बाइबल व्याख्या

इफिसियों 4:26

बाइबल

पाठ

पौलुस एक ऐसा वाक्य लिखते हैं जो पहली नज़र में अपने ही खिलाफ जाता दिखता है: "क्रोध तो करो, पर पाप मत करो; सूर्य अस्त होने तक तुम्हारा क्रोध न रहे।" यानी क्रोध की अनुमति है, पर उसे बाँध दिया गया है, दोनों तरफ से। एक तरफ पाप की सीमा, दूसरी तरफ समय की सीमा। और अगले ही साँस में वे जोड़ते हैं, "और न शैतान को अवसर दो", जैसे कि रात भर पाला गया गुस्सा किसी और के हाथ का औज़ार बन जाता है। यह उपदेश हवा में नहीं तैरता; इसके ठीक पहले झूठ छोड़ने की बात है और ठीक बाद चोरी छोड़ने की। यह नई मनुष्यता का रोज़मर्रा का व्याकरण है।

मूल मर्म

ध्यान दीजिए, पौलुस क्रोध को पाप के बराबर नहीं रखते। वे उसे पाप के कगार पर खड़ा मानते हैं, और यही सबसे ईमानदार बात है। परमेश्वर स्वयं अन्याय पर क्रोधित होते हैं; जो प्रेम करता है वह क्रोध से अछूता नहीं रह सकता। समस्या भावना में नहीं, उसके ठहर जाने में है। जो क्रोध बहता है वह चोट का संकेत देता है; जो जम जाता है वह कड़वाहट बन जाता है, और कड़वाहट को पौलुस पद 31 में उसी सूची में गिनते हैं जिसे "दूर की जाए"। सूर्य अस्त होने की समय-सीमा इसलिए दी गई है क्योंकि देह एक है (पद 25); जिस भाई पर आप गुस्सा हैं, वह आपका अंग है। रातों-रात पाला गया क्रोध अपने ही शरीर के विरुद्ध उठाया गया हाथ है, और वहीं शैतान को दरवाज़ा मिल जाता है।

सूत्र

पौलुस यहाँ भजन संहिता 4:4 उठाकर लाते हैं, जहाँ दाऊद रात में बिस्तर पर पड़ा है, शत्रुओं से घिरा, और खुद से कहता है कि काँपो, पर पाप मत करो, अपने मन में सोचो और चुप रहो। यानी यह आदेश नया नहीं है; परमेश्वर के लोग हमेशा से क्रोध को रात के हवाले करने के खतरे को जानते रहे हैं। पर पौलुस इसमें कुछ जोड़ते हैं जो दाऊद के पास नहीं था। पद 32 में वे क्षमा का पैमाना बताते हैं: "जैसे परमेश्वर ने मसीह में तुम्हारे अपराध क्षमा किए, वैसे ही तुम भी।" क्रूस पर परमेश्वर का न्यायसंगत क्रोध और उनकी क्षमा एक ही जगह मिले। इसलिए मसीही व्यक्ति से यह नहीं कहा जाता कि गुस्सा दबा लो, बल्कि यह कि उसे वहीं ले जाओ जहाँ वह पहले ही चुकाया जा चुका है।

दर्पण

आप जानते हैं कि यह किसके बारे में है। वह सहकर्मी जिसने आपके काम का श्रेय ले लिया और आप आज भी मीटिंग में उसकी आवाज़ सुनकर भीतर से कड़े हो जाते हैं। वह वाक्य जो आपके जीवनसाथी ने चार साल पहले कहा था और जिसे आप हर झगड़े में हथियार की तरह निकाल लाते हैं। वह रिश्तेदार जिसका नाम आते ही आपका जबड़ा भिंच जाता है। रात के एक बजे आप बिस्तर पर पड़े वह बहस दोहराते हैं जो कभी हुई ही नहीं, और हर बार आप जीतते हैं।

