उत्पत्ति 7
पाठ
सात दिन की चुप्पी के बाद परमेश्वर ने नूह को घराने समेत जहाज में बुलाया, शुद्ध पशुओं के सात-सात जोड़े और अशुद्ध के दो-दो साथ लेने को कहा, और चालीस दिन की वर्षा की घोषणा की। नूह ने ठीक वैसा ही किया; छः सौवें वर्ष के दूसरे महीने के सत्रहवें दिन गहरे समुद्र के सोते फूट निकले और आकाश के झरोखे खुल गए। जल डेढ़ सौ दिन तक प्रबल रहा, पहाड़ डूब गए, नथनों में श्वास रखनेवाला सब कुछ मिट गया, और बचे केवल वे जो जहाज में थे।
मूल बात
इस अध्याय का सबसे चौंकाने वाला वाक्य वर्षा के बारे में नहीं है: "तब यहोवा ने जहाज का द्वार बन्द कर दिया।" द्वार भीतर से नहीं, बाहर से बंद हुआ। नूह ने जहाज बनाया, पर उसे सुरक्षित करने का काम उसके हाथ में नहीं था। यही इस पाठ का धर्मशास्त्रीय केंद्र है: उद्धार मानव परिश्रम का पुरस्कार नहीं, परमेश्वर का कार्य है। नूह "धर्मी पाया गया", पर पाया गया, स्वयं को सिद्ध नहीं किया। और वही हाथ जो द्वार बंद करता है, वही झरोखे खोलता है। न्याय और अनुग्रह यहाँ दो अलग परमेश्वरों से नहीं आते; वे एक ही इच्छा के दो पहलू हैं। यह सुखद सत्य नहीं है, पर सुसमाचार की नींव इसी पर टिकी है।
सूत्र
यहाँ सृष्टि उलटी चल रही है। उत्पत्ति 1 में परमेश्वर ने जल को ऊपर और नीचे बाँटकर सूखी भूमि प्रकट की थी; अब वही बाँध टूटते हैं, "बड़े गहरे समुद्र के सब सोते" (इब्रानी में तहोम, वही गहरा जल जो सृष्टि के पहले दिन पृथ्वी को ढाँपे था) लौट आते हैं। संसार अपनी आदिम अव्यवस्था में सरक जाता है। पर जल के ऊपर एक पेटी तैरती रहती है जिसमें जीवन का बीज सुरक्षित है। यही परमेश्वर का ढंग है: वे पुराने को मिटाकर नया आरंभ करते हैं, पर सदा एक शेष बचाकर। मूसा की टोकरी से लेकर क्रूस के बाद खाली कब्र तक, यही लय चलती है। मसीह स्वयं वह जहाज हैं जिसमें होकर मृत्यु का जल हमें डुबाता नहीं।
दर्पण
जहाज में चालीस दिन अँधेरा, पशुओं की बदबू, लकड़ी की चरमराहट, और बाहर से आती चीखें रही होंगी। नूह बचा, पर उसने अपने पड़ोसियों को डूबते सुना। बचाया जाना हमेशा हल्का अनुभव नहीं होता। आप शायद उस नौकरी में टिके रहे जहाँ दूसरों की छँटनी हुई, उस बीमारी से उबरे जिसने किसी और को ले लिया, उस परिवार में हैं जहाँ एक भाई टूट गया और आप नहीं। इसे संयोग कहकर टालना आसान है, और अपनी धार्मिकता का प्रमाण समझना और भी आसान। पाठ दोनों रास्ते बंद करता है: धर्मी वही है जिसे परमेश्वर ने धर्मी पाया, और वह भी द्वार बंद होने पर पूरी तरह उनकी दया पर निर्भर है।
आज एक काम कीजिए: उस एक व्यक्ति का नाम कागज़ पर लिखिए जो इस समय "बाहर" है, डूबता हुआ सा, और उस नाम को हाथ में लेकर पाँच मिनट प्रार्थना कीजिए।
संदर्भ
प्राचीन पूर्व में जलप्रलय की कहानियाँ अनजानी नहीं थीं। मेसोपोटामिया की नदियों के बीच रहने वाले लोग जानते थे कि पानी क्या कर सकता है; उनकी कथाओं में देवता मनुष्यों के शोर से चिढ़कर, नींद में खलल पड़ने पर, प्रलय भेजते हैं, और फिर बलिदान की गंध पर मक्खियों की तरह टूट पड़ते हैं। इस्राएल के पहले श्रोता यह विवरण उसी पृष्ठभूमि में सुनते थे, और अंतर तुरंत खटकता था। यहाँ परमेश्वर झुँझलाए हुए नहीं, दुखी और न्यायी हैं। प्रलय मनमानी नहीं, नैतिक है। और तारीखें, छः सौवाँ वर्ष, दूसरा महीना, सत्रहवाँ दिन, कहानी को मिथक से निकालकर कैलेंडर में रख देती हैं। यह किसी देवता का तूफ़ान नहीं; यह इतिहास के स्वामी का निर्णय है।
