निर्गमन 2:25
पाठ
निर्गमन 2 का अंत एक ऐसे वाक्य पर आता है जो लगभग साँस रोक देता है: "और परमेश्वर ने इस्राएलियों पर दृष्टि करके उन पर चित्त लगाया।" इससे पहले का दृश्य अँधेरा है, गुलामी लंबी है, मिस्र का राजा मर चुका है पर जुआ वैसा ही भारी है, और लोग कराह रहे हैं। उनकी दुहाई ऊपर तक पहुँचती है, परमेश्वर अपनी वाचा को स्मरण करते हैं, और फिर यह अंतिम पंक्ति: वे देखते हैं, और वे जान लेते हैं। कोई चमत्कार नहीं, कोई आवाज़ नहीं, कोई दूत नहीं। केवल एक दृष्टि जो मुड़कर उन लोगों पर टिक जाती है जिन्हें दुनिया ने गिनना छोड़ दिया था। अध्याय यहीं रुक जाता है, मानो कहता हो: अब सब कुछ बदलने वाला है, क्योंकि परमेश्वर ने देख लिया है।
मर्म
इस छोटे से वाक्य में दो क्रियाएँ हैं, और दूसरी पहली से कहीं गहरी है। इब्रानी में अंतिम शब्द है यादा, जिसका अर्थ केवल "जानना" नहीं, बल्कि भीतर तक पहचानना, अपनाना, सम्बन्ध में बँध जाना। परमेश्वर ने इस्राएल को दूर से नहीं देखा जैसे कोई ऊँचाई से भीड़ देखता है; उन्होंने उन्हें अपना मान लिया। यही इस पूरे अध्याय का धर्मशास्त्रीय केंद्र है। मूसा का जन्म, टोकरी, फ़िरौन की बेटी, मिद्यान का कुआँ, ये सब मानवीय घटनाएँ थीं जिनमें परमेश्वर का नाम एक बार भी नहीं आया। और फिर अचानक चार बार परमेश्वर कर्ता बनते हैं: सुना, स्मरण किया, देखा, चित्त लगाया। उद्धार मनुष्य की पुकार से शुरू नहीं होता, वह परमेश्वर की दृष्टि से शुरू होता है। और वह दृष्टि निष्क्रिय नहीं है; बाइबल में परमेश्वर का देखना हमेशा कार्रवाई का पहला कदम है।
सूत्र
निर्गमन की पूरी कहानी इसी एक वाक्य से खुलती है, और उसके बाद बाइबल बार-बार इसी ढाँचे में बोलती है: लोग कराहते हैं, परमेश्वर देखते हैं, परमेश्वर उतरते हैं। यह केवल एक बार की घटना नहीं, यह परमेश्वर का स्वभाव है। जब सदियों बाद यूहन्ना लिखता है कि वचन देहधारी होकर हमारे बीच डेरा किए रहा, तो वह ठीक इसी गति का अंतिम रूप बता रहा है: दृष्टि से स्पर्श तक, स्मरण से देह तक। मिस्र में परमेश्वर ने इस्राएल को "अपना" जाना; क्रूस पर उन्होंने हमें अपना जाना, और उस जानने की कीमत उन्होंने स्वयं चुकाई। ध्यान दीजिए, मूसा उस समय मिद्यान में भेड़ें चरा रहा है, अपनी असफलता में दफ़न। परमेश्वर की दृष्टि पहले पड़ती है, उद्धारक बाद में बुलाया जाता है। उद्धार हमेशा ऊपर से शुरू होता है।
दर्पण
आपके जीवन का कोई हिस्सा है जिसके बारे में आपको गहरा संदेह है कि परमेश्वर ने उसे कभी देखा भी है या नहीं। वह बीमारी जिसके लिए आपने पाँच साल प्रार्थना की। वह विवाह जिसमें आप हर रात पीठ फेरकर सोते हैं। वह नौकरी जहाँ आपकी मेहनत का श्रेय हर बार कोई और ले जाता है। वह बच्चा जो अब फ़ोन नहीं उठाता। इस्राएल ने भी यही सोचा होगा, क्योंकि उनकी कराह चार सौ साल पुरानी थी और पाठ साफ़ कहता है कि राजा तो मर गया पर गुलामी नहीं मरी। और फिर भी लिखा है कि परमेश्वर ने उनका कराहना सुना। आपका अनुभव परमेश्वर की दृष्टि का माप नहीं है। यहाँ एक गर्व भी उघड़ता है: हम सोचते हैं कि जब तक हम सब सम्भाल न लें, कुछ नहीं बदलेगा। इस्राएल ने कुछ नहीं सम्भाला। उन्होंने सिर्फ़ कराहा, और वही काफ़ी था।
आज, दस मिनट के भीतर: उस एक स्थिति का नाम काग़ज़ पर लिखिए जिसके बारे में आप मान बैठे हैं कि परमेश्वर उसे नहीं देख रहे, और उसके नीचे यही पंक्ति अपने हाथ से लिखिए, "परमेश्वर ने देखा और चित्त लगाया।" काग़ज़ फेंकिए मत, उसे वहाँ रखिए जहाँ आपकी नज़र कल फिर पड़े।
कठिन प्रश्न
