निर्गमन 3:9
पाठ
जलती झाड़ी में से परमेश्वर मूसा को एक ही वाक्य में दो क्रियाएँ सुनाते हैं: "इस्राएलियों की चिल्लाहट मुझे सुनाई पड़ी है, और मिस्रियों का उन पर अंधेर करना भी मुझे दिखाई पड़ा है।" यह कोई नई सूचना नहीं है जो परमेश्वर अभी-अभी पा रहे हों; यह घोषणा है कि जो वर्षों से चुपचाप दर्ज हो रहा था, अब कार्रवाई में बदल रहा है। पद 7 में वे मूसा को बता चुके थे कि उन्होंने दुःख देखा और चिल्लाहट सुनी; पद 9 में वही बात दोहराई जाती है, पर इस बार "इसलिए अब सुन" के साथ, यानी एक मोड़ के रूप में। अगला ही वाक्य मूसा को भेज देता है। सुनना, देखना, और फिर भेजना: तीनों एक ही साँस में।
मूल बात
यहाँ परमेश्वर अपने बारे में कुछ ऐसा खोलते हैं जो मिस्र के देवताओं के बारे में कोई नहीं कह सकता था। इब्रानी में जिस शब्द का अनुवाद "चिल्लाहट" है, वह त्सआकाह है, और वह केवल दर्द की आह नहीं, बल्कि अन्याय के विरुद्ध उठी हुई फरियाद है, वह पुकार जो अदालत में न्याय माँगती है। परमेश्वर कहते हैं कि यह फरियाद उन तक पहुँची है और साथ ही उन्होंने अत्याचार को अपनी आँखों से देखा है। इसका अर्थ यह है कि इतिहास का कोई कोना उनकी दृष्टि से बाहर नहीं, और दबे हुए लोगों की आवाज़ स्वर्ग में खो नहीं जाती। परंतु ध्यान दीजिए: परमेश्वर सुनकर केवल द्रवित नहीं होते, वे उतरते हैं और एक मनुष्य को भेजते हैं। करुणा यहाँ भावना नहीं, हस्तक्षेप है। यही छुटकारे का स्वभाव है, और यही आगे चलकर देह धारण करने तक पहुँचता है।
जोड़ने वाला सूत्र
पद 9 में परमेश्वर तीन काम करते हैं: वे पुकार सुनते हैं, अत्याचार देखते हैं, और एक छुड़ानेवाला भेजते हैं। यही ढाँचा पूरे बाइबल में लौटकर आता है, और अपने पूरे रूप में यीशु मसीह में खुलता है। मूसा को भेजा जाना अधूरा छुटकारा था: वह फ़िरौन के विरुद्ध खड़ा हुआ, पर पाप और मृत्यु के विरुद्ध नहीं खड़ा हो सका; उसने लोगों को मिस्र से निकाला, पर मिस्र को लोगों के भीतर से नहीं निकाल सका। मसीह में परमेश्वर केवल किसी को भेजते नहीं, वे स्वयं "उतर आते" हैं, जैसा पद 8 कहता है, और यह उतरना देह धारण तक जाता है। जो आवाज़ झाड़ी में से बोली, वही आवाज़ गलील की धूल में चलती है। इसलिए मूसा का बुलावा मसीह का प्रतिरूप है, नक़ल नहीं: छाया, जिसकी देह बाद में आई।
दर्पण
यह पद उस डर को छूता है जिसे हम स्वीकार नहीं करते: कि शायद कोई सुन ही नहीं रहा। आप महीनों से किसी बीमारी के साथ जी रहे हैं, या दफ़्तर में एक ऐसे बॉस के नीचे जो आपको लगातार छोटा महसूस कराता है, या घर में एक ऐसे रिश्ते में जहाँ आपकी बात का कोई वज़न नहीं। प्रार्थना धीरे-धीरे औपचारिकता बन जाती है, क्योंकि लगता है शब्द छत से टकराकर वापस गिर रहे हैं। पद 9 कहता है कि इस्राएली अस्सी साल तक चिल्लाए और स्वर्ग चुप लगा, पर चुप्पी अनुपस्थिति नहीं थी। साथ ही यह पद दूसरी ओर भी चुभता है: परमेश्वर ने "अंधेर करना" देखा, और वे मूसा को भेजते हैं। जहाँ आप सत्ता में हैं, वहाँ आपका व्यवहार भी देखा जा रहा है। आज ही किसी एक व्यक्ति का नाम काग़ज़ पर लिखिए जिसकी पुकार आपके आसपास अनसुनी रह रही है, और उसे आज ही एक संदेश भेजिए।
प्रश्न
