उत्पत्ति 47
पाठ
अकाल के बीच याकूब का परिवार मिस्र पहुँचता है; यूसुफ़ पाँच भाइयों और अपने पिता को फ़िरौन के सामने खड़ा करता है, और बूढ़ा याकूब सम्राट को आशीर्वाद देकर अपने जीवन को "थोड़े और दुःख से भरे" दिन कहता है। इसके बाद कहानी अचानक अर्थव्यवस्था में उतर जाती है: यूसुफ़ अन्न के बदले पहले रुपया, फिर पशु, फिर भूमि, और अन्त में लोगों के शरीर तक फ़िरौन के लिये मोल ले लेता है, और पंचमांश का स्थायी नियम बनाता है। अन्त में याकूब यूसुफ़ से शपथ लेता है कि उसकी हड्डियाँ मिस्र में न रहें, कनान में लौटें।
मर्म
पद 25 पर रुकिए: "तूने हमको बचा लिया है… और हम फ़िरौन के दास होकर रहेंगे।" यही वाक्य इस अध्याय की नैतिक धार है। बचाया जाना और बिक जाना एक ही साँस में। परमेश्वर वास्तव में यूसुफ़ के द्वारा जीवन बचाते हैं, यह पाठ इससे इनकार नहीं करता; परन्तु वह उस कीमत को छिपाता भी नहीं जो व्यवस्था के हाथों में जमा हुई शक्ति वसूल करती है। यहाँ ईश्वरीय प्रबन्ध और मानवीय राजनीति एक-दूसरे में उलझी हुई हैं, और लेखक हमें आसानी से यह कहने नहीं देता कि सब कुछ शुद्ध था। परमेश्वर टेढ़े ढाँचों के भीतर भी अपनी प्रजा को जीवित रखते हैं, और वही प्रजा उन ढाँचों की भागीदार भी बन जाती है।
सूत्र
गोशेन में इस्राएल "फूले-फले, और अत्यन्त बढ़ गए" (पद 27), ठीक वही शब्द जो सृष्टि और अब्राहम की प्रतिज्ञा से गूँजते हैं। परमेश्वर वचन निभा रहे हैं, परन्तु प्रतिज्ञा की भूमि से बाहर, एक विदेशी सम्राट के अन्नागार की छाया में। इसीलिए याकूब की शपथ इतनी भारी है: वह मिस्र की सबसे अच्छी भूमि में गड़ना नहीं चाहता, क्योंकि उसका भविष्य वहाँ नहीं है। यह लालसा उस बड़े कथानक की ओर इशारा करती है जो निर्गमन में खुलेगी और जिसे मसीह पूरा करेंगे: एक ऐसा उद्धारकर्ता जो अन्न के बदले लोगों को खरीदता नहीं, बल्कि स्वयं को देकर दासों को स्वतंत्र करता है।
दर्पण
यह अध्याय आपके पर्स और आपके पद पर हाथ रखता है। यूसुफ़ के पास सूचना, भंडार और नियम बनाने का अधिकार था; आपके पास भी किसी न किसी रूप में शक्ति है, चाहे वह स्कूल की कक्षा हो, दफ़्तर की टीम हो, या घर में पैसे का नियंत्रण। सवाल यह नहीं कि आप शक्ति रखते हैं या नहीं, बल्कि यह कि जब दूसरा व्यक्ति मजबूर होकर आपके पास आता है, तब आप क्या करते हैं। भूखा आदमी हर शर्त मान लेता है। जिस कर्मचारी को नौकरी की सख्त ज़रूरत है, जिस रिश्तेदार को उधार चाहिए, जिस बच्चे को आपकी स्वीकृति चाहिए, उससे "स्वैच्छिक" सहमति लेना बहुत आसान है। और सबसे कठोर बात: दूसरे आपको धन्यवाद भी देंगे, जैसे मिस्रियों ने दिया, और तब भी वह न्यायपूर्ण न हो।
पृष्ठभूमि
पहले सुननेवाले वे इस्राएली थे जो मिस्र की दासता को याद रखते थे या उसकी कहानियाँ सुनकर बड़े हुए थे। उनके कानों में पद 21 का "उसको उसने नगरों में लाकर बसा दिया" कोई निर्दोष प्रशासनिक विवरण नहीं था; वे जानते थे कि भूमि से उखाड़ा गया आदमी बाद में ईंट बनाने के लिये उपलब्ध हो जाता है। उन्हें यह भी चुभा होगा कि याजकों की भूमि नहीं बिकी, क्योंकि उन्हें फ़िरौन से नित्य भोजन मिलता था; धार्मिक वर्ग हर काल में संकट से बचा रहता है। और उन्हें राहत भी मिली होगी: उनके पुरखा यहाँ अतिथि थे, "परदेशी की भाँति", और उनका सच्चा घर कहीं और था।
