प्रेरितों के काम 3
पाठ
दोपहर के तीन बजे, प्रार्थना के समय, पतरस और यूहन्ना मन्दिर जा रहे हैं, और 'सुन्दर' कहलाने वाले फाटक पर वही जन्म का लँगड़ा आदमी बैठा है जिसे लोग हर दिन वहाँ रख जाते थे, ताकि वह भीख माँग सके। वह पैसा माँगता है; पतरस उसकी आँखों में देखकर कहता है, "चाँदी और सोना तो मेरे पास है नहीं; परन्तु जो मेरे पास है, वह तुझे देता हूँ; यीशु मसीह नासरी के नाम से चल फिर।" आदमी उछलकर खड़ा होता है, कूदता हुआ मन्दिर में जाता है, और भीड़ चकित होकर दौड़ आती है। तब पतरस सुलैमान के ओसारे में खड़ा होकर वह भाषण देता है जो चंगाई से शुरू होकर मन फिराने के आह्वान तक पहुँचता है।
मूल बात
ध्यान दीजिए कि पतरस भीड़ का ध्यान तुरन्त अपने ऊपर से हटा देता है: "तुम इस मनुष्य पर क्यों अचम्भा करते हो, और हमारी ओर क्यों इस प्रकार देख रहे हो, कि मानो हमने अपनी सामर्थ्य या भक्ति से इसे चलने फिरने योग्य बना दिया।" यही इस अध्याय का धड़कता हुआ केन्द्र है। चंगाई किसी आत्मिक उपलब्धि का फल नहीं, न ही पतरस की भक्ति का पुरस्कार; वह उस नाम का काम है जिसे इसी भीड़ ने ठुकराया था। परमेश्वर उसी यीशु की महिमा करते हैं जिसे मनुष्यों ने तुच्छ जाना, और उसी ठुकराए हुए के नाम से टूटी टखनों में बल भर देते हैं। अनुग्रह यहाँ कोई कोमल भावना नहीं, बल्कि एक उलटफेर है: जिसे तुमने मार डाला, वही अब तुम्हें जीवन दे रहा है।
सूत्र
पतरस का भाषण कोई नया धर्म नहीं गढ़ता; वह पुरानी कहानी का अगला अध्याय खोलता है। वह "अब्राहम और इसहाक और याकूब के परमेश्वर, हमारे पूर्वजों के परमेश्वर" से शुरू करता है, मूसा के उस वचन तक जाता है कि "प्रभु परमेश्वर तुम्हारे भाइयों में से तुम्हारे लिये मुझ जैसा एक भविष्यद्वक्ता उठाएगा," और अब्राहम से की गई उस प्रतिज्ञा पर ठहरता है कि "तेरे वंश के द्वारा पृथ्वी के सारे घराने आशीष पाएँगे।" यानी सुन्दर फाटक पर जो हुआ, वह कोई अकेला चमत्कार नहीं; वह सदियों पुरानी वाचा का फल है। और ध्यान दीजिए कि वाचा का दायरा कितना चौड़ा है: सारे घराने। पर आरम्भ यहीं से होता है, "पहले तुम्हारे पास भेजा," उन्हीं लोगों के पास जिनके हाथ लहू से सने थे। यही परमेश्वर की रीति है: जिन्हें दोषी ठहराया जाता है, उन्हें ही पहले आशीष दी जाती है।
आईना
वह आदमी "उनसे कुछ पाने की आशा रखते हुए" ताक रहा था। कुछ, यानी दो सिक्के। पैंतीस वर्षों से उसकी कल्पना उसी सीमा में बँधी थी: बस इतना कि आज का दिन कट जाए। आप भी शायद ऐसे ही प्रार्थना करते हैं। दफ्तर में वह एक प्रोजेक्ट निकल जाए, ईएमआई भर जाए, बच्चे के नम्बर ठीक आ जाएँ, रिपोर्ट सामान्य आ जाए। ये माँगें गलत नहीं हैं, पर ध्यान दीजिए कि पतरस ने पहले क्या किया: "हमारी ओर देख!" उसने उसे पहले चेहरा दिया, फिर पैर। भीख माँगने वाले को रोज़ लोग सिक्का देते थे, आँखें कोई नहीं देता था। और जो मिला, वह उसकी माँग से इतना बड़ा था कि उसकी पूरी पहचान बदल गई; भीड़ उसे पहचान भी नहीं पा रही थी।
दूसरा आईना कठोर है। पतरस कहता है, "तुम ने जीवन के कर्ता को मार डाला," और फिर, "मैं जानता हूँ कि यह काम तुम ने अज्ञानता से किया।" अज्ञानता माफी नहीं, कारण है; दोष फिर भी दोष है। हममें से अधिकांश अपने पापों को यही नाम देते हैं: मुझे पता नहीं था, मेरा इरादा नहीं था, हालात ऐसे थे। पतरस उस बहाने को छीनता नहीं, उसे पार कर जाता है: "मन फिराओ और लौट आओ कि तुम्हारे पाप मिटाएँ जाएँ।"
आज यह कीजिए: एक कागज़ पर वह एक चीज़ लिखिए जो आप परमेश्वर से माँगते रहे हैं, और उसके नीचे यह वाक्य लिखकर ज़ोर से पढ़िए, "प्रभु, मैं सिक्का माँग रहा था; आप जो देना चाहते हैं, वह दीजिए।"
शास्त्र की गूँज
