2 कुरिन्थियों 12:13
पाठ
पौलुस एक चुभता हुआ सवाल पूछता है: बाकी कलीसियाओं के मुकाबले तुम्हें आखिर किस चीज़ में कम मिला? कोई चिन्ह कम नहीं, कोई सामर्थ्य का काम कम नहीं, कोई धीरज कम नहीं। बस एक ही फर्क है, और वह यह कि "मैंने तुम पर अपना भार न रखा"। उसने कुरिन्थ की कलीसिया से अपने भरण-पोषण का खर्च नहीं माँगा, उन पर आर्थिक बोझ नहीं डाला। और फिर वह वाक्य आता है जिसमें व्यंग्य की धार साफ सुनाई देती है: "मेरा यह अन्याय क्षमा करो।" यानी, अगर तुम्हें मुफ्त में सेवा मिलना ही मेरा अपराध है, तो ठीक है, मुझे माफ कर दो। यह क्षमायाचना नहीं, यह आईना है जो वह उनके सामने रख रहा है।
मर्म
इस एक वाक्य के नीचे अनुग्रह का पूरा तर्क धड़क रहा है। कुरिन्थ के लोगों ने पौलुस के मुफ्त देने को उसकी कमज़ोरी का सबूत मान लिया था; उनकी दुनिया में जो शिक्षक अपनी कीमत नहीं वसूलता, वह सस्ता माना जाता था। पौलुस जानबूझकर यही करता है, क्योंकि सुसमाचार की प्रकृति ही ऐसी है: जो बिना दाम के मिलता है, वही सबसे महँगा है। परमेश्वर हमारे साथ ठीक यही करते हैं, और हमारा मन ठीक यही नहीं पचा पाता। हम बदले में कुछ देकर रिश्ता बराबर करना चाहते हैं, ताकि कर्ज़ न रहे। पौलुस उन्हें यह सुविधा नहीं देता। उसका "क्षमा करो" असल में यह कहता है कि तुम्हारी नाराज़गी दान की रकम को लेकर नहीं, बल्कि मुफ्त में पाए गए प्रेम को लेकर है। यही अनुग्रह की चोट है।
सूत्र
यह छोटा सा वाक्य उस बड़ी कहानी से जुड़ा है जिसमें परमेश्वर हमेशा पहले देते हैं और बिना शर्त देते हैं। मन्ना मुफ्त गिरा, जमा करने पर सड़ गया। भूमि इस्राएल को मुफ्त मिली, कमाई हुई नहीं। और अंत में मसीह स्वयं आए, जिन्होंने कुछ वसूला नहीं, बल्कि अपने आप को खर्च कर दिया। पौलुस का सेवकाई-ढंग उसकी अपनी शैली नहीं, वह सुसमाचार का आकार है। इसीलिए अगली ही आयत में वह कहता है, "मैं तुम्हारी सम्पत्ति नहीं, वरन् तुम ही को चाहता हूँ।" यही मसीह की भाषा है। परमेश्वर हमारी सेवा, हमारा चढ़ावा, हमारी उपयोगिता नहीं चाहते; वे हमें चाहते हैं। जो इंजील मुफ्त नहीं है, वह इंजील नहीं है, और जो सेवक कीमत वसूलता है, वह अनजाने में क्रूस की खबर को झुठला देता है।
आईना
अब ईमानदारी से पूछिए: आपको मुफ्त में पाना अच्छा लगता है या असहज करता है? किसी ने आपकी मदद की और आपने तुरंत सोचा, अब इसे कैसे लौटाऊँ, ताकि हिसाब बराबर हो जाए। यह विनम्रता नहीं, यह घमंड का शालीन रूप है। हम कर्ज़दार होना बर्दाश्त नहीं कर पाते, क्योंकि कर्ज़दार होने का मतलब है नीचे खड़ा होना। कुरिन्थ के लोग यही नहीं कर पाए, और इसलिए उन्होंने पौलुस के प्रेम को शक में बदल दिया, जैसा आयत 16 दिखाती है: "चतुराई से तुम्हें धोखा देकर फँसा लिया।" जिसे हम चुका नहीं सकते, उसे हम संदिग्ध बना देते हैं। यही हम परमेश्वर के साथ भी करते हैं, जब हम अपनी प्रार्थना, सेवा और नैतिकता को चुपचाप किश्तों की तरह जमा करते हैं।
आज का एक काम: उस एक व्यक्ति का नाम कागज़ पर लिखिए जिसने आपके लिए कुछ किया और आप कभी उसे लौटा नहीं सके, और उसे अभी एक संदेश भेजकर बिना कोई एहसान लौटाए सिर्फ धन्यवाद कहिए।
अंतर्पाठ
पौलुस पहले भी यह बात कह चुका है: "यदि हमने तुम्हारे लिये आत्मिक वस्तुएँ बोईं, तो क्या यह कोई बड़ी बात है कि तुम्हारी शारीरिक वस्तुओं की फसल काटें?" वहाँ वह अपने अधिकार को साबित करता है और फिर उसे छोड़ देता है, ठीक वैसे ही जैसे यहाँ। अधिकार होना और उसका उपयोग न करना, यही मसीह के मन का चिन्ह है। दूसरी ओर फिलिप्पी की कलीसिया से उसने खुशी से दान लिया, क्योंकि वहाँ रिश्ता स्वस्थ था। तो नियम यह नहीं कि सेवक कभी न ले; नियम यह है कि प्रेम सौदा न बने। कुरिन्थ में लेने का मतलब होता संरक्षक-आश्रित का रिश्ता, और पौलुस ने वह जंजीर पहनने से इनकार कर दिया।
