बाइबल व्याख्या

उत्पत्ति 9:6

बाइबल
यह वचन Christian fellowship द्वारा समर्पित है

पाठ

जल-प्रलय की राख अभी ठंडी भी नहीं हुई थी कि परमेश्वर एक ऐसा वाक्य बोलते हैं जो सुनने में कठोर लगता है: "जो कोई मनुष्य का लहू बहाएगा उसका लहू मनुष्य ही से बहाया जाएगा।" यानी जो किसी की जान लेगा, उसकी जान का हिसाब लिया जाएगा, और यह हिसाब लेने का काम परमेश्वर मनुष्यों के हाथ में सौंप देते हैं। और फिर वे कारण बताते हैं, जो पूरे वाक्य का भार उठाता है: "क्योंकि परमेश्वर ने मनुष्य को अपने ही स्वरूप के अनुसार बनाया है।" पिछले पद में वे पहले ही कह चुके हैं कि हर प्राण का बदला वे स्वयं लेंगे, यहाँ तक कि "एक-एक के भाई-बन्धु से।" खून सस्ता नहीं है। कभी नहीं था।

मूल बात

ध्यान दीजिए कि परमेश्वर हत्या को गलत इसलिए नहीं कहते कि इससे समाज टूटता है, या कि दुःख फैलता है, हालाँकि दोनों सच हैं। कारण कहीं गहरा है: मनुष्य परमेश्वर के स्वरूप में बना है। किसी इंसान पर हाथ उठाना उस मूर्ति को तोड़ना है जिस पर राजा का अपना चेहरा उकेरा गया है। इसलिए हत्या केवल अपराध नहीं, वह ईश्वर-निंदा का एक रूप है। और यहीं यह पद हमारी सोच को उलट देता है। हम मान लेते हैं कि किसी व्यक्ति का मूल्य उसकी उपयोगिता, उसकी उम्र, उसकी बुद्धि या उसके योगदान से तय होता है। परमेश्वर कहते हैं: मूल्य मेरी ओर से आता है, बाहर से चिपकाया गया है, भीतर से कमाया नहीं गया। यही कारण है कि जल-प्रलय के बाद का यह वचन दंड से ज़्यादा सुरक्षा है। परमेश्वर उस दुनिया के चारों ओर बाड़ लगा रहे हैं जिसे उन्होंने अभी-अभी बचाया है।

सूत्र

यह पहली बार नहीं है कि उत्पत्ति में लहू बोलता है। कैन के हाथों हाबिल के मरने के बाद परमेश्वर कहते हैं कि उसका लहू भूमि से पुकार रहा है, और वह पुकार अब तक शांत नहीं हुई। जल-प्रलय ठीक इसी हिंसा के कारण आया था, और प्रलय के बाद भी हिंसा की जड़ मनुष्य के भीतर बनी हुई है। इसलिए परमेश्वर बाड़ लगाते हैं: लहू का हिसाब होगा।

और यहीं से एक रेखा सीधे गुलगुता तक जाती है। इब्रानियों की पत्री कहती है कि मसीह का लहू हाबिल के लहू से उत्तम बात कहता है। हाबिल का लहू न्याय माँगता है; मसीह का लहू क्षमा माँगता है। पर ध्यान दीजिए, वह क्षमा इस पद को रद्द नहीं करती, वह इसे पूरा करती है। लहू का दाम चुकाया ही गया, केवल दोषी ने नहीं, बल्कि उस निर्दोष ने जो स्वयं परमेश्वर का पूर्ण स्वरूप है।

दर्पण

आपने शायद कभी किसी की जान नहीं ली। पर इस पद का तर्क आपके दिन के भीतर तक घुसता है। जब आप दफ्तर में उस सहकर्मी के बारे में वह बात दोहराते हैं जिससे उसकी साख थोड़ी और गिरे, जब आप घर में उस रिश्तेदार को मन ही मन काट देते हैं और तय कर लेते हैं कि अब वह आपके लिए मरा हुआ है, जब आप अपने बच्चे को उसकी नाकामी के कारण अपनी नज़रों में छोटा कर देते हैं, तब आप उसी स्वरूप को खरोंच रहे हैं जिसकी रक्षा परमेश्वर यहाँ कर रहे हैं। हम लोगों की कीमत लगाते रहते हैं: यह उपयोगी है, यह बोझ है, यह मेरे खेमे का है, यह दुश्मन है। परमेश्वर कहते हैं कि यह अधिकार आपके पास नहीं है, क्योंकि चेहरा उनका उकेरा हुआ है, आपका नहीं।

