यशायाह 40:2
पाठ
यह आयत एक आदेश है, और वह आदेश किसी सेनापति को नहीं, किसी प्रचारक को दिया गया है: यरूशलेम के पास जाओ और उसके कान में, उसके हृदय तक पहुँचने वाली बात कहो। तीन बातें कहनी हैं, और तीनों भूतकाल में हैं, मानो काम हो चुका हो। पहली, "तेरी कठिन सेवा पूरी हुई है" — बेगार का समय, बन्धुआई का बोझ, खत्म। दूसरी, "तेरे अधर्म का दण्ड अंगीकार किया गया है" — अपराध चुकाया जा चुका, परमेश्वर ने उसे स्वीकार कर लिया। तीसरी, और सबसे चौंकाने वाली, कि उसने "यहोवा के हाथ से" अपने सब पापों का दूना दण्ड पा लिया है। यानी जितना चाहिए था उससे अधिक, छलकता हुआ माप।
मर्म
इब्रानी में जो शब्द यहाँ है वह है दब्बेर अल-लेब, शब्दशः "हृदय पर बोलो"। यही मुहावरा पति के अपनी पत्नी को मनाने के लिए, प्रेमी के प्रेमिका को फुसलाने के लिए इस्तेमाल होता है। परमेश्वर यहाँ कानूनी घोषणा नहीं कर रहे, वे प्रेमालाप कर रहे हैं। और यही इस आयत का काँटा भी है: जिस हाथ ने मारा, वही हाथ अब सहला रहा है। "यहोवा के हाथ से" — निर्वासन कोई दुर्घटना नहीं था, कोई बाबुल की सैन्य श्रेष्ठता नहीं थी; वह परमेश्वर का ही न्याय था। जो परमेश्वर दण्ड को अपने हाथ का काम कहता है, वही परमेश्वर उसके अन्त की घोषणा भी कर सकता है। क्षमा यहाँ भावना नहीं, तथ्य है: कर्ज चुकता हुआ, और रसीद स्वयं न्यायी ने लिखी है। "दूना" का अर्थ अन्याय नहीं, बल्कि उदारता है, जैसे पिता लौटे हुए बेटे को नौकर नहीं, अँगूठी देता है।
सूत्र
मरकुस अपना सुसमाचार इसी अध्याय से शुरू करता है, और वह संयोग नहीं है। यूहन्ना बपतिस्मा देनेवाला जंगल में खड़ा होकर पद 3 चिल्लाता है, पर उसके पीछे पद 2 खड़ा है: बन्धुआई खत्म, कर्ज चुका। सवाल यह है कि कैसे चुका। यशायाह की पुस्तक स्वयं इसका उत्तर आगे देती है, जब वह उस दास का वर्णन करती है जिस पर हम सबका अधर्म लादा गया। बाबुल से लौटना केवल पूर्वाभ्यास था; असली बन्धुआई पाप की थी और असली लौटना क्रूस पर हुआ। "यहोवा के हाथ से" दण्ड मिला, कहता है यशायाह; और गेतसमनी में वही हाथ, वही कटोरा, पर इस बार निर्दोष के होंठों पर। मसीह में परमेश्वर ने अपनी ही माँग अपने ऊपर ले ली, और इसलिए घोषणा भूतकाल में हो सकती है।
दर्पण
आप जानते हैं कि क्षमा मिल चुकी है। फिर भी वह एक बात है जिसे आप हर कुछ महीनों में फिर से उठाकर देखते हैं, जैसे कोई पुराना बिल जिसे फेंकने की हिम्मत नहीं होती। शायद वह आपके विवाह में कहा गया वाक्य है, शायद वह पैसा जो आपने किसी से लिया और कभी लौटाया नहीं, शायद वह वर्ष जब आपके बच्चों को आपकी ज़रूरत थी और आप कहीं और थे। हम चुकाने की कोशिश करते रहते हैं: ज्यादा सेवा, ज्यादा सख्ती, खुद से ज्यादा नफरत। पर यह आयत कहती है कि हिसाब बन्द है, और बन्द करने वाला लेनदार स्वयं है। आपकी ग्लानि अब विनम्रता नहीं, अविश्वास है।
