उत्पत्ति 12:12
पाठ
मिस्र की सीमा अभी दूर नहीं है। अकाल ने अब्राम को उस देश से बाहर धकेल दिया है जिसे परमेश्वर ने अभी-अभी उसके वंश को देने का वादा किया था, और रास्ते में, धूल और भूख के बीच, वह अपनी पत्नी की ओर मुड़कर एक गणित प्रस्तुत करता है। वचन 12 उसी गणित का हृदय है: "और जब मिस्री तुझे देखेंगे, तब कहेंगे, 'यह उसकी पत्नी है,' इसलिए वे मुझ को तो मार डालेंगे, पर तुझको जीवित रख लेंगे।" ध्यान दीजिए, यह प्रार्थना नहीं है, यह पूर्वानुमान है। अब्राम भविष्य को पढ़ रहा है, परन्तु परमेश्वर के वादे की रोशनी में नहीं, बल्कि अपनी आशंका की रोशनी में। और उस पढ़े हुए भविष्य में केवल एक ही जान खतरे में दिखती है: उसकी अपनी।
केंद्र
यहाँ जो सबसे अधिक चुभता है वह अब्राम का झूठ नहीं, बल्कि उसका अंकगणित है। "वे मुझ को तो मार डालेंगे, पर तुझको जीवित रख लेंगे" में सारै का जीवित रहना उसके पक्ष में गिना जा रहा है, मानो फ़िरौन के महल में ले जाई जाना बचाव हो। अब्राम अपनी सुरक्षा को मुख्य समस्या मानता है और पत्नी की देह को उसका समाधान। यही पाप की सबसे शांत शक्ल है: डर के क्षण में दूसरे की गरिमा को अपनी सुरक्षा की मुद्रा बना देना। और फिर भी, यही वह व्यक्ति है जिससे परमेश्वर ने कहा था कि सारे कुल उसके द्वारा आशीष पाएँगे। वादा अब्राम के साहस पर नहीं, परमेश्वर की निष्ठा पर टिका है; बाइबल हमें यह छिपाकर नहीं, दिखाकर बताती है कि अनुग्रह किसे उठाता है।
सूत्र
इस दृश्य को ध्यान से देखिए, क्योंकि यह बाद में पूरी क़ौम की कहानी बन जाएगा: अकाल, मिस्र जाना, वहाँ दबाव, यहोवा का फ़िरौन पर विपत्तियाँ डालना, और सम्पत्ति के साथ बाहर निकाला जाना। जो अब्राम के साथ छोटे पैमाने पर होता है, वही निर्गमन में इस्राएल के साथ बड़े पैमाने पर होगा। परमेश्वर वादे को उस व्यक्ति के डर से भी बचा लेते हैं जिसे वादा दिया गया था। और यहीं वह विरोध खुलता है जो मसीह तक जाता है: अब्राम कहता है "वे मुझ को तो मार डालेंगे", और अपनी जान बचाने के लिए दूसरे को आगे कर देता है। अब्राम के वंश से आया वह एक, जिसके द्वारा "भूमण्डल के सारे कुल" आशीष पाते हैं, ठीक उलटा करता है: वह दूसरों को बचाने के लिए स्वयं को आगे कर देता है। वादा उसी पर जाकर पूरा होता है, क्योंकि वहाँ अंकगणित पलट जाता है।
दर्पण
यह पद आपसे एक असुविधाजनक प्रश्न पूछता है: जब दबाव आता है, तो आपका पहला हिसाब किसके इर्द-गिर्द घूमता है? दफ़्तर में गलती पकड़ी जाती है और आप चुप रहते हैं जबकि जूनियर डाँट खाता है। कोई कठिन फ़ोन करना है, और आप पत्नी या पति को आगे कर देते हैं क्योंकि आपकी छवि बच जाएगी। परिवार में एक अप्रिय सच बोलना है, और आप इसे किसी और के हिस्से डाल देते हैं। हम इसे बुद्धिमानी कहते हैं, "व्यावहारिकता", "सबके भले के लिए"; अब्राम भी ऐसा ही कहता है, "जिससे तेरे कारण मेरा कल्याण हो"। डर झूठ नहीं बोलता, डर केवल गिनती बदल देता है, और गिनती में जो सबसे कमज़ोर है वही सबसे सस्ता पड़ता है।