यहाँ जो बात चुभती है वह यह है: पौलुस आपके क्रोध को गलत नहीं कह रहे। वे उसकी उम्र पर सवाल उठा रहे हैं। और भीतर एक आवाज़ कहती है कि अगर मैंने इसे छोड़ दिया तो अन्याय का हिसाब कौन रखेगा। यही वह गर्व है जिसे यह पद नंगा करता है, कि मेरा क्रोध ही उस चोट का एकमात्र स्मारक है।

आज सूरज डूबने से पहले किसी कमरे में अकेले खड़े होकर ज़ोर से, नाम लेकर कहिए: "परमेश्वर, मैं अमुक पर गुस्सा हूँ क्योंकि उसने यह किया, और मैं इसे रात भर अपने पास नहीं रखूँगा।" बोलिए, सोचिए मत।

संदर्भ

इफिसुस की कलीसिया घरों में जुड़ती थी, बीस-तीस लोग एक आँगन में, यहूदी और गैरयहूदी एक साथ, जो कुछ साल पहले तक एक-दूसरे की मेज़ पर नहीं बैठते थे। इनमें से कई नए विश्वासी थे जिनका बीता जीवन पद 28 में झलकता है: चोरी, मज़दूरी, अभाव। और वह संसार अपमान को हल्के में नहीं लेता था। यूनानी-रोमी समाज में अपमान का बदला न लेना कमज़ोरी थी; क्रोध को पुरुषत्व का प्रमाण माना जाता था। ऐसे लोगों से यह कहना कि सूर्यास्त तक गुस्सा मत पालो, उनकी सामाजिक साख पर सीधा हमला था। और यह बात लिख कौन रहा है, एक कैदी, जिसके पास क्रोधित होने के सबसे ठोस कारण थे और सबसे कम शक्ति।

मुख्य पात्र

इस पद के पीछे परमेश्वर का अपना स्वभाव खड़ा है। वे क्रोधहीन नहीं हैं; जो प्रेम करता है वह अन्याय पर उदासीन नहीं रह सकता। पर उनका क्रोध कभी अपने अहंकार की रक्षा में नहीं उठता, और वह जमता नहीं। पौलुस पद 30 में लिखते हैं कि पवित्र आत्मा शोकित होते हैं, दुःखी होते हैं। यह भाषा किसी दूर बैठे न्यायाधीश की नहीं, एक ऐसे व्यक्ति की है जो रिश्ते में घायल होता है। परमेश्वर आपके पाले हुए क्रोध पर चिढ़ते नहीं, वे दुखी होते हैं, क्योंकि जिस देह को उन्होंने एक किया है वह भीतर से टूट रही है। यही परमेश्वर आपसे कहते हैं कि जो मैंने क्रूस पर संभाला, उसे तुम तकिए के नीचे मत रखो।

एक बारीकी

"न शैतान को अवसर दो।" यूनानी में यहाँ जो शब्द है, टोपोस, उसका अर्थ है जगह, स्थान, ज़मीन का टुकड़ा। यह अमूर्त "मौका" नहीं, यह क्षेत्र है। पौलुस की तस्वीर यह है: रात भर संभाला गया गुस्सा आपके भीतर एक खाली प्लॉट बन जाता है, और सुबह तक उस पर किसी और का कब्ज़ा हो चुका होता है। यही कारण है कि पुरानी नाराज़गी अपने आप बढ़ती जाती है, बिना आपके सचेत प्रयास के; वह अब आपकी नहीं रही। जो चोट आपने रात को सिर्फ याद रखी थी, वह महीने भर में कहानी बन जाती है, और साल भर में पहचान। इसीलिए समय-सीमा इतनी कठोर है। सूर्यास्त कोई धार्मिक नियम नहीं, यह घेराबंदी है।

चिंतन

आपके भीतर इस समय किसका नाम सबसे पहले उभरा, और वह क्रोध कितनी रातें पार कर चुका है?

अगर आप उस पुरानी नाराज़गी को छोड़ दें, तो आपको किस चीज़ के खो जाने का डर है, और क्या वह डर सच में उचित है?

