उत्पत्ति 1:7
पाठ
परमेश्वर ने कहा था कि जल के बीच एक अन्तर हो, और अब वे स्वयं वह अन्तर बनाते हैं: एक विस्तार, एक खुली जगह, जिसके नीचे का जल और ऊपर का जल आपस में अलग कर दिए जाते हैं। "तब परमेश्वर ने एक अन्तर करके उसके नीचे के जल और उसके ऊपर के जल को अलग-अलग किया; और वैसा ही हो गया।" ध्यान दीजिए कि यहाँ कुछ भी नया "बनाया" नहीं जाता जिसे हम छू सकें, न पेड़, न पशु, न ज्योतियाँ। यहाँ केवल एक विभाजन होता है, एक सीमा खींची जाती है। और वाक्य का अन्त उसी शान्त, दो टूक टिप्पणी से होता है जो पूरे अध्याय में लौटती रहती है: और वैसा ही हो गया।
मर्म
सृष्टि केवल भरने का काम नहीं है, वह पहले अलग करने का काम है। पद 2 में जो "गहरे जल" पर अंधियारा था, वह अराजकता का चित्र है; परमेश्वर उसे नष्ट नहीं करते, वे उसे सीमा देते हैं। ऊपर का जल रोक दिया जाता है, नीचे का जल नीचे रखा जाता है, और बीच में एक साँस लेने योग्य जगह बनती है जहाँ बाद में जीवन रह सकेगा। यही परमेश्वर के शासन का ढंग है: वे विनाशकारी शक्तियों के विरुद्ध दीवार नहीं, बल्कि सीमा-रेखा खड़ी करते हैं, और वह रेखा उनके वचन के अलावा किसी चीज़ पर टिकी नहीं। जब उत्पत्ति 7 में यही सीमा हटा दी जाती है और ऊपर-नीचे का जल फिर मिल जाता है, तब जलप्रलय आता है। यानी हमारी दुनिया हर पल एक ऐसे शब्द के सहारे जी रही है जो परमेश्वर ने कहा और वापस नहीं लिया।
सूत्र
यह विभाजन बाइबल में दोबारा होता है, और हर बार वहाँ जीवन जन्म लेता है। लाल समुद्र पर परमेश्वर जल को दो भाग करते हैं और बीच में सूखी भूमि दिखाई देती है; निर्गमन का वह दृश्य उत्पत्ति 1 की भाषा को जान-बूझकर दोहराता है, क्योंकि इस्राएल का छुटकारा एक नई सृष्टि है, अराजकता के बीच रहने योग्य जगह का बनना। और यही धागा मसीह तक पहुँचता है: जब यीशु मसीह उस झील पर खड़े होकर तूफान को डाँटते हैं और लहरें उनके शब्द पर थम जाती हैं, तब शिष्य ठीक वही देख रहे हैं जो यहाँ हो रहा है, जल अपने स्वामी को पहचान लेता है। और प्रकाशितवाक्य के अन्त में जो चित्र आता है, नई सृष्टि जहाँ समुद्र अब नहीं रहा, वह इसी की पूर्णता है: वह दिन जब सीमा की भी ज़रूरत न होगी, क्योंकि जिससे सीमा बचाती थी वह रह ही नहीं जाएगा।
दर्पण
आपके जीवन में भी कुछ जल ऊपर रोका हुआ है। वह रिपोर्ट जो अगले हफ़्ते आनी है, वह बेटा जिससे बातचीत काँच पर चलने जैसी हो गई है, वह खाता जिसमें महीने के अन्त तक कुछ नहीं बचता, वह उम्र जो शरीर में महसूस होने लगी है। हम अक्सर सोचते हैं कि हमारी स्थिरता हमारी योजना, बीमा और सावधानी पर टिकी है; यह पद कहता है कि वह एक कहे हुए वचन पर टिकी है, और इसीलिए वह हमारे हाथ से बाहर है, पर टूटी हुई नहीं। यह डरावना भी है और राहत भी। आज एक काग़ज़ पर वह एक चीज़ लिखिए जो इस समय आपको बाढ़ की तरह लगती है, और उसके नीचे लिख दीजिए: "और वैसा ही हो गया।" फिर उस काग़ज़ को हाथ में लेकर एक वाक्य में परमेश्वर से कहिए कि सीमा आप खींचिए।
श्रोता
जो लोग यह पहली बार सुन रहे थे, वे ऐसी दुनिया में रहते थे जहाँ समुद्र देवता था और अराजकता की शक्तियाँ युद्ध करती थीं। बाबेल की कहानियों में आकाश तब बनता है जब देवता समुद्र-दानव को चीरकर उसके शरीर के दो टुकड़े कर देता है। इस्राएल का पाठ उसी चित्र के इतने पास चलता है कि अन्तर और चुभने लगता है: यहाँ कोई युद्ध नहीं, कोई लाश नहीं, कोई प्रतिद्वंद्वी नहीं। परमेश्वर बोलते हैं और जल अलग हो जाता है। निर्वासन में बैठे, बाबेल की भव्य मूर्तियों और जुलूसों के बीच अपने आपको छोटा महसूस करते हुए लोगों के लिए यह राजनीतिक बयान था: जिन शक्तियों से तुम्हारे विजेता डरते और पूजा करते हैं, वे हमारे परमेश्वर की एक आज्ञा से अपनी जगह पर बैठ जाती हैं।