यदि परमेश्वर ने सुना, तो इतनी देर क्यों? पद 7 और 9 दोनों में भूतकाल है: सुन चुके, देख चुके। फिर पीढ़ियाँ ईंटें ढोती रहीं, बच्चे नील में फेंके गए, और आकाश ख़ामोश रहा। यह पाठ इस देरी का कोई स्पष्टीकरण नहीं देता, और उत्तर गढ़ना बेईमानी होगी। जो यह पाठ देता है वह यह है: देरी का अर्थ अनसुनापन नहीं। परमेश्वर का समय हमारे धैर्य से नहीं नापा जाता, और यह बात तसल्ली देने से पहले चोट पहुँचाती है। मसीह के क्रूस पर भी यही प्रश्न लटका रहा, "तू ने मुझे क्यों छोड़ दिया", और वहाँ भी उत्तर शब्दों में नहीं, तीसरे दिन की सुबह में आया। हमें इसी तनाव में जीना सीखना है।
मुख्य पात्र
यहाँ केंद्र में मूसा नहीं, परमेश्वर हैं, और उनका चित्र आश्चर्यजनक रूप से भावनापूर्ण है। पद 7 कहता है कि उन्होंने पीड़ा पर "चित्त लगाया", यानी वे दूर से नहीं देखते, वे ध्यान से झुककर देखते हैं। यह वह परमेश्वर नहीं जो आकाश में निर्विकार बैठा है; यह वह परमेश्वर है जो अन्याय से विचलित होते हैं और नाम लेकर अपने लोगों को अपना कहते हैं। साथ ही वे झाड़ी में से जूते उतरवाते हैं, क्योंकि यह करुणा पवित्रता के बिना नहीं आती। जो हृदय दास की कराह से पिघलता है, वही हृदय फ़िरौन का सामना करने को तैयार है। कोमलता और शक्ति यहाँ एक ही व्यक्तित्व के दो चेहरे हैं, और यही चेहरा बाद में यीशु में दिखाई देता है।
श्रोताओं की दुनिया
जिन्होंने यह कहानी पहली बार सुनी, वे स्वयं जंगल में चल रहे थे या बाद में उस देश में बसे थे जहाँ साम्राज्यों की छाया कभी नहीं हटी। मिस्र उस समय की महाशक्ति था, फ़िरौन को देवता माना जाता था, और दास की चीख़ को कोई दस्तावेज़ दर्ज नहीं करता था। इस पृष्ठभूमि में यह वाक्य विस्फोटक था: ईंट बनानेवालों की आवाज़ स्वर्ग के दरबार तक पहुँची, और सिंहासन पर बैठे देवता-राजा की आवाज़ नहीं। जो लोग सत्ता के हाशिये पर थे, उन्होंने इसमें सुना कि उनका परमेश्वर इतिहास में पक्ष लेते हैं। यह केवल दिलासा नहीं था, यह राजनीतिक दावा था, और इसीलिए यह पाठ आज भी असुविधाजनक बना रहता है।
चिंतन
आपके जीवन की कौन-सी पुकार इतनी पुरानी हो चुकी है कि आपने उसे प्रार्थना में लाना छोड़ दिया, और पद 9 उस चुप्पी के बारे में आपसे क्या कह रहा है?
जहाँ आपके पास अधिकार है, घर में, काम पर, कलीसिया में, वहाँ परमेश्वर क्या "देख" रहे होंगे, और आप इस सप्ताह उसमें क्या बदलेंगे?
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इस अंश पर पाठकों और संपादकीय टीम से अंतर्दृष्टि, प्रार्थनाएँ और धन्यवाद।
मूसा ने पूछा, "मैं कौन हूँ जो फ़िरौन के पास जाऊँ," और परमेश्वर ने उसकी पहचान पर बात ही नहीं की। उत्तर मिला, "निश्चय मैं तेरे संग रहूँगा।" और जो चिन्ह दिया गया वह आगे चलकर, इसी पहाड़ पर उपासना करते समय दिखेगा। यानी पक्का सबूत बाद में मिलेगा, पहले चलना होगा। तेरा सवाल भी शायद यही है, और उसका उत्तर भी वही एक है।
तब वे तेरी सुनेंगे," परमेश्वर मूसा से यह बात तब कहते हैं जब मूसा ने अभी एक शब्द भी नहीं बोला। सुनवाई का वादा बोलने से पहले मिल गया।
और ध्यान दे, मूसा को अकेले नहीं भेजा गया। पुरनियों को साथ लेकर जाना था। जिस बुलाहट से तू घबरा रहा है, उसमें परमेश्वर तेरे साथ लोग भी देता है और नतीजा भी अपने हाथ में रखता है।
तू बस कहने की हिम्मत जुटा।
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