श्रोता
कुरिन्थ की कलीसिया में अमीर संरक्षक थे, ऐसे लोग जो भोजन, कमरा और पैसा देकर किसी शिक्षक को अपने अधीन कर लेते थे। उनके कानों में पौलुस का इनकार अपमान जैसा लगा: तुमने हमारा दान लेने लायक हमें समझा ही नहीं। साथ ही उनके बीच आए "बड़े से बड़े प्रेरितों" ने खूब पैसा और सम्मान लिया था, और उसी से अपनी हैसियत साबित की थी। इसलिए पौलुस का तम्बू सिलकर कमाना उन्हें घटिया लगा। जब वे यह आयत सुनते होंगे, तो उन्हें चुभा होगा, क्योंकि पौलुस ने उनकी नाराज़गी को उलटकर उनके सामने रख दिया: तुम्हारी शिकायत यह है कि तुम्हें प्रेम मुफ्त मिला।
संदर्भ
यह पत्र लगभग 55-56 ईस्वी का है, मकिदुनिया से लिखा गया, पौलुस की तीसरी यात्रा के दौरान। कुरिन्थ एक व्यापारिक बंदरगाह-नगर था, नई दौलत, नई महत्वाकांक्षा, और वक्ताओं की खुली प्रतियोगिता वाला शहर, जहाँ भाषण बेचकर जीना सम्मानजनक पेशा था। पौलुस और उस कलीसिया के बीच रिश्ता टूटने के कगार पर था; बाहरी शिक्षक आए थे जिन्होंने उसकी प्रेरिताई पर सवाल उठाया। अध्याय 10 से 13 तक वह मजबूरन अपना बचाव करता है, पर हर बार अपनी कमज़ोरी की ओर मुड़ जाता है। आयत 13 उसी तनाव का शिखर है: वह तीसरी बार आने वाला है, और पहले से ही साफ कर देता है कि इस बार भी वह उनकी सम्पत्ति नहीं, उन्हें ही चाहता है।
चिंतन
आपके जीवन में वह कौन सा रिश्ता है जहाँ आप चुपचाप हिसाब बराबर रखने की कोशिश कर रहे हैं, और उसे छोड़ देने में आपको किस बात का डर लगता है?
अगर परमेश्वर आपसे आपकी सेवा नहीं, बल्कि आपको ही चाहते हैं, तो आपकी आज की प्रार्थना किस तरह बदलेगी?
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2 Corinthians 12:13 के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
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2 कुरिन्थियों 12:13 का क्या अर्थ है?
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2 कुरिन्थियों 12:13 हमें परमेश्वर के स्वभाव के बारे में क्या सिखाता है?
2 कुरिन्थियों 12:13 आज भी कैसे प्रासंगिक है?
2 Corinthians 12 पर समुदाय क्या साझा करता है
इस अंश पर पाठकों और संपादकीय टीम से अंतर्दृष्टि, प्रार्थनाएँ और धन्यवाद।
पौलुस उन लोगों से यह कह रहा है जिन्होंने उसकी नीयत पर शक किया था: "मैं तुम्हारी आत्माओं के लिये बहुत आनन्द से खर्च करूँगा, वरन् आप भी खर्च हो जाऊँगा।" खर्च करना यानी अपना देना, खर्च हो जाना यानी खुद ही चुक जाना। और वह यह कम प्रेम पाकर भी करता रहा। सोचो, क्या तुम किसी को तब भी प्रेम दे पाओगे जब बदले में कुछ न लौटे?
पौलुस अपनी प्रेरिताई का प्रमाण देते हुए पहले चमत्कारों की सूची नहीं गिनाता। वह कहता है, "प्रेरित के लक्षण भी तुम्हारे बीच में सब प्रकार के धीरज सहित, चिह्नों, और अद्भुत कामों, और सामर्थ्य के कामों के द्वारा दिखाए गए।" सबसे पहले धीरज। जिन लोगों ने उसे ठुकराया, उन्हीं के बीच टिके रहना ही उसका सबसे बड़ा चिह्न था। आज तुम्हारी गवाही शायद किसी अचरज में नहीं, उस जगह पर डटे रहने में छिपी है जहाँ से भागने का मन करता है।
पौलुस के पास स्वर्ग तक पहुँचने का अनुभव था, फिर भी वह उसके बारे में ऐसे बोलता है जैसे किसी और की बात हो। अपने लिए वह बस यही रखता है: "केवल अपनी निर्बलताओं के विषय में घमण्ड करूँगा।" सोचो, तुम अपनी पहचान किससे बनाते हो? अपने सबसे ऊँचे आध्यात्मिक पल से, या उस जगह से जहाँ तुम्हें मसीह की ज़रूरत है?
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