बाइबल व्याख्या

2 इतिहास 19

बाइबल
यह अध्याय JL Group के सहयोग से संभव हुआ है

पाठ

युद्ध से लौटते ही यहोशापात को दर्शी येहू का सामना करना पड़ता है: दुष्ट अहाब से मित्रता क्यों? फिर भी परमेश्वर उसकी अच्छाइयों को स्वीकारते हैं। इसके बाद यहोशापात प्रजा के बीच जाकर उन्हें परमेश्वर की ओर फेरता है, और यहूदा के गढ़वाले नगरों तथा यरूशलेम में न्यायी नियुक्त करता है, उन्हें चेतावनी देकर कि वे मनुष्य के लिए नहीं, यहोवा के लिए न्याय करते हैं।

मर्म

यह अध्याय एक असहज सच्चाई सामने रखता है: भक्त होना और मूर्ख निर्णय लेना, दोनों एक साथ हो सकते हैं। यहोशापात ने अशेरों को नाश किया, मन परमेश्वर की खोज में लगाया, फिर भी अहाब के साथ गठबंधन बनाकर परमेश्वर के क्रोध को भड़काया। येहू का वचन इसलिए इतना पैना है क्योंकि वह न पूरी निंदा करता है, न पूरी प्रशंसा। परमेश्वर हमारे जीवन को टुकड़ों में देखते हैं और हर टुकड़े का हिसाब लेते हैं। और फिर, इसी राजा को वे न्याय-व्यवस्था खड़ी करने के लिए उठाते हैं। पश्चाताप कोई भावुक क्षण नहीं, वह ढाँचा बनाता है, संस्थाएँ गढ़ता है, नीति में उतरता है।

सूत्र

पूरे बाइबिल में एक धारा बहती है: परमेश्वर का न्याय पक्षपात नहीं जानता। यहोशापात के शब्द, "हमारे परमेश्वर यहोवा में कुछ कुटिलता नहीं है, और न वह किसी का पक्ष करता और न घूस लेता है," रोमियों 2:11 में गूँजते हैं। जो न्यायी यहाँ खड़े होते हैं, वे उस महान न्यायी की छाया हैं जो एक दिन "जीवितों और मरे हुओं का न्याय" करेगा। मसीह में हम देखते हैं कि यह निष्पक्ष न्यायी स्वयं दोष उठाने के लिए न्याय-कटघरे में खड़ा हुआ। इसलिए मसीही न्याय केवल नियम नहीं, वह क्रूस से रंगा हुआ न्याय है, जहाँ सत्य और दया मिलते हैं।

दर्पण

यह पाठ हमारे रोज़मर्रा के छोटे "अहाब-सहयोगों" पर उँगली रखता है। वह सहकर्मी जिसकी नैतिकता संदिग्ध है, पर जिसके साथ काम करने से पदोन्नति निकट है। वह व्यापारिक साझेदार जिसके तरीके गंदे हैं, पर मुनाफ़ा भला है। वह मित्रता जो हमें धीरे-धीरे उन बातों के प्रति सुन्न कर रही है जिनसे कभी हमारा मन विचलित होता था। येहू यह नहीं पूछता कि यहोशापात कितना धार्मिक है, वह पूछता है कि उसने किसकी सहायता की। हमारी भक्ति सुबह की प्रार्थना में नापी नहीं जाती, वह उन गठबंधनों में नापी जाती है जिन्हें हम "व्यावहारिक" कहकर उचित ठहराते हैं। और यदि आप कहीं अगुवाई करते हैं, चाहे कक्षा में, चाहे परिवार में, चाहे मण्डली में, तो यह अध्याय आपको झकझोरता है: क्या आपने न्याय को "मनुष्य के लिये नहीं, यहोवा के लिये" करने की गंभीरता समझी है? पैसे का हिसाब, बच्चों के बीच पक्षपात, कर्मचारियों के साथ व्यवहार, ये सब न्याय-आसन हैं।