मूसा का वचन जो पतरस उद्धृत करता है, व्यवस्थाविवरण 18 से आता है, और उसमें एक चेतावनी जुड़ी है: "प्रत्येक मनुष्य जो उस भविष्यद्वक्ता की न सुने, लोगों में से नाश किया जाएगा।" यह वचन इस्राएल के लिए सदियों तक खुला हुआ प्रश्न था, किसकी बात है? पतरस उसे बन्द कर देता है: यीशु। दूसरी गूँज उत्पत्ति 12 की है, अब्राहम को दी गई प्रतिज्ञा, जिसे पतरस भीड़ के सामने रखता है ताकि वे समझें कि वे किसकी सन्तान हैं और क्या गँवाने जा रहे हैं। दोनों हवाले एक ही दिशा में इशारा करते हैं: परमेश्वर की प्रतिज्ञाएँ हवा में नहीं लटकीं; वे एक व्यक्ति में आकर ठहर गईं, और अब सुन्दर फाटक पर चलती-कूदती दिखाई दे रही हैं।
कठिन प्रश्न
वह आदमी बरसों से वहीं बैठा था, और यीशु उसी मन्दिर में कई बार आए थे। फिर चंगाई अब क्यों? और उससे भी चुभने वाला प्रश्न: फाटक पर उस दिन और भी भिखारी रहे होंगे, वे क्यों बैठे ही रह गए? पाठ इसका उत्तर नहीं देता, और हमें भी उत्तर गढ़ना नहीं चाहिए। पतरस इतना ही कहता है कि यह "उसी के नाम" का काम है, न कि किसी के गुण या योग्यता का। इसका अर्थ है कि चंगाई कोई ऐसी चीज़ नहीं जिसे सही विश्वास से खोला जा सके; वह दान है, और दान की शर्त दाता तय करता है। जो नहीं चंगे होते, वे कम प्यारे नहीं। पर यह जवाब रात में दर्द के साथ जागने वाले को पूरी तरह सन्तुष्ट नहीं करता, और मैं दिखावा नहीं करूँगा कि करता है।
मुख्य पात्र
पतरस को देखिए। यह वही आदमी है जिसने आँगन में कहा था कि मैं इसे जानता ही नहीं, और अब वह भरी भीड़ के सामने कहता है, "इस बात के हम गवाह हैं।" उसके शब्दों में कठोरता है, पर घृणा नहीं; वह "हे भाइयों" कहकर बुलाता है। जो व्यक्ति स्वयं क्षमा पा चुका है, वही दूसरों के अपराध का नाम बिना काँपे ले सकता है और उसी साँस में द्वार भी खोल सकता है। और उसकी गरीबी पर ध्यान दीजिए: "चाँदी और सोना तो मेरे पास है नहीं।" प्रेरितों के पास देने को धन नहीं था, पर जो था वह उन्होंने रोका नहीं। यही चर्च की असली पूँजी है, और यही उसकी असली परीक्षा।
चिन्तन के प्रश्न
आप इस समय परमेश्वर से जो माँग रहे हैं, क्या वह आपकी असली ज़रूरत है, या केवल वह सिक्का जिससे आज का दिन कट जाए?
आपके जीवन में कौन-सा अपराध आपने "अज्ञानता" कहकर ढाँप रखा है, जिसे पतरस के शब्द "मन फिराओ और लौट आओ" आज उजागर कर रहे हैं?
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Acts 3 के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
इस बाइबल अंश के बारे में सामान्य प्रश्नों के त्वरित उत्तर।
प्रेरितों के काम 3 का क्या अर्थ है?
प्रेरितों के काम 3 किस विषय में है?
प्रेरितों के काम 3 का ऐतिहासिक संदर्भ क्या है?
प्रेरितों के काम 3 हमें परमेश्वर के स्वभाव के बारे में क्या सिखाता है?
प्रेरितों के काम 3 आज भी कैसे प्रासंगिक है?
Acts 3 पर समुदाय क्या साझा करता है
इस अंश पर पाठकों और संपादकीय टीम से अंतर्दृष्टि, प्रार्थनाएँ और धन्यवाद।
पतरस ने भीड़ से कहा, "और तुमने जीवन के कर्ता को मार डाला, जिसे परमेश्वर ने मरे हुओं में से जिलाया।" सोचो, जीवन देनेवाले को ही मार डाला गया। पर पतरस यह ताना मारने के लिए नहीं कहता, वह तुरंत मन फिराने का बुलावा देता है। जो सबसे बड़ा दोष लगता है, वही सबसे बड़ी क्षमा का दरवाज़ा बन जाता है। तुम्हारा सबसे शर्मनाक पन्ना भी उसके हाथ में ऐसा ही है।
पतरस मंदिर के उसी आँगन में खड़ा है, जहाँ अभी अभी एक लंगड़ा आदमी चलने लगा था। और वहीं वह मूसा की बात दोहराता है, "और ऐसा होगा कि जो प्राणी उस भविष्यद्वक्ता की न सुने, वह लोगों में से नाश किया जाएगा।" गौर कर, यहाँ पापों की कोई लंबी सूची नहीं है, बस एक बात है: सुनना। यीशु की आवाज़ आज भी तुझ तक पहुँचती है। सवाल यह है कि तू उसे कब तक टालता रहेगा।
पिता, मेरा हाथ थाम लीजिए। बरसों से जो हिस्से मेरे भीतर कमज़ोर पड़े हैं, उन्हें आप बल दीजिए। मुझे उठाइए, ताकि मैं फिर से खड़ा हो सकूं और चल सकूं। मैं जानता हूं कि आपका स्पर्श ही काफी है।
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