Ephesians में और गहराई से जानें

चुनी हुई पुस्तकें जो इस बाइबल पुस्तक को और गहराई से समझाती हैं।

The Message of Ephesians

John Stott

God's new society: Stott at his very best on church and calling.

Paul For Everyone: The Prison Letters

N.T. Wright

Ephesians, Philippians, Colossians and Philemon in short daily readings.

Ephesians For You

Richard Coekin

Grace, church and spiritual battle made wonderfully practical.

Ephesians: An Introduction and Commentary

Francis Foulkes

A trusted Tyndale commentary: compact, careful and clear on every passage.

Ephesians

Klyne Snodgrass

Explains what it meant then, and bridges it honestly to life now.

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Ephesians 4:26 के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

इस बाइबल अंश के बारे में सामान्य प्रश्नों के त्वरित उत्तर।

इफिसियों 4:26 का क्या अर्थ है?
पौलुस एक ऐसा वाक्य लिखते हैं जो पहली नज़र में अपने ही खिलाफ जाता दिखता है: "क्रोध तो करो, पर पाप मत करो; सूर्य अस्त होने तक तुम्हारा क्रोध न रहे।" यानी क्रोध की अनुमति है, पर उसे बाँध दिया गया है, दोनों तरफ से। एक तरफ पाप की सीमा, दूसरी तरफ समय की सीमा। और अगले ही साँस में वे जोड़ते हैं, "और न शैतान को अवसर दो", जैसे कि रात भर पाला गया गुस्सा किसी और के हाथ का औज़ार बन जाता है। यह उपदेश हवा में नहीं तैरता; इसके ठीक पहले झूठ छोड़ने की बात है और ठीक बाद चोरी छोड़ने की। यह नई मनुष्यता का रोज़मर्रा का व्याकरण है।
इफिसियों 4:26 किस विषय में है?
पौलुस यहाँ भजन संहिता 4:4 उठाकर लाते हैं, जहाँ दाऊद रात में बिस्तर पर पड़ा है, शत्रुओं से घिरा, और खुद से कहता है कि काँपो, पर पाप मत करो, अपने मन में सोचो और चुप रहो। यानी यह आदेश नया नहीं है; परमेश्वर के लोग हमेशा से क्रोध को रात के हवाले करने के खतरे को जानते रहे हैं। पर पौलुस इसमें कुछ जोड़ते हैं जो दाऊद के पास नहीं था। पद 32 में वे क्षमा का पैमाना बताते हैं: "जैसे परमेश्वर ने मसीह में तुम्हारे अपराध क्षमा किए, वैसे ही तुम भी।" क्रूस पर परमेश्वर का न्यायसंगत क्रोध और उनकी क्षमा एक ही जगह मिले। इसलिए मसीही व्यक्ति से यह नहीं कहा जाता कि गुस्सा दबा लो, बल्कि यह कि उसे वहीं ले जाओ जहाँ वह पहले ही चुकाया जा चुका है।
इफिसियों 4:26 का ऐतिहासिक संदर्भ क्या है?
यहाँ जो बात चुभती है वह यह है: पौलुस आपके क्रोध को गलत नहीं कह रहे। वे उसकी उम्र पर सवाल उठा रहे हैं। और भीतर एक आवाज़ कहती है कि अगर मैंने इसे छोड़ दिया तो अन्याय का हिसाब कौन रखेगा। यही वह गर्व है जिसे यह पद नंगा करता है, कि मेरा क्रोध ही उस चोट का एकमात्र स्मारक है।
इफिसियों 4:26 हमें परमेश्वर के स्वभाव के बारे में क्या सिखाता है?
इफिसुस की कलीसिया घरों में जुड़ती थी, बीस-तीस लोग एक आँगन में, यहूदी और गैरयहूदी एक साथ, जो कुछ साल पहले तक एक-दूसरे की मेज़ पर नहीं बैठते थे। इनमें से कई नए विश्वासी थे जिनका बीता जीवन पद 28 में झलकता है: चोरी, मज़दूरी, अभाव। और वह संसार अपमान को हल्के में नहीं लेता था। यूनानी-रोमी समाज में अपमान का बदला न लेना कमज़ोरी थी; क्रोध को पुरुषत्व का प्रमाण माना जाता था। ऐसे लोगों से यह कहना कि सूर्यास्त तक गुस्सा मत पालो, उनकी सामाजिक साख पर सीधा हमला था। और यह बात लिख कौन रहा है, एक कैदी, जिसके पास क्रोधित होने के सबसे ठोस कारण थे और सबसे कम शक्ति।
इफिसियों 4:26 आज भी कैसे प्रासंगिक है?
"न शैतान को अवसर दो।" यूनानी में यहाँ जो शब्द है, टोपोस, उसका अर्थ है जगह, स्थान, ज़मीन का टुकड़ा। यह अमूर्त "मौका" नहीं, यह क्षेत्र है। पौलुस की तस्वीर यह है: रात भर संभाला गया गुस्सा आपके भीतर एक खाली प्लॉट बन जाता है, और सुबह तक उस पर किसी और का कब्ज़ा हो चुका होता है। यही कारण है कि पुरानी नाराज़गी अपने आप बढ़ती जाती है, बिना आपके सचेत प्रयास के; वह अब आपकी नहीं रही। जो चोट आपने रात को सिर्फ याद रखी थी, वह महीने भर में कहानी बन जाती है, और साल भर में पहचान। इसीलिए समय-सीमा इतनी कठोर है। सूर्यास्त कोई धार्मिक नियम नहीं, यह घेराबंदी है।
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Ephesians 4 पर समुदाय क्या साझा करता है