एक बारीकी
"अन्तर" के लिए इब्रानी शब्द है राक़ीअ, और उसकी जड़ का अर्थ है धातु को पीटकर पतला फैलाना, जैसे सुनार सोने की चादर बनाता है। यानी आकाश यहाँ खाली जगह नहीं, एक फैलाई गई चादर है, हथौड़े से पीटकर तानी गई छत। इस चित्र में परमेश्वर कारीगर हैं और आकाश उनका पीटा हुआ काम। यह हमारी आधुनिक कल्पना से मेल नहीं खाता, पर इसमें एक बात है जो हमारी कल्पना में कम है: आकाश कोई शून्य नहीं, वह किसी के हाथ का बनाया हुआ ढाँचा है, जो पकड़कर रखता है। जब भजनकार कहते हैं कि परमेश्वर ने आकाश को तम्बू की तरह तान दिया, वे इसी शब्द की दुनिया में बोल रहे हैं। रोज़ सिर उठाकर आप एक छत देखते हैं, न कि खालीपन।
कठिन प्रश्न
तो क्या बाइबल ग़लत विज्ञान सिखाती है? क्योंकि ऊपर जल का भण्डार और नीचे जल, बीच में पीटी हुई चादर, यह प्राचीन विश्व-चित्र है, हमारा नहीं। इसे झटपट सुलझा देना बेईमानी होगी। ईमानदार उत्तर यह है कि परमेश्वर अपने लोगों से उनकी भाषा और उनके आकाश की तस्वीर में बात करते हैं, ठीक जैसे हम आज भी "सूरज निकला" कहते हैं और झूठ नहीं बोलते। पाठ का दावा यह नहीं कि ऊपर कितने लीटर पानी है; उसका दावा यह है कि जो कुछ भी हमें कुचल सकता था, वह किसी और के वचन के अधीन रखा गया है। फिर भी बेचैनी पूरी तरह नहीं जाती, और शायद जानी भी नहीं चाहिए: हम एक ऐसी किताब पढ़ रहे हैं जो हमारी शर्तों पर बात नहीं करती।
चिंतन के प्रश्न
आपके जीवन में इस समय कौन सा "ऊपर का जल" है जिसे आप अपनी योजनाओं से रोके रखने की कोशिश कर रहे हैं, और आपकी प्रार्थना कैसे बदलेगी अगर वह सीमा वास्तव में परमेश्वर के वचन पर टिकी है?
लाल समुद्र से लेकर तूफान थमने तक, परमेश्वर बार-बार जल को अलग करके जीने की जगह बनाते हैं; आपके जीवन का कौन सा हिस्सा अभी ऐसी जगह बनने की प्रतीक्षा में है?
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Genesis 1:7 के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
इस बाइबल अंश के बारे में सामान्य प्रश्नों के त्वरित उत्तर।
उत्पत्ति 1:7 का क्या अर्थ है?
उत्पत्ति 1:7 किस विषय में है?
उत्पत्ति 1:7 का ऐतिहासिक संदर्भ क्या है?
उत्पत्ति 1:7 हमें परमेश्वर के स्वभाव के बारे में क्या सिखाता है?
उत्पत्ति 1:7 आज भी कैसे प्रासंगिक है?
Genesis 1 पर समुदाय क्या साझा करता है
इस अंश पर पाठकों और संपादकीय टीम से अंतर्दृष्टि, प्रार्थनाएँ और धन्यवाद।
तब सांझ हुई फिर भोर हुआ। इस प्रकार पाँचवाँ दिन हो गया।" ध्यान दे, परमेश्वर का दिन सांझ से शुरू होता है, भोर से नहीं। पहले अंधेरा, फिर उजाला। जहाँ तू आज खड़ा है, शायद वह सांझ हो, अंत नहीं, बल्कि एक नई शुरुआत का पहला पहर। जो उसने पाँचवें दिन किया, वही वह तेरे अंधेरे में भी कर रहा है।
पिता, आपने आकाशमण्डल को स्वर्ग कहा, और मैं हर सुबह उस नीले विस्तार को देखकर धन्यवाद देता हूँ। सांझ हुई फिर भोर हुआ, यह क्रम आपके हाथ में है। इसलिए मेरे दिनों की गिनती भी आप ही करते हैं, और यह मुझे शान्ति देता है।
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