बाइबल व्याख्या

प्रेरितों के काम 3:6

बाइबल

पाठ

सुन्दर फाटक पर बैठा वह भिखारी हाथ बढ़ाए हुए है, और उसकी आँखों में वही आशा है जो हर दिन जागती है: शायद आज कुछ सिक्के मिल जाएँ। पतरस उसकी ओर ध्यान से देखता है और पहले वह कहता है जो उसके पास नहीं है: "चाँदी और सोना तो मेरे पास है नहीं।" यह इनकार नहीं, बल्कि रास्ता साफ करना है। फिर वह वही देता है जो सचमुच उसके पास है, और वह कोई वस्तु नहीं बल्कि एक नाम है: "जो मेरे पास है, वह तुझे देता हूँ; यीशु मसीह नासरी के नाम से चल फिर।" माँगा गया था भीख, दिया गया पैरों का बल। आदमी ने हथेली फैलाई थी, परमेश्वर ने उसका पूरा शरीर लौटा दिया।

मूल बात

यहाँ दो खालीपन आमने-सामने खड़े हैं। एक भिखारी की जेब खाली है, और एक प्रेरित की जेब भी खाली है। पतरस के पास चढ़ावे के लिए सिक्के तक नहीं, फिर भी वह देने वाले की तरह बोलता है। यही अनुग्रह का ढाँचा है: परमेश्वर का राज्य उन हाथों से बाँटा जाता है जिनके पास अपना कुछ नहीं। पतरस कोई शक्ति नहीं बेचता, वह एक नाम पुकारता है, और बाइबल में नाम का अर्थ है उस व्यक्ति की जीवित उपस्थिति और अधिकार। इसलिए बाद में वह साफ कहता है कि "हमने अपनी सामर्थ्य या भक्ति से इसे चलने फिरने योग्य" नहीं बनाया। जो पैर जन्म से कभी नहीं चले, उनमें बल आना केवल चंगाई नहीं, सृष्टि का काम है: वही परमेश्वर जो शून्य से बनाते हैं, टूटे को फिर से गढ़ते हैं। और यह भिक्षा से कहीं बड़ा है, क्योंकि सिक्के आदमी को फाटक पर बैठाए रखते, जबकि यह नाम उसे उठाकर मन्दिर के भीतर ले जाता है।

जोड़ने वाला सूत्र

"यीशु मसीह नासरी" पतरस का चुना हुआ पूरा नाम है, और उसमें गाँव का नाम जुड़ा रहना महत्वपूर्ण है। जिस व्यक्ति को कुछ हफ्ते पहले नासरत का बताकर तुच्छ समझा गया और सलीब पर चढ़ाया गया, उसी के नाम में अब जीवन बहता है। पतरस स्वयं इसी अध्याय में इस धागे को खींचता है: परमेश्वर ने "अपने सेवक यीशु की महिमा की", और वही वाचा जो अब्राहम से बाँधी गई थी, अब फल दे रही है, "तेरे वंश के द्वारा पृथ्वी के सारे घराने आशीष पाएँगे।" यानी यह चंगाई कोई अलग-थलग चमत्कार नहीं, बल्कि सदियों पुराने वादे का एक टुकड़ा है जो समय के भीतर उतर आया। भविष्यद्वक्ताओं ने जिस दिन की बात की थी, जब लँगड़े हिरन की तरह कूदेंगे, उसका पहला बीज सुन्दर फाटक पर उगता है। राज्य आ चुका है, अभी पूरा नहीं, पर सचमुच।