तो परमेश्वर ने पहले क्यों नहीं देखा? पाठ कहता है "बहुत दिनों के बीतने पर", और वे दिन पीढ़ियों के थे। क्या परमेश्वर भूल गए थे कि उन्हें अब स्मरण करना पड़ा? इब्रानी में "स्मरण करना" भूलने का उल्टा नहीं, बल्कि वाचा के अनुसार कार्य करने का क्षण है। फिर भी यह उत्तर उन लोगों के दर्द को नहीं मिटाता जो उस क्षण से पहले मर गए, जिनकी कराह सुनी गई पर जिन्होंने लाल समुद्र कभी नहीं देखा। बाइबल यहाँ कोई सफ़ाई नहीं देती। वह केवल इतना कहती है कि परमेश्वर का समय हमारे धैर्य से लंबा है और उनकी वाचा हमारी आयु से लंबी है। यह सांत्वना कड़वी है, पर झूठी नहीं। कभी-कभी विश्वास का अर्थ यही है: उस देखने पर भरोसा करना जिसका परिणाम शायद हमारी आँखें न देखें।
अन्य वचन
हाजिरा ने रेगिस्तान में परमेश्वर को "एल रोई", अर्थात वह परमेश्वर जो मुझे देखता है, नाम दिया था, और वह भी एक मिस्री दासी थी जिसे सबने छोड़ दिया था। उत्पत्ति से निर्गमन तक यह एक ही धागा है: परमेश्वर उन्हें देखते हैं जिन्हें व्यवस्था ने गिनती से बाहर रखा। दूसरी ओर, यीशु का वह वाक्य खड़ा है जिसमें वे कहते हैं कि अंतिम दिन कुछ लोगों से वे कहेंगे, मैंने तुम्हें कभी नहीं जाना। वही क्रिया, वही "जानना", पर उलटी दिशा में। परमेश्वर की दृष्टि केवल सांत्वना नहीं है, वह निर्णय भी है। जिसे वे जानते हैं, वह बचाया जाता है; यह जानना एक रिश्ता है, कोई आँकड़ा नहीं।
पृष्ठभूमि
यह लगभग 1500 ईसा पूर्व का मिस्र है, दुनिया की सबसे संगठित शक्ति। इस्राएली वहाँ कोई अल्पसंख्यक समुदाय नहीं, राज्य की संपत्ति हैं: ईंट बनाने वाली श्रमशक्ति, जिनके बच्चों को नदी में फेंकने का आदेश कानून था। फ़िरौन केवल राजा नहीं था, वह देवता माना जाता था, इसलिए उसकी मृत्यु एक धार्मिक भूकंप थी। गुलामों ने शायद आशा की होगी कि नया शासक नीति बदलेगा। नहीं बदली। ध्यान दीजिए, पाठ नहीं कहता कि उन्होंने परमेश्वर से प्रार्थना की; वे केवल कराहे, जैसे घायल पशु कराहता है, बिना पते के। और वही बिना पते की कराह ठीक पते पर पहुँची। इसी बीच उनका भावी छुड़ानेवाला एक विदेशी देश में भेड़ें चरा रहा था और अपने बेटे का नाम "परदेशी" रख चुका था।
मनन
आप किस बात के बारे में चुपचाप मान बैठे हैं कि परमेश्वर उसे नहीं देख रहे, और यह मान्यता आपकी प्रार्थना को कैसे बदल चुकी है?
यदि परमेश्वर का "जानना" एक रिश्ते में बँध जाना है, तो आज आपके जीवन में कौन है जिसे आप देखते तो हैं पर जानते नहीं?
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Exodus 2:25 के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
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निर्गमन 2:25 का क्या अर्थ है?
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निर्गमन 2:25 हमें परमेश्वर के स्वभाव के बारे में क्या सिखाता है?
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Exodus 2 पर समुदाय क्या साझा करता है
इस अंश पर पाठकों और संपादकीय टीम से अंतर्दृष्टि, प्रार्थनाएँ और धन्यवाद।
किसने तुझे हम पर हाकिम और न्यायी ठहराया?" यह सवाल मूसा को चुभ गया, क्योंकि सच यही था। अभी परमेश्वर ने उसे भेजा नहीं था। उसने इधर उधर देखकर, छिपकर, अपने हाथ से छुड़ाना चाहा। चालीस साल बाद वही मूसा जलती झाड़ी के सामने बुलाया गया। तेरे भीतर का जोश गलत नहीं है। पर पूछ ले, यह काम तू कर रहा है या परमेश्वर तुझसे करवा रहा है?
पिता, जब मुझे किनारे धकेला जाता है और कोई पक्ष नहीं लेता, तब भी तू देखता है। तू ऐसे लोग भेजता है जो उठकर मेरी मदद करते हैं। मुझे भी वैसा ही साहस दे कि जहाँ किसी के साथ अन्याय हो, मैं चुप न रहूँ, बल्कि आगे बढ़कर हाथ बढ़ाऊँ।
पिता, धन्यवाद कि आपने फ़िरौन की बेटी के मन में तरस डाल दिया, जब उसने रोते हुए बच्चे को देखा। धन्यवाद कि मूसा का वह छोटा सा रोना भी अनसुना न रहा, और आपने शत्रु के घर में ही उसके लिए सुरक्षा तैयार कर रखी थी। हमारे आँसुओं पर भी आपकी वही दयादृष्टि है।
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