आज वह एक पुराना दोष जो बार-बार लौटता है, उसे कागज़ पर एक वाक्य में लिखिए, नीचे लिखिए "अंगीकार किया गया", और वह कागज़ फाड़ दीजिए।
अन्तर्पाठ
यही अध्याय आगे चलकर दिखाता है कि यह क्षमा करने वाला परमेश्वर कैसा है: "वह चरवाहे के समान अपने झुण्ड को चराएगा, वह भेड़ों के बच्चों को अँकवार में लिए रहेगा" (पद 11)। कर्ज चुकाने वाला न्यायी और गोद में उठाने वाला चरवाहा एक ही व्यक्ति है, और यूहन्ना 10 में यीशु ठीक यही पहचान अपने ऊपर लेते हैं। दूसरी ओर, पद 27 की शिकायत सुनिए: "मेरा परमेश्वर मेरे न्याय की कुछ चिन्ता नहीं करता।" निर्वासित लोग यही सोचते थे, कि परमेश्वर भूल गए हैं। पद 2 उस शिकायत का सीधा खण्डन है। परमेश्वर भूले नहीं थे; वे गिन रहे थे, और उन्होंने गिनती पूरी होने से पहले ही उसे पूरी घोषित कर दिया।
प्रश्न
"दूना दण्ड" खटकता है। क्या परमेश्वर ज़रूरत से ज्यादा मारते हैं? क्या न्याय में अति भी होती है? कुछ लोग इसे यूँ हल करते हैं कि इब्रानी शब्द का अर्थ "बराबर का जोड़ा" भी हो सकता है, यानी ठीक उतना जितना चाहिए था। पर यशायाह की भाषा में अतिशयोक्ति का स्वाद है, और उसे मिटा देना ईमानदारी नहीं। जो लोग सत्तर साल बाबुल में बैठे थे, उन्हें यह नहीं कहा गया कि तुम्हें उचित सज़ा मिली; उन्हें कहा गया कि अब बहुत हुआ। दुख कभी-कभी अपराध से बड़ा महसूस होता है, और परमेश्वर उस अनुभव को झुठलाते नहीं। वे उसे स्वीकार करते हैं और फिर उसे समाप्त कर देते हैं। यह तर्क से ज्यादा कृपा है, और कृपा हमेशा हिसाब से बड़ी होती है।
पृष्ठभूमि
कल्पना कीजिए एक ऐसी पीढ़ी की जिसने मन्दिर जलते देखा, राजा की आँखें फोड़ी जाते देखीं, और फिर सैकड़ों मील पैदल चलकर एक विदेशी साम्राज्य में बस गई। बाबुल में यहूदी गुलाम नहीं थे, पर वे कोई नहीं थे: बिना मन्दिर, बिना राजा, बिना भूमि। उनके आसपास के लोग मर्दूक के जुलूस निकालते थे और पूछते थे कि तुम्हारा देवता कहाँ है। स्वाभाविक निष्कर्ष यह था कि यहोवा हार गए। अध्याय 40 इसी हवा में बोला जाता है, और वह मन्दिर की भाषा में नहीं, दरबार की भाषा में शुरू होता है: स्वर्गीय सभा में एक राजकीय घोषणा, जो दूतों के द्वारा निर्वासित नगरी तक पहुँचाई जानी है। खबर यह नहीं कि हालात सुधरेंगे, खबर यह है कि राजा स्वयं आ रहे हैं।
चिंतन
आपके जीवन में वह कौन सा "बिल" है जिसे परमेश्वर चुका हुआ कहते हैं, पर आप अब भी किश्तों में भर रहे हैं?
यदि आपको आज किसी एक व्यक्ति के "हृदय पर बोलना" हो, न्याय की भाषा में नहीं बल्कि सान्त्वना की भाषा में, तो वह कौन होगा और आप क्या कहेंगे?
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Isaiah 40:2 के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
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