मुख्य पात्र

यहोशापात एक जटिल व्यक्तित्व है, और यही उसे विश्वसनीय बनाता है। वह डाँट सुनकर बचाव नहीं करता, न वह टूटकर बिखर जाता है। वह उठता है और काम पर लग जाता है। पहले वह स्वयं बेर्शेबा से एप्रैम के पहाड़ों तक जाता है, ज़मीन पर, लोगों के बीच। फिर वह ढाँचा खड़ा करता है, न्यायियों को नियुक्त करता है, उन्हें प्रशिक्षित करता है। उसकी चेतावनी में उसकी अपनी कहानी बोलती है: "सोचो कि क्या करते हो।" जो व्यक्ति स्वयं गलत गठबंधन में फँसा था, वह अब दूसरों को सावधान करता है। यही सच्चा पश्चाताप है, जो अपनी गिरावट से सीखकर औरों को गिरने से बचाता है। उसकी अंतिम पंक्ति, "हियाव बाँधकर काम करो," केवल उपदेश नहीं, यह उसका अपना अनुभव है।

अंतरपाठ

येहू के पिता हनानी ने पहले आसा राजा को भी ऐसी ही डाँट दी थी, और आसा ने उसे बंदीगृह में डाल दिया था। यहोशापात का उत्तर अलग है, वह सुनता है और पलटता है। यह अंतर मायने रखता है। फिर व्यवस्थाविवरण 16:19 की गूँज सुनिए, जहाँ मूसा कहते हैं कि न्यायी घूस न लें और पक्षपात न करें, क्योंकि "घूस बुद्धिमानों की आँखें अंधी कर देती है।" यहोशापात कोई नई बात नहीं कह रहा, वह भूली हुई व्यवस्था को पुनर्जीवित कर रहा है। और मीका 6:8 इस पूरे अध्याय का सारांश जैसा लगता है: न्याय करना, कृपा से प्रेम रखना, और परमेश्वर के साथ नम्रता से चलना। यहोशापात यही सिखा रहा है, संस्थागत रूप में।

प्रोफ़ाइल

इतिहास की पुस्तक के मूल पाठक वे यहूदी थे जो बंधुवाई से लौटे थे, राज्य खो चुके थे, और सोच रहे थे कि परमेश्वर की प्रजा कैसे जिए। उनके लिए यह अध्याय एक नक्शा था। उन्होंने देखा कि एक राजा जिसने ठोकर खाई, फिर भी परमेश्वर ने उसे उठाकर न्याय-व्यवस्था का शिल्पकार बनाया। यह उनके लिए आशा थी: गिरना अंत नहीं है। साथ ही यह चुनौती थी, क्योंकि अब उनके पास राजा नहीं था, पर याजक और अगुए थे जिन्हें निष्पक्ष न्याय करना था। "यहोवा के विषय दोषी न हो" यह वाक्य उनके कानों में गूँजता होगा, क्योंकि वे जानते थे कि अन्याय ही उनकी बंधुवाई

2 Chronicles में और गहराई से जानें

चुनी हुई पुस्तकें जो इस बाइबल पुस्तक को और गहराई से समझाती हैं।

The Message of Chronicles

Michael Wilcock

Shows why the retold history of Chronicles is a book of hope.

2 Chronicles: An Introduction and Commentary

Martin Selman

A trusted Tyndale commentary: compact, careful and clear on every passage.

1 and 2 Chronicles

Andrew Hill

Explains what it meant then, and bridges it honestly to life now.

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2 Chronicles 19 के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

