यशायाह 42
पाठ
अध्याय दो आवाज़ों में बँटा है। पहले परमेश्वर अपने चुने हुए दास को सामने लाते हैं: शांत, अटूट, न्याय को पृथ्वी पर स्थिर करने वाला, जो कुचले हुए नरकट को नहीं तोड़ता। फिर सारी सृष्टि को नया गीत गाने का न्योता मिलता है, और यहोवा एक योद्धा की तरह, बल्कि प्रसव-पीड़ा से चिल्लाती स्त्री की तरह, अपनी लंबी चुप्पी तोड़ते हैं। और अंत में वही परमेश्वर अपने दास इस्राएल की ओर मुड़कर पूछते हैं: तुझसे बढ़कर अंधा और बहरा कौन है?
मर्म
एक ही शब्द, "दास", दो बिलकुल उलटी तस्वीरों पर चिपका है। पद 1 का दास वह है जिससे परमेश्वर का जी प्रसन्न है; पद 19 का दास वह है जो देखता है पर देखता नहीं, जिसके कान खुले हैं पर सुनता नहीं। यही इस अध्याय का धड़कता हुआ हृदय है: परमेश्वर अपनी योजना उस जाति के ज़रिए पूरी करना चाहते थे जो उसे ढोने के काबिल नहीं थी, इसलिए वे स्वयं एक ऐसा दास खड़ा करेंगे जो न थकेगा और न हियाव छोड़ेगा। उद्धार इसलिए संभव है क्योंकि परमेश्वर हमारी असफलता को अपनी योजना का अंत नहीं बनने देते। वे अपनी महिमा किसी मूरत को नहीं देते, पर अपना काम एक कमज़ोर लोगों के बीच करने से पीछे नहीं हटते।
मुख्य सूत्र
पद 1 के शब्द यरदन नदी के किनारे फिर सुनाई देते हैं, जब आकाश से आवाज़ आती है कि यह मेरा प्रिय पुत्र है जिससे मैं प्रसन्न हूँ। मत्ती ने बाद में सीधे इसी अध्याय को यीशु पर लागू किया, और यह जोड़ आकस्मिक नहीं है: जो मसीह भीड़ को चंगा करने के बाद कहते हैं कि किसी से न कहना, वही वह दास है जो सड़क पर अपनी वाणी नहीं सुनाता। पद 6-7 का बुलावा, अंधों की आँखें खोलना और बंदियों को कालकोठरी से निकालना, नासरत की सभा में यीशु के मुँह से पूरा होता है। और पद 22 के लुटे हुए, गड्ढों में फँसे लोग, जिन्हें कोई नहीं छुड़ाता, ठीक वही हैं जिनके लिए यह दास आता है। पुराना नियम यहाँ ज़ख्म दिखाता है, नया नियम मरहम लाता है।
दर्पण
आप शायद उस टिमटिमाती बत्ती को पहचानते हैं। वह विवाह जो अब सिर्फ़ रस्म से चल रहा है। वह प्रार्थना जो पिछले महीने से एक भी बार नहीं हुई। वह नौकरी जिसमें आप हर सुबह मुस्कुराकर घुसते हैं और भीतर से खोखले लौटते हैं। हमारी आदत यह है कि हम खुद अपनी टिमटिमाती बत्ती को बुझा देना चाहते हैं, क्योंकि आधी जलती लौ लज्जा दिलाती है। पर यह दास बुझाता नहीं। साथ ही, पद 19 आपको आराम से बैठने नहीं देता: सबसे अंधा वह नहीं जो कभी बाइबल नहीं पढ़ता, बल्कि वह दास है जो सब कुछ जानता है और फिर भी नहीं देखता। पद 25 का वाक्य चुभता है, "वह जल भी गया, तो भी न चेता।" कौन-सी आग आपके चारों ओर बरसों से लगी है जिसे आप व्यस्तता कहकर टाल रहे हैं?
शास्त्र-संवाद
पद 8 में परमेश्वर कहते हैं, "अपनी महिमा मैं दूसरे को न दूँगा", और उसके ठीक बाद पद 17 में मूरतों पर भरोसा रखनेवालों की लज्जा आती है। भजन 115 वही तर्क आगे बढ़ाता है: मूरतों के मुँह हैं पर वे बोलते नहीं, आँखें हैं पर देखते नहीं, और उन्हें बनानेवाले उन्हीं के समान हो जाते हैं। यह इस अध्याय की चाबी है। इस्राएल इसलिए अंधा और बहरा हुआ क्योंकि वह अंधी और बहरी चीज़ों की पूजा करता रहा। हम जिसकी उपासना करते हैं, उसी की शक्ल हम पर चढ़ती जाती है। इसलिए पद 18 का बुलावा, "हे बहरों, सुनो; हे अंधों, आँख खोलो", केवल आदेश नहीं, एक करुणा भरी पुकार है।
पहला श्रोता-वर्ग
ये शब्द उन लोगों तक पहुँचे जो बाबुल में थे या उस विनाश की छाया में जी रहे थे। मंदिर राख हो चुका था, राजा अंधा किया जा चुका था, और सबसे बड़ा सवाल यह था कि क्या यहोवा हार गए। पद 24 का उत्तर उन्हें राहत और चोट दोनों देता है: बाबुल जीता नहीं, परमेश्वर ने अपनी ही प्रजा को सौंप दिया। यह विश्वास बचाता है, पर आत्म-दया छीन लेता है। और पद 14 की चुप्पी उनके अपने अनुभव का नाम है, बरसों की खामोशी। उनके लिए यह सुनना कि वह चुप्पी उदासीनता नहीं बल्कि