दर्पण

हममें से अधिकतर लोग चाँदी और सोने की भाषा में सोचते हैं। मदद का मतलब है पैसा, समाधान, सिफारिश, सही आदमी का फोन नंबर। और जब ये चीज़ें हमारे पास नहीं होतीं, तो हम चुप हो जाते हैं, आँख चुरा लेते हैं, दूसरी गली से निकल जाते हैं, ठीक वैसे ही जैसे रोज़ हज़ारों लोग उस फाटक से निकलते थे। पतरस पहले देखता है, फिर कहता है "हमारी ओर देख!" यह मामूली बात नहीं; दरिद्रता का सबसे गहरा घाव अनदेखा रह जाना है। आपके दफ्तर में, गली में, परिवार में कोई है जिसे आप वर्षों से देखते हैं पर सचमुच देखा नहीं। आपके पास उसकी समस्या का हल शायद न हो, पर मसीह का नाम आपके पास है। आज किसी ऐसे व्यक्ति का नाम कागज़ पर लिखिए जिसे आप रोज़ देखते हैं पर कभी नाम से नहीं पुकारा, और आज ही उसे नाम लेकर अभिवादन कीजिए।

प्रश्न

तो फिर आज हर लँगड़ा क्यों नहीं चलता? यह सवाल टालना बेईमानी होगी, खासकर उनके लिए जो वर्षों से बीमार बच्चे के सिरहाने प्रार्थना करते आए हैं। ध्यान दीजिए, यीशु स्वयं इसी मन्दिर में आते-जाते रहे और यह आदमी तब भी फाटक पर बैठा था; चंगाई अब आई, तब नहीं। इसका मतलब है कि समय परमेश्वर के हाथ में है, हमारे विश्वास की मात्रा के हाथ में नहीं। पतरस कोई तकनीक नहीं जानता जिसे दोहराया जा सके; वह उस नाम का सेवक है, मालिक नहीं। और यह टीस बनी रहती है। पर इसी अध्याय में एक वादा भी है कि मसीह तब तक स्वर्ग में रहेंगे जब तक "वह सब बातों का सुधार न कर ले।" अभी जो हुआ है, वह नमूना है; पूरा भुगतान बाद में आता है। इस बीच हम प्रतीक्षा करते हैं, और प्रतीक्षा भी विश्वास का ही रूप है।

पृष्ठभूमि

घटना यरूशलेम के मन्दिर में, दोपहर बाद तीन बजे, शाम की बलि और प्रार्थना के समय की है। यह दिन का सबसे भीड़भाड़ वाला घंटा था, भिक्षा माँगने के लिए सबसे अच्छा समय, क्योंकि प्रार्थना के साथ दान देना धर्मपरायणता का हिस्सा माना जाता था। भिखारी को हर दिन उठाकर "सुन्दर" फाटक पर बिठाया जाता था; वह अपने आप वहाँ तक भी नहीं पहुँच सकता था। और यह व्यंग्य गहरा है: शरीर की कमी वाले लोग मन्दिर के भीतरी आँगनों से दूर रखे जाते थे, तो सबसे सुन्दर दरवाज़ा उसके लिए दीवार था, रास्ता नहीं। पतरस और यूहन्ना अभी भी यहूदी धर्मजीवन के भीतर ही चल रहे हैं, मन्दिर में जाते हैं, प्रार्थना के समय का पालन करते हैं। नई बात उनका धर्म नहीं, उनका अधिकार है।

श्रोता

लूका जिनके लिए लिख रहा है, वे मसीह के बाद की पहली पीढ़ी के पाठक हैं, जिनमें बहुत से गैर-यहूदी भी थे और जो शायद यह सोचते थे कि यह छोटा-सा आंदोलन किस अधिकार से खड़ा है। उन्हें इस दृश्य में एक बात तुरंत सुनाई देती जो हमसे छूट जाती है: यरूशलेम के सबसे पवित्र स्थान की चौखट पर, उसी शहर में जहाँ यीशु को मारा गया था, उनका नाम खुलेआम पुकारा जा रहा है और वह काम करता है। यह सिर्फ करुणा की कहानी नहीं, यह एक दावा है। जिन्होंने उन्हें ठुकराया था, वे अब उसी नाम के फल के सामने खड़े हैं। और जो लोग खुद हाशिये पर थे, उनके लिए यह सन्देश था कि परमेश्वर का राज्य फाटक के बाहर बैठे आदमी से शुरू होता है, भीतर बैठे अधिकारियों से नहीं।

चिंतन

आपके पास जो "चाँदी और सोना" नहीं है, उसकी कमी का बहाना बनाकर आपने हाल में किसे कुछ देने से रोक लिया?