आज जिस व्यक्ति को आपने भीतर से काट दिया है, उसका नाम कागज़ पर लिखिए, और ज़ोर से कहिए: "यह व्यक्ति परमेश्वर के स्वरूप में बना है।" फिर उसी नाम के लिए एक वाक्य में प्रार्थना कीजिए।

कठिन प्रश्न

यह पद क्या मृत्युदंड का आदेश है? ईमानदारी से कहें तो पाठ इस सवाल को खुला छोड़ता है और साथ ही चुभता भी है। परमेश्वर हिसाब लेने का काम "मनुष्य ही से" कराते हैं, यानी वे न्याय की ज़िम्मेदारी उन्हीं हाथों में देते हैं जो स्वयं खून बहाने में सक्षम हैं। यही इस वचन का सबसे बेचैन करने वाला हिस्सा है। जो समाज हत्यारे को दंड देता है, वह बहुत आसानी से स्वयं बदले की मशीन बन जाता है, और इतिहास इसके उदाहरणों से भरा है।

मैं इसे चिकना नहीं करूँगा। पाठ न्याय को मंज़ूरी देता है, पर वही पाठ हत्यारे को भी परमेश्वर के स्वरूप में बना हुआ मानता है। इस तनाव को हल करने की जल्दबाज़ी मत कीजिए। यह हमें अधिकार देता है और साथ ही काँपते हुए चलने को मजबूर करता है।

संदर्भ

कल्पना कीजिए: पृथ्वी पर कुल आठ लोग हैं। कोई अदालत नहीं, कोई पुलिस नहीं, कोई राजा नहीं। न्याय का एकमात्र ढाँचा परिवार है, और परिवार में बदला लेना बहुत जल्दी खून की लड़ाई बन जाता है, जैसा लेमेक के डींग भरे गीत में दिखता है। प्राचीन पूर्व के कानूनों में मनुष्य की कीमत उसके वर्ग से तय होती थी: अमीर की जान महँगी, दास की सस्ती। इस पृष्ठभूमि में परमेश्वर का वचन क्रांतिकारी है। यहाँ कोई श्रेणी नहीं है। हर मनुष्य, चाहे वह किसी भी कुल का हो, स्वरूप-धारी है, और उसका लहू परमेश्वर के लेखे में दर्ज होता है। नई दुनिया की नींव में यही पत्थर रखा जा रहा है।

एक बारीकी

इस वाक्य की बनावट पर ठहरिए। इब्रानी में यह पंक्ति एक दर्पण की तरह मुड़ती है: लहू, मनुष्य, मनुष्य, लहू। "दम" शब्द दोनों सिरों पर खड़ा है और बीच में मनुष्य दो बार। यानी वाक्य की शक्ल ही उसका अर्थ है: जो किया गया, वही लौटकर आता है। यह केवल काव्य-सौंदर्य नहीं। यह बताता है कि परमेश्वर का न्याय मनमाना नहीं होता, वह अपराध की आकृति लेता है। और यह हमें एक चेतावनी भी देती है: जिस पैमाने से आप दूसरों को नापते हैं, वह पैमाना आपकी ओर मुड़ेगा। जो दूसरों की गरिमा को कुचलता है, वह अपनी गरिमा भी सुरक्षित नहीं रख सकता।

चिंतन

आपने पिछले महीने किसकी कीमत मन ही मन घटाई, और किस आधार पर?

यदि हत्यारा भी परमेश्वर के स्वरूप में बना है, तो न्याय की माँग और क्षमा की पुकार को आप अपने भीतर कैसे साथ रखेंगे?

Genesis में और गहराई से जानें

चुनी हुई पुस्तकें जो इस बाइबल पुस्तक को और गहराई से समझाती हैं।

Genesis

Derek Kidner

A beloved compact classic that opens up Genesis with warmth and precision.

The Message of Genesis 1-11

David Atkinson

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The Message of Genesis 12-50

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Abraham to Joseph: the promises of God traced through one family.

