदाय की ज़रूरत महसूस होती है जो पौलुस के वर्णन जैसा हो?

आजकल कौन सी "चिकनी-चुपड़ी बातें" तुम्हें सबसे ज़्यादा आकर्षित करती हैं, और तुम उन्हें कैसे परखते हो?

साथ में प्रार्थना

परमेश्वर, धन्यवाद कि विश्वास कोई अकेला रास्ता नहीं है। हमें ऐसे लोग दीजिए जो हमारे साथ परिश्रम करें, और हमें बुद्धिमानी दीजिए कि हम सच्चाई और झूठ में फ़र्क कर सकें। हमारे जीवन में वही भेद खुलता रहे जो यीशु मसीह में प्रगट हुआ है। आपकी महिमा युगानुयुग होती रहे। आमीन।

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रोमियों 16 के बारे में प्रश्न

पहली बार इसके बारे में पढ़ने वाले हर किसी के लिए छोटे उत्तर।

रोमियों 16 किस विषय में है?
रोमियों की यह आख़िरी अध्याय पहली नज़र में सिर्फ़ एक नामों की सूची लगती है। पौलुस फीबे का ज़िक्र करता है, जो किंख्रिया की कलीसिया की सेविका थी और यह पत्री लेकर रोम आई थी। फिर आते हैं प्रिस्का और अक्विला, जिन्होंने पौलुस के प्राण के लिए अपना सिर जोखिम में डाला था। मरियम, त्रूफैना, त्रूफोसा, पिरसिस, ये सब स्त्रियाँ जिन्होंने "बहुत परिश्रम" किया, यह शब्द बार-बार दोहराया गया है। अन्द्रुनीकुस और यूनियास, जो पौलुस से पहले ही मसीही बन गए थे और कैद में उसके साथ रहे। कुल मिलाकर लगभग छब्बीस लोगों के नाम आते हैं, हर एक के साथ कुछ न कुछ व्यक्तिगत बात जुड़ी है।
रोमियों 16 क्या कहता है?
पत्री का अंत एक भव्य स्तुति से होता है। पौलुस उस भेद की बात करता है जो सनातन से छिपा रहा और अब यीशु मसीह में प्रगट हुआ है, ताकि सब जातियाँ विश्वास से आज्ञा माननेवाली हो जाएँ। और अंत में एकमात्र बुद्धिमान परमेश्वर की महिमा युगानुयुग होती रहे, यही अंतिम शब्द है।
रोमियों 16 हमें परमेश्वर के बारे में क्या सिखाता है?
और फिर वह चेतावनी। पौलुस इतनी गर्मजोशी से नाम लेने के बाद अचानक सावधान करता है, क्योंकि प्यार और सतर्कता साथ चलते हैं। जो लोग सच्चाई को तोड़-मोड़कर पेश करते हैं, वे अक्सर सबसे ज़्यादा आकर्षक और नरम आवाज़ में बोलते हैं। यह आज भी सच है। हर चमकदार बात सच नहीं होती।
किशोर रोमियों 16 से क्या सीख सकते हैं?
अपने बारे में सोचो। तुम्हारे विश्वास की कहानी में किन नामों का ज़िक्र होगा? कौन तुम्हारे लिए जोखिम उठाता है, कौन तुम्हारे साथ परिश्रम करता है? यह अध्याय याद दिलाता है कि विश्वास स्क्रीन के पीछे अकेले नहीं जीया जाता, यह किसी असली कलीसिया में, असली रिश्तों में जीया जाता है, जहाँ लोग एक-दूसरे को नाम से जानते हैं। अगर तुम्हारे विश्वास में कोई नहीं है जो तुम्हें इतना गहराई से जानता हो, तो यह सोचने की बात है।
रोमियों 16 एक महत्वपूर्ण बाइबल कहानी क्यों है?
तुम्हारी ज़िंदगी में विश्वास किन असली लोगों के साथ जुड़ा है, और क्या तुम्हें किसी ऐसे समुदाय की ज़रूरत महसूस होती है जो पौलुस के वर्णन जैसा हो?

दूसरों ने क्या पाया

अंतर्दृष्टि संपादकीय पर पद 22

पौलुस बोल रहे थे, और तिरतियुस लिख रहे थे। पूरी पत्री में बस एक पंक्ति उसकी अपनी है, "मुझ तिरतियुस का, जो यह पत्री लिखनेवाला हूँ, प्रभु में तुम को नमस्कार।" पर्दे के पीछे की यह सेवा परमेश्वर ने अपने वचन में हमेशा के लिए दर्ज कर ली। तेरा जो काम कोई नहीं गिनता, वह उसकी नज़र से छूटा नहीं है।

अंतर्दृष्टि संपादकीय पर पद 9

उरबानुस को, जो मसीह में हमारा सहकर्मी है, और मेरे प्रिय इस्तखुस को नमस्कार।" इन दोनों के बारे में बाइबल और कुछ नहीं बताती। कोई उपदेश नहीं, कोई चमत्कार नहीं, बस नाम। फिर भी पौलुस उन्हें "हमारा सहकर्मी" कहता है, मेरा नहीं, हमारा। तेरी सेवा भी शायद किसी को दिखती न हो। पर जो तुझे जानता है, वह तेरा नाम भूलता नहीं।

अंतर्दृष्टि संपादकीय पर पद 18

पौलुस चेतावनी देता है: "क्योंकि ऐसे लोग हमारे प्रभु मसीह की सेवा नहीं करते, परन्तु अपने पेट की; और चिकनी चुपड़ी बातों से भोले भाले लोगों के मन में धोखा देते हैं।" ध्यान दे, धोखा कठोर आवाज़ में नहीं आता, वह मीठी बातों में आता है। जो बात तेरे कान को सहलाती है पर तुझे क्रूस की ओर कभी नहीं ले जाती, उससे सावधान रह।

अंतर्दृष्टि संपादकीय पर पद 25

पौलुस पूरी पत्री के अंत में यह नहीं कहता कि "अब तुम अपने आप को मजबूत करो।" वह कहता है, "अब जो तुम्हें मेरे सुसमाचार के अनुसार स्थिर कर सकता है।" स्थिर करने वाला परमेश्वर है, तू नहीं। जिस दिन तेरा विश्वास डगमगाता है, याद रख, तुझे थामे रखने की जिम्मेदारी उसी की है जिसने युगों से छिपा भेद तुझ पर खोल दिया।

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