आज, दस मिनट के भीतर, उस एक व्यक्ति को फ़ोन कीजिए या लिखिए जिसे आपने अपनी सुरक्षा के लिए आगे कर दिया था, और ठीक इतना कहिए: "उस दिन मैंने अपने बचाव के लिए तुम्हें आगे कर दिया। यह ग़लत था।"
संदर्भ
अब्राम पचहत्तर की उम्र में हारान छोड़ चुका है, कनान में वेदियाँ बना चुका है, और फिर "उस देश में अकाल पड़ा"। कनान वर्षा पर जीता था; मिस्र नील नदी पर, इसलिए अकाल के समय मिस्र ही अनाज का भंडार था। पर वहाँ जाने वाला प्रवासी क़ानून के बाहर होता था: कोई कुल नहीं, कोई संरक्षण नहीं, कोई अदालत नहीं जहाँ अपील की जा सके। एक शक्तिशाली अधिकारी किसी विदेशी की पत्नी को महल में ले जाना चाहे, तो पति ही एकमात्र क़ानूनी अड़चन था, और अड़चन हटाने का सीधा तरीक़ा पति को मार देना था। अब्राम का डर कल्पना नहीं, उस दुनिया की ठंडी सच्चाई थी। सवाल यह नहीं कि उसका डर तर्कसंगत था या नहीं; सवाल यह है कि वादा देने वाले परमेश्वर उस तर्क में कहीं दिखते हैं या नहीं।
एक बारीकी
वाक्य के क्रम पर रुकिए: "वे मुझ को तो मार डालेंगे, पर तुझको जीवित रख लेंगे।" पहले "मुझ को", फिर "तुझको"। और "जीवित रख लेंगे" शब्दों को हल्के में न लीजिए। इब्रानी में यह क्रिया सक्रिय रूप से "जिलाए रखना" है, मानो कोई उपकार हो। पर फ़िरौन के महल में "जीवित रखी जाना" सारै के लिए क्या था? वचन 15 बताता है: "वह स्त्री फ़िरौन के महल में पहुँचाई गई।" अब्राम अपनी पत्नी के साथ होने वाले अन्याय को उसके जीवन-लाभ के खाते में लिख रहा है। यह भाषा का वह धोखा है जो हम सब जानते हैं: जब हमें किसी को नुक़सान पहुँचाना है, हम उसे "उसके फ़ायदे" के शब्दों में कह देते हैं। वेदी बनाने वाला आदमी अब शब्दों की वेदी बना रहा है।
मुख्य पात्र
इन तीन वचनों में एक बात की अनुपस्थिति सबसे ज़ोर से बोलती है: अब्राम के मुँह से "यहोवा" का नाम एक बार भी नहीं निकलता। जो आदमी शेकेम में और बेतेल के पास वेदियाँ बनाकर "यहोवा से प्रार्थना की", वह अब केवल परिस्थिति, सौंदर्य, जोखिम और लाभ की भाषा बोलता है। ध्यान दीजिए कि यही वह आदमी है जिसे इब्रानियों 11 विश्वास का उदाहरण कहता है। विश्वास और भय एक ही हृदय में साथ रह सकते हैं; बुलाहट पर घर छोड़ देना और भूख के सामने पत्नी को दाँव पर लगा देना एक ही आदमी कर सकता है। यह हमें राहत देने के लिए नहीं, ईमानदार बनाने के लिए लिखा गया है। अब्राम की महानता उसके चरित्र में नहीं, उस परमेश्वर में है जो उसके गिरने पर भी वादे से पीछे नहीं हटते।
चिंतन
पिछले महीने में किस एक क्षण में मैंने अपनी सुरक्षा को "सबके भले" की भाषा में लपेटकर किसी और की कीमत पर चुना?
जब मैं डर के भीतर से भविष्य का हिसाब लगाता हूँ, तो परमेश्वर के कौन-से वादे उस हिसाब से गायब रहते हैं, और क्यों?
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