इस अंश पर पाठकों और संपादकीय टीम से अंतर्दृष्टि, प्रार्थनाएँ और धन्यवाद।

प्रार्थना संपादकीय पर पद 9

पिता, आपका पुत्र ऊपर जाने से पहले सबसे नीचे उतरा, वहाँ तक जहाँ मेरी टूटन और अंधेरा है। जब मैं गहराई में डूबता हूँ, मुझे याद दिला कि वहाँ भी आप पहले से मौजूद हैं। आपका प्रेम किसी भी गड्ढे से नीचे पहुँच सकता है, यही मेरा भरोसा है।

प्रार्थना संपादकीय पर पद 31

pita, mere bhitar jo kadwahat chhupi hai, use tu jaanta hai. gussa, chubhte shabd aur purani shikayatein mujhe andar se thaka rahi hain. mujhe himmat de ki main inhein pakde rehne ke bajay tere haathon mein chhod doon, aur mera dil halka ho jaaye.

*(Hindi script version below)*

पिता, मेरे भीतर जो कड़वाहट छिपी है, उसे तू जानता है। गुस्सा, चुभते शब्द और पुरानी शिकायतें मुझे अंदर से थका रही हैं। मुझे हिम्मत दे कि मैं इन्हें पकड़े रहने के बजाय तेरे हाथों में छोड़ दूँ, और मेरा दिल हल्का हो जाए।

प्रार्थना संपादकीय पर पद 22

पिता, मेरे भीतर अब भी वह पुराना स्वभाव अटका है, जो धोखा देने वाली इच्छाओं से मुझे खींचता है। मुझे ताकत दे कि मैं उसे उतारकर रख दूँ, जैसे मैला कपड़ा। मुझे नया कर, ताकि मेरा जीना तेरे प्यार जैसा दिखे।

धन्यवाद संपादकीय पर पद 2

पिता, धन्यवाद कि आपने मुझे ऐसे लोग दिए जो "प्रेम में एक दूसरे को सह" लेते हैं, जिन्होंने मेरी चिड़चिड़ाहट और कमियों को धीरज से सहा है। धन्यवाद कि आप स्वयं मुझ पर हर दिन धीरज धरते हैं, और दीनता और नम्रता सीखने की कृपा देते हैं।

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