इफिसियों 4:11
पाठ
पद 11 उस बड़े वाक्य का शिखर है जो पद 7 में शुरू हुआ था: ऊँचे पर चढ़े हुए मसीह ने "मनुष्यों को दान दिए," और अब पौलुस बताता है कि वे दान क्या थे। कोई अनुभूति नहीं, कोई क्षमता का पुलिंदा नहीं, बल्कि जीते-जागते लोग: "उसने कुछ को प्रेरित नियुक्त करके, और कुछ को भविष्यद्वक्ता नियुक्त करके, और कुछ को सुसमाचार सुनानेवाले नियुक्त करके, और कुछ को रखवाले और उपदेशक नियुक्त करके दे दिया।" चार या पाँच प्रकार की सेवकाई, सब एक ही देनेवाले के हाथ से, और सब एक ही उद्देश्य के लिए, जो अगले पद में खुलता है: कि पवित्र लोग सिद्ध हों और मसीह की देह उन्नति पाए। वाक्य का कर्ता आदि से अंत तक मसीह ही बने रहते हैं।
मूल बात
यहाँ कलीसिया के बारे में जो कहा जा रहा है, वह वास्तव में मसीह के बारे में कहा जा रहा है। पौलुस ने अभी-अभी लिखा कि वे "पृथ्वी की निचली जगहों में उतरा भी था" और "सारे आकाश के ऊपर चढ़ भी गया," और उस विजयी यात्रा का फल यह है: सेवक। विजेता राजा लूट बाँटता है, परंतु यह राजा अपनी लूट अपने पास नहीं रखता, वह उसे अपनी प्रजा में बाँट देता है। इसलिए अगुवाई कोई पद नहीं, वह अनुग्रह का रूप है, "मसीह के दान के परिमाण से" मापा हुआ। यह अनुग्रह की उस ही धारा में बहता है जो इफिसियों 2 में मृतकों को जिलाती है: परमेश्वर देते हैं, मनुष्य पाता है। और चूँकि देनेवाले एक हैं, इसलिए अलग-अलग सेवकाइयों में प्रतिद्वंद्विता का कोई आधार नहीं बचता; भिन्नता एकता को तोड़ती नहीं, उसे सजाती है।
सूत्र
पौलुस ने पद 8 में भजन 68 से उद्धरण लिया, वह गीत जो परमेश्वर की विजय-यात्रा गाता है: विजयी राजा सिय्योन पर चढ़ता है। परंतु पुराने नियम की धारा यहीं नहीं रुकती। इस्राएल की सबसे गहरी शिकायत यही थी कि उसके रखवाले भेड़ों को चरने के बजाय खाते रहे, और उसी घाव पर परमेश्वर ने यिर्मयाह के द्वारा प्रतिज्ञा की थी कि वे अपने मन के अनुसार चरवाहे देंगे। पद 11 उस प्रतिज्ञा का चुकाया हुआ हिसाब है। जो परमेश्वर सृष्टि में प्रकाश देते हैं, वाचा में व्यवस्था देते हैं, क्रूस पर पुत्र देते हैं, वे अब उसी हाथ से अपनी देह को "रखवाले और उपदेशक" देते हैं। देना परमेश्वर का स्वभाव है, और कलीसिया का हर पद उसी स्वभाव का नीचे तक पहुँचा हुआ छोर है।
दर्पण
यह पद उन दो प्रवृत्तियों को नंगा करता है जो हम में से अधिकांश में बसी हैं। पहली: सेवा को अपनी पहचान बना लेना। जब आप रविवार की तैयारी करते हैं, समूह चलाते हैं, या युवाओं को पढ़ाते हैं, तो भीतर एक आवाज़ गिनती करती रहती है कि कितनों ने सराहा। पौलुस कहता है, आप दान हैं, देनेवाले नहीं; आपकी कीमत आपके प्रभाव से नहीं, मसीह के देने से तय होती है। दूसरी प्रवृत्ति उलटी है: सेवकाई को ग्राहक की तरह चखना, प्रचारकों की तुलना करना, कलीसिया बदलते रहना जब तक स्वाद ठीक न बैठे। पद 12 कहता है कि ये दान आपको तैयार करने के लिए हैं, मनोरंजन के लिए नहीं। आज ही उस एक व्यक्ति का नाम लिखिए जिसने आपको विश्वास सिखाया, और उसे एक संदेश भेजकर बताइए कि उसकी कौन-सी बात आज तक आप में काम कर रही है।
प्रश्न