यदि यीशु का नाम केवल प्रार्थना के अंत का शब्द न होकर सचमुच अधिकार होता, तो इस सप्ताह आप किस स्थिति में अलग तरह से बोलते?

Acts में और गहराई से जानें

चुनी हुई पुस्तकें जो इस बाइबल पुस्तक को और गहराई से समझाती हैं।

The Message of Acts

John Stott

Stott's classic on how the gospel crossed every boundary on earth.

Acts For Everyone, Part 1

N.T. Wright

The church's explosive beginnings, explained with energy and care.

Acts: An Introduction and Commentary

I. Howard Marshall

A trusted Tyndale commentary: compact, careful and clear on every passage.

Acts

Ajith Fernando

Explains what it meant then, and bridges it honestly to life now.

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Acts 3:6 के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

इस बाइबल अंश के बारे में सामान्य प्रश्नों के त्वरित उत्तर।

प्रेरितों के काम 3:6 का क्या अर्थ है?
सुन्दर फाटक पर बैठा वह भिखारी हाथ बढ़ाए हुए है, और उसकी आँखों में वही आशा है जो हर दिन जागती है: शायद आज कुछ सिक्के मिल जाएँ। पतरस उसकी ओर ध्यान से देखता है और पहले वह कहता है जो उसके पास नहीं है: "चाँदी और सोना तो मेरे पास है नहीं।" यह इनकार नहीं, बल्कि रास्ता साफ करना है। फिर वह वही देता है जो सचमुच उसके पास है, और वह कोई वस्तु नहीं बल्कि एक नाम है: "जो मेरे पास है, वह तुझे देता हूँ; यीशु मसीह नासरी के नाम से चल फिर।" माँगा गया था भीख, दिया गया पैरों का बल। आदमी ने हथेली फैलाई थी, परमेश्वर ने उसका पूरा शरीर लौटा दिया।
प्रेरितों के काम 3:6 किस विषय में है?
"यीशु मसीह नासरी" पतरस का चुना हुआ पूरा नाम है, और उसमें गाँव का नाम जुड़ा रहना महत्वपूर्ण है। जिस व्यक्ति को कुछ हफ्ते पहले नासरत का बताकर तुच्छ समझा गया और सलीब पर चढ़ाया गया, उसी के नाम में अब जीवन बहता है। पतरस स्वयं इसी अध्याय में इस धागे को खींचता है: परमेश्वर ने "अपने सेवक यीशु की महिमा की", और वही वाचा जो अब्राहम से बाँधी गई थी, अब फल दे रही है, "तेरे वंश के द्वारा पृथ्वी के सारे घराने आशीष पाएँगे।" यानी यह चंगाई कोई अलग-थलग चमत्कार नहीं, बल्कि सदियों पुराने वादे का एक टुकड़ा है जो समय के भीतर उतर आया। भविष्यद्वक्ताओं ने जिस दिन की बात की थी, जब लँगड़े हिरन की तरह कूदेंगे, उसका पहला बीज सुन्दर फाटक पर उगता है। राज्य आ चुका है, अभी पूरा नहीं, पर सचमुच।
प्रेरितों के काम 3:6 का ऐतिहासिक संदर्भ क्या है?
तो फिर आज हर लँगड़ा क्यों नहीं चलता? यह सवाल टालना बेईमानी होगी, खासकर उनके लिए जो वर्षों से बीमार बच्चे के सिरहाने प्रार्थना करते आए हैं। ध्यान दीजिए, यीशु स्वयं इसी मन्दिर में आते-जाते रहे और यह आदमी तब भी फाटक पर बैठा था; चंगाई अब आई, तब नहीं। इसका मतलब है कि समय परमेश्वर के हाथ में है, हमारे विश्वास की मात्रा के हाथ में नहीं। पतरस कोई तकनीक नहीं जानता जिसे दोहराया जा सके; वह उस नाम का सेवक है, मालिक नहीं। और यह टीस बनी रहती है। पर इसी अध्याय में एक वादा भी है कि मसीह तब तक स्वर्ग में रहेंगे जब तक "वह सब बातों का सुधार न कर ले।" अभी जो हुआ है, वह नमूना है; पूरा भुगतान बाद में आता है। इस बीच हम प्रतीक्षा करते हैं, और प्रतीक्षा भी विश्वास का ही रूप है।
प्रेरितों के काम 3:6 हमें परमेश्वर के स्वभाव के बारे में क्या सिखाता है?
लूका जिनके लिए लिख रहा है, वे मसीह के बाद की पहली पीढ़ी के पाठक हैं, जिनमें बहुत से गैर-यहूदी भी थे और जो शायद यह सोचते थे कि यह छोटा-सा आंदोलन किस अधिकार से खड़ा है। उन्हें इस दृश्य में एक बात तुरंत सुनाई देती जो हमसे छूट जाती है: यरूशलेम के सबसे पवित्र स्थान की चौखट पर, उसी शहर में जहाँ यीशु को मारा गया था, उनका नाम खुलेआम पुकारा जा रहा है और वह काम करता है। यह सिर्फ करुणा की कहानी नहीं, यह एक दावा है। जिन्होंने उन्हें ठुकराया था, वे अब उसी नाम के फल के सामने खड़े हैं। और जो लोग खुद हाशिये पर थे, उनके लिए यह सन्देश था कि परमेश्वर का राज्य फाटक के बाहर बैठे आदमी से शुरू होता है, भीतर बैठे अधिकारियों से नहीं।
प्रेरितों के काम 3:6 आज भी कैसे प्रासंगिक है?
यदि यीशु का नाम केवल प्रार्थना के अंत का शब्द न होकर सचमुच अधिकार होता, तो इस सप्ताह आप किस स्थिति में अलग तरह से बोलते?
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Acts 3 पर समुदाय क्या साझा करता है