बारीकी
पद 29 में याकूब यूसुफ़ से "कृपा और सच्चाई" का काम माँगता है। इब्रानी में ये दो शब्द, ख़ेसेद वे-एमेत, आमतौर पर परमेश्वर के वाचा-प्रेम के लिये प्रयोग होते हैं: वह निष्ठा जो टिकती है क्योंकि उसने वचन दिया, न कि क्योंकि उसे कुछ मिलेगा। और यहाँ इसका ठोस अर्थ है एक शव को सैकड़ों मील ढोकर ले जाना। ध्यान दें, यह वही वफ़ादारी है जो अध्याय के आर्थिक सौदों में कहीं नहीं दिखती। रुपया, पशु, भूमि, शरीर: सब विनिमय था। परन्तु मरते हुए पिता के लिये किया गया काम विनिमय नहीं है, क्योंकि वह कभी बदला नहीं दे सकता। यहीं नैतिकता का असली माप छिपा है।
अन्तर्पाठ
निर्गमन 1 इस अध्याय का कड़वा उत्तर है: "मिस्र में एक नया राजा हुआ जो यूसुफ़ को नहीं जानता था", और जो व्यवस्था यूसुफ़ ने बनाई थी वही उसकी अपनी सन्तान को कुचलती है। जो ढाँचा आप आज अच्छे इरादों से खड़ा करते हैं, कल किसी और के हाथ में हथियार बन सकता है; यह विचार जिम्मेदारी को हल्का नहीं, भारी करता है। दूसरी ओर इब्रानियों 11:21 पद 31 के उस झुके हुए सिर को विश्वास कहता है। मरते हुए याकूब के पास न भूमि थी, न शक्ति, केवल एक शपथ और एक प्रतिज्ञा। और यही अन्त में गिना जाता है।
आपके जीवन में वह कौन है जो आपको कुछ नहीं लौटा सकता, और आप उसके साथ "कृपा और सच्चाई" का कौन-सा ठोस काम इस महीने कर सकते हैं?
कहाँ आप ऐसी व्यवस्था से लाभ उठा रहे हैं जिसमें आपकी सुरक्षा किसी और की मजबूरी पर टिकी है, और आपने अब तक उसे देखने से इनकार किया है?
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Genesis 47 के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
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Genesis 47 पर समुदाय क्या साझा करता है
इस अंश पर पाठकों और संपादकीय टीम से अंतर्दृष्टि, प्रार्थनाएँ और धन्यवाद।
उसने अपने भाइयों में से पाँच को लेकर फ़िरौन के सामने खड़ा किया।" जिन भाइयों ने उसे गड्ढे में डाला था, उन्हीं को यूसुफ राजा के सामने ले आता है। वह उनसे शर्मिंदा नहीं, न उनका अतीत छिपाता है। सोचो, क्या तुम्हारे जीवन में कोई ऐसा है जिसे तुम अपने साथ खड़ा करने से कतराते हो? क्षमा सिर्फ़ मन में नहीं होती, वह लोगों के सामने दिखती है।
याकूब भूखे परिवार के साथ, बुढ़ापे में, दूसरे देश में शरण लेने आया था। उसके पास देने के लिए कुछ नहीं था। फिर भी लिखा है, "याकूब ने फ़िरौन को आशीर्वाद दिया।" जिसके हाथ खाली थे, उसने संसार के सबसे शक्तिशाली राजा को आशीष दी।
तुम्हारी कमी तुम्हें आशीष देने से नहीं रोकती। परमेश्वर की वाचा तुम्हारे भीतर है, और वही तुम्हारा धन है।
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