प्रश्न
फिर भी वह चुभन बनी रहती है: बच्चे भी डूबे, पशु भी, पक्षी भी। "जितनों के नथनों में जीवन का श्वास था, सब मर मिटे।" पशुओं ने क्या पाप किया था? पाठ उत्तर नहीं देता, और हमें भी उत्तर गढ़ने का अधिकार नहीं। वह इतना ही कहता है कि मनुष्य की हिंसा अपने साथ पूरी सृष्टि को खींच ले जाती है; पाप कभी निजी नहीं रहता। यह हमें आज भी दिखता है, जब एक पीढ़ी का लालच अगली पीढ़ी की हवा और पानी चुका देता है। पर यह व्याख्या घाव को भरती नहीं। यहाँ ईमानदारी यही है कि हम परमेश्वर के न्याय के सामने चुप रहें, समझाने की जल्दबाज़ी छोड़कर, और उसी परमेश्वर पर भरोसा रखें जिन्होंने बाद में स्वयं जल में उतरकर मरना चुना।
अंतर्पाठ
पतरस अपनी पहली पत्री में इसी जहाज की ओर लौटता है और कहता है कि उसमें आठ प्राण जल के द्वारा बचाए गए, और बपतिस्मा इसका प्रतिरूप है। यह अजीब तुलना है, क्योंकि जल तो मारनेवाला था; पर पतरस का मतलब यही है, कि मसीह में हम उस मृत्यु से होकर गुज़रते हैं जो हमें डुबो सकती थी। दूसरी ओर यीशु स्वयं नूह के दिनों की चर्चा करते हैं, जहाँ लोग खाते-पीते, ब्याह करते रहे और उन्हें कुछ पता न चला जब तक प्रलय आकर सब बहा न ले गया। उनका ज़ोर पाप की सूची पर नहीं, लापरवाही पर है। सबसे बड़ा खतरा दुष्टता नहीं, यह मान लेना है कि कल आज जैसा ही रहेगा।
चिंतन
जब परमेश्वर ने द्वार बंद किया, तो नूह के पास न खिड़की थी न नियंत्रण। आपके जीवन का कौन सा हिस्सा इस समय ऐसा ही है, और क्या आप उसे परमेश्वर का बंद किया हुआ द्वार मान पाते हैं?
नूह ने "यहोवा की इस आज्ञा के अनुसार" किया, बिना किसी प्रमाण के कि वर्षा सचमुच आएगी। आज आपसे किस आज्ञा में ऐसी ही बिना प्रमाण वाली आज्ञाकारिता माँगी जा रही है?
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Genesis 7 पर समुदाय क्या साझा करता है
इस अंश पर पाठकों और संपादकीय टीम से अंतर्दृष्टि, प्रार्थनाएँ और धन्यवाद।
और चालीस दिन और चालीस रात निरन्तर पृथ्वी पर जल बरसता रहा।" नूह ने सौ साल जहाज बनाया, पर तूफान पहले ही दिन खत्म नहीं हुआ। चालीस दिन तक सिर्फ पानी की आवाज, और बाहर देखने को कोई खिड़की नहीं। कभी-कभी परमेश्वर की सुरक्षा ऐसी ही लगती है, बंद दरवाज़ा और लंबा इंतज़ार। तू भी गिन रहा है न, कितने दिन हो गए? वह जहाज़ तुझे डुबाने नहीं, उठाने के लिए है।
जितने प्राणी स्थल पर थे उनमें से जितनों के नथनों में जीवन का श्वास था, सब मर गए।" वही श्वास, जो परमेश्वर ने आदम के नथनों में फूँका था, यहाँ लौट जाता है। साँस हमारी सम्पत्ति नहीं, उधार है। आज जो साँस तुम बिना सोचे ले रहे हो, वह किसी की दया है। उसे किसके लिए खर्च कर रहे हो?
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