इस अंश पर पाठकों और संपादकीय टीम से अंतर्दृष्टि, प्रार्थनाएँ और धन्यवाद।

अंतर्दृष्टि संपादकीय पर पद 15

पतरस ने भीड़ से कहा, "और तुमने जीवन के कर्ता को मार डाला, जिसे परमेश्‍वर ने मरे हुओं में से जिलाया।" सोचो, जीवन देनेवाले को ही मार डाला गया। पर पतरस यह ताना मारने के लिए नहीं कहता, वह तुरंत मन फिराने का बुलावा देता है। जो सबसे बड़ा दोष लगता है, वही सबसे बड़ी क्षमा का दरवाज़ा बन जाता है। तुम्हारा सबसे शर्मनाक पन्ना भी उसके हाथ में ऐसा ही है।

अंतर्दृष्टि संपादकीय पर पद 23

पतरस मंदिर के उसी आँगन में खड़ा है, जहाँ अभी अभी एक लंगड़ा आदमी चलने लगा था। और वहीं वह मूसा की बात दोहराता है, "और ऐसा होगा कि जो प्राणी उस भविष्यद्वक्ता की न सुने, वह लोगों में से नाश किया जाएगा।" गौर कर, यहाँ पापों की कोई लंबी सूची नहीं है, बस एक बात है: सुनना। यीशु की आवाज़ आज भी तुझ तक पहुँचती है। सवाल यह है कि तू उसे कब तक टालता रहेगा।

प्रार्थना संपादकीय पर पद 7

पिता, मेरा हाथ थाम लीजिए। बरसों से जो हिस्से मेरे भीतर कमज़ोर पड़े हैं, उन्हें आप बल दीजिए। मुझे उठाइए, ताकि मैं फिर से खड़ा हो सकूं और चल सकूं। मैं जानता हूं कि आपका स्पर्श ही काफी है।

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