इस बाइबल अंश के बारे में सामान्य प्रश्नों के त्वरित उत्तर।

2 इतिहास 19 का क्या अर्थ है?
युद्ध से लौटते ही यहोशापात को दर्शी येहू का सामना करना पड़ता है: दुष्ट अहाब से मित्रता क्यों? फिर भी परमेश्वर उसकी अच्छाइयों को स्वीकारते हैं। इसके बाद यहोशापात प्रजा के बीच जाकर उन्हें परमेश्वर की ओर फेरता है, और यहूदा के गढ़वाले नगरों तथा यरूशलेम में न्यायी नियुक्त करता है, उन्हें चेतावनी देकर कि वे मनुष्य के लिए नहीं, यहोवा के लिए न्याय करते हैं।
2 इतिहास 19 किस विषय में है?
यह अध्याय एक असहज सच्चाई सामने रखता है: भक्त होना और मूर्ख निर्णय लेना, दोनों एक साथ हो सकते हैं। यहोशापात ने अशेरों को नाश किया, मन परमेश्वर की खोज में लगाया, फिर भी अहाब के साथ गठबंधन बनाकर परमेश्वर के क्रोध को भड़काया। येहू का वचन इसलिए इतना पैना है क्योंकि वह न पूरी निंदा करता है, न पूरी प्रशंसा। परमेश्वर हमारे जीवन को टुकड़ों में देखते हैं और हर टुकड़े का हिसाब लेते हैं। और फिर, इसी राजा को वे न्याय-व्यवस्था खड़ी करने के लिए उठाते हैं। पश्चाताप कोई भावुक क्षण नहीं, वह ढाँचा बनाता है, संस्थाएँ गढ़ता है, नीति में उतरता है।
2 इतिहास 19 का ऐतिहासिक संदर्भ क्या है?
पूरे बाइबिल में एक धारा बहती है: परमेश्वर का न्याय पक्षपात नहीं जानता। यहोशापात के शब्द, "हमारे परमेश्वर यहोवा में कुछ कुटिलता नहीं है, और न वह किसी का पक्ष करता और न घूस लेता है," रोमियों 2:11 में गूँजते हैं। जो न्यायी यहाँ खड़े होते हैं, वे उस महान न्यायी की छाया हैं जो एक दिन "जीवितों और मरे हुओं का न्याय" करेगा। मसीह में हम देखते हैं कि यह निष्पक्ष न्यायी स्वयं दोष उठाने के लिए न्याय-कटघरे में खड़ा हुआ। इसलिए मसीही न्याय केवल नियम नहीं, वह क्रूस से रंगा हुआ न्याय है, जहाँ सत्य और दया मिलते हैं।
2 इतिहास 19 हमें परमेश्वर के स्वभाव के बारे में क्या सिखाता है?
यह पाठ हमारे रोज़मर्रा के छोटे "अहाब-सहयोगों" पर उँगली रखता है। वह सहकर्मी जिसकी नैतिकता संदिग्ध है, पर जिसके साथ काम करने से पदोन्नति निकट है। वह व्यापारिक साझेदार जिसके तरीके गंदे हैं, पर मुनाफ़ा भला है। वह मित्रता जो हमें धीरे-धीरे उन बातों के प्रति सुन्न कर रही है जिनसे कभी हमारा मन विचलित होता था। येहू यह नहीं पूछता कि यहोशापात कितना धार्मिक है, वह पूछता है कि उसने किसकी सहायता की। हमारी भक्ति सुबह की
2 इतिहास 19 आज भी कैसे प्रासंगिक है?
यहोशापात एक जटिल व्यक्तित्व है, और यही उसे विश्वसनीय बनाता है। वह डाँट सुनकर बचाव नहीं करता, न वह टूटकर बिखर जाता है। वह उठता है और काम पर लग जाता है। पहले वह स्वयं बेर्शेबा से एप्रैम के पहाड़ों तक जाता है, ज़मीन पर, लोगों के बीच। फिर वह ढाँचा खड़ा करता है, न्यायियों को नियुक्त करता है, उन्हें प्रशिक्षित करता है। उसकी चेतावनी में उसकी अपनी कहानी बोलती है: "सोचो कि क्या करते हो।" जो व्यक्ति स्वयं गलत गठबंधन में फँसा था, वह अब दूसरों को सावधान करता है। यही सच्चा पश्चाताप है, जो अपनी गिरावट से सीखकर औरों को गिरने से बचाता है। उसकी अंतिम पंक्ति, "हियाव बाँधकर काम करो," केवल उपदेश नहीं, यह उसका अपना अनुभव है।
हमारे साझेदारों के सहयोग से संभव

2 Chronicles 19 पर समुदाय क्या साझा करता है

इस अंश पर पाठकों और संपादकीय टीम से अंतर्दृष्टि, प्रार्थनाएँ और धन्यवाद।

प्रार्थना संपादकीय पर पद 7

पिता, तू न पक्षपात करता है और न घूस से बदलता है, तेरा न्याय हमेशा सच्चा है। मुझे भी ऐसा ही बना। जहाँ मैं किसी को उसके रूप या रुतबे के कारण ऊँचा या नीचा आँकता हूँ, वहाँ मेरा मन बदल दे। मेरे फैसले तेरे भय में हों, ईमानदारी से हों।

प्रार्थना संपादकीय पर पद 8

हे प्रभु, जैसे यहोशापात ने न्याय करने के लिए विश्वासयोग्य लोग ठहराए, वैसे ही मुझे भी अपने हर निर्णय में सच्चाई और तेरे भय के साथ चलना सिखा। जहाँ भी मुझे किसी की सुनवाई करनी हो, वहाँ मेरा मन निष्पक्ष रहे और मेरी बातें तेरे वचन से मेल खाएँ।

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