यदि अगुवे मसीह के दान हैं, तो उन रखवालों का क्या जो घाव देते हैं? हम सबने ऐसे चरवाहे देखे हैं जिन्होंने अधिकार का दुरुपयोग किया, और उनके नाम पर "यह तो परमेश्वर का दान है" कहना क्रूरता होगी। पाठ इसका सीधा उत्तर नहीं देता, परंतु वह एक कसौटी देता है: हर दान का माप पद 12 है, कि पवित्र लोग सिद्ध हों और देह उन्नति पाए। जो सेवकाई देह को छोटा, डरा हुआ और अपने ऊपर निर्भर बनाती है, वह चाहे जिस नाम से चले, इस सूची में नहीं आती। इसका अर्थ यह नहीं कि हर चोट का हिसाब इसी जीवन में मिल जाएगा। यहाँ पौलुस हमें भरोसे पर छोड़ता है कि जो देनेवाले हैं, वे लेखा भी लेंगे।
संदर्भ
यह पत्र एक बंदी ने लिखा, जो खुद को "प्रभु में बन्दी" कहता है, और शायद वह इफिसुस तक सीमित नहीं था बल्कि आसपास की कलीसियाओं में घूमता रहा। इफिसुस अरतिमिस के विशाल मंदिर का शहर था, धर्म और व्यापार एक-दूसरे में गुँथे हुए, और सामाजिक जीवन संरक्षक-आश्रित की सीढ़ी पर खड़ा था। वहाँ "दान" कभी मुफ़्त नहीं होता था; बड़ा आदमी देता था ताकि छोटा आदमी उसका ऋणी बने और सार्वजनिक रूप से उसकी महिमा करे। इसी माहौल में पौलुस कहता है कि असली संरक्षक स्वर्ग पर चढ़ा हुआ मसीह है, और उसके दिए हुए लोग किसी मनुष्य की प्रतिष्ठा नहीं बढ़ाते; वे पूरी देह को बढ़ाते हैं।
चित्र
सुननेवाले घरों में इकट्ठे होते थे, बीस-तीस लोग, यहूदी और अन्यजाति मिलकर, बिना किसी भवन और बिना किसी वेतनभोगी पादरी-वर्ग के। जब यह पत्र ऊँचे स्वर में पढ़ा गया, तो यहूदी कानों ने भजन 68 की गूँज पकड़ी और समझा कि जो परमेश्वर सीनै से उतरे थे, वही अब चढ़कर अपनी प्रजा को सुसज्जित कर रहे हैं। अन्यजाति सुननेवालों ने कुछ और सुना: कि उनके बीच खड़ा वह साधारण आदमी, जो रोटी तोड़ता और शास्त्र समझाता है, किसी समिति का चुना हुआ नहीं, बल्कि स्वर्ग से भेजा हुआ उपहार है। यह बात उन्हें गर्वित नहीं, गंभीर बनाती थी।
चिंतन
आप अपनी सेवकाई को किसकी दी हुई वस्तु मानते हैं, और यह विश्वास आपके भीतर की गिनती को कैसे बदलता है?
आपकी कलीसिया में कौन-सा दान आप सबसे कम सराहते हैं, और क्यों?
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Ephesians 4:11 के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
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इफिसियों 4:11 आज भी कैसे प्रासंगिक है?
Ephesians 4 पर समुदाय क्या साझा करता है
इस अंश पर पाठकों और संपादकीय टीम से अंतर्दृष्टि, प्रार्थनाएँ और धन्यवाद।
हर एक अंग के ठीक-ठीक कार्य करने से" शरीर बढ़ता है। यानी जोड़ भी ज़रूरी है, वह हिस्सा जो दिखता नहीं, बस दो को थामे रखता है। शायद कलीसिया में तुम्हारा काम वही है, किसी को जोड़े रखना, थामे रखना। छोटा लगता है? पर तुम्हारे बिना देह वहीं रुक जाती है। और यह सब बढ़ोतरी एक ही दिशा में है, प्रेम में।
जीत के बाद राजा लूट का माल अपने लोगों में बाँटता था। मसीह भी ऊँचे पर चढ़ा, पर जीत अपने पास नहीं रखी: "वह ऊँचे पर चढ़ा और बन्धुवाई को बन्दी बनाकर ले गया, और मनुष्यों को दान दिए।" जो तुझे बाँधे रखता था, अब वही उसका बन्दी है। और तेरे भीतर जो वरदान है, वह उसी विजय का हिस्सा है। उसे दबाकर मत रख।
पिता, तूने हर एक को कुछ न कुछ देकर भेजा है। मुझे भी तैयार कर, ताकि जो सेवा मेरे हाथ में है उसे प्रेम से कर सकूँ। मेरे काम से तेरे लोग मज़बूत हों, और तेरी देह थोड़ी और पूरी होती जाए।
पिता, धन्यवाद कि आपने हमें एक दूसरे का अंग बनाया है। धन्यवाद कि झूठ की जगह अब हमें सच बोलने की आज़ादी मिली है, और आपस में भरोसे का रिश्ता। उन लोगों के लिए भी धन्यवाद जो हमसे सच कहते हैं, चाहे वह सुनने में कठिन ही क्यों न हो।
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