Genesis: Beginning and Blessing

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Genesis 9:6 के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

इस बाइबल अंश के बारे में सामान्य प्रश्नों के त्वरित उत्तर।

उत्पत्ति 9:6 का क्या अर्थ है?
जल-प्रलय की राख अभी ठंडी भी नहीं हुई थी कि परमेश्वर एक ऐसा वाक्य बोलते हैं जो सुनने में कठोर लगता है: "जो कोई मनुष्य का लहू बहाएगा उसका लहू मनुष्य ही से बहाया जाएगा।" यानी जो किसी की जान लेगा, उसकी जान का हिसाब लिया जाएगा, और यह हिसाब लेने का काम परमेश्वर मनुष्यों के हाथ में सौंप देते हैं। और फिर वे कारण बताते हैं, जो पूरे वाक्य का भार उठाता है: "क्योंकि परमेश्वर ने मनुष्य को अपने ही स्वरूप के अनुसार बनाया है।" पिछले पद में वे पहले ही कह चुके हैं कि हर प्राण का बदला वे स्वयं लेंगे, यहाँ तक कि "एक-एक के भाई-बन्धु से।" खून सस्ता नहीं है। कभी नहीं था।
उत्पत्ति 9:6 किस विषय में है?
यह पहली बार नहीं है कि उत्पत्ति में लहू बोलता है। कैन के हाथों हाबिल के मरने के बाद परमेश्वर कहते हैं कि उसका लहू भूमि से पुकार रहा है, और वह पुकार अब तक शांत नहीं हुई। जल-प्रलय ठीक इसी हिंसा के कारण आया था, और प्रलय के बाद भी हिंसा की जड़ मनुष्य के भीतर बनी हुई है। इसलिए परमेश्वर बाड़ लगाते हैं: लहू का हिसाब होगा।
उत्पत्ति 9:6 का ऐतिहासिक संदर्भ क्या है?
आपने शायद कभी किसी की जान नहीं ली। पर इस पद का तर्क आपके दिन के भीतर तक घुसता है। जब आप दफ्तर में उस सहकर्मी के बारे में वह बात दोहराते हैं जिससे उसकी साख थोड़ी और गिरे, जब आप घर में उस रिश्तेदार को मन ही मन काट देते हैं और तय कर लेते हैं कि अब वह आपके लिए मरा हुआ है, जब आप अपने बच्चे को उसकी नाकामी के कारण अपनी नज़रों में छोटा कर देते हैं, तब आप उसी स्वरूप को खरोंच रहे हैं जिसकी रक्षा परमेश्वर यहाँ कर रहे हैं। हम लोगों की कीमत लगाते रहते हैं: यह उपयोगी है, यह बोझ है, यह मेरे खेमे का है, यह दुश्मन है। परमेश्वर कहते हैं कि यह अधिकार आपके पास नहीं है, क्योंकि चेहरा उनका उकेरा हुआ है, आपका नहीं।
उत्पत्ति 9:6 हमें परमेश्वर के स्वभाव के बारे में क्या सिखाता है?
यह पद क्या मृत्युदंड का आदेश है? ईमानदारी से कहें तो पाठ इस सवाल को खुला छोड़ता है और साथ ही चुभता भी है। परमेश्वर हिसाब लेने का काम "मनुष्य ही से" कराते हैं, यानी वे न्याय की ज़िम्मेदारी उन्हीं हाथों में देते हैं जो स्वयं खून बहाने में सक्षम हैं। यही इस वचन का सबसे बेचैन करने वाला हिस्सा है। जो समाज हत्यारे को दंड देता है, वह बहुत आसानी से स्वयं बदले की मशीन बन जाता है, और इतिहास इसके उदाहरणों से भरा है।
उत्पत्ति 9:6 आज भी कैसे प्रासंगिक है?
कल्पना कीजिए: पृथ्वी पर कुल आठ लोग हैं। कोई अदालत नहीं, कोई पुलिस नहीं, कोई राजा नहीं। न्याय का एकमात्र ढाँचा परिवार है, और परिवार में बदला लेना बहुत जल्दी खून की लड़ाई बन जाता है, जैसा लेमेक के डींग भरे गीत में दिखता है। प्राचीन पूर्व के कानूनों में मनुष्य की कीमत उसके वर्ग से तय होती थी: अमीर की जान महँगी, दास की सस्ती। इस पृष्ठभूमि में परमेश्वर का वचन क्रांतिकारी है। यहाँ कोई श्रेणी नहीं है। हर मनुष्य, चाहे वह किसी भी कुल का हो, स्वरूप-धारी है, और उसका लहू परमेश्वर के लेखे में दर्ज होता है। नई दुनिया की नींव में यही पत्थर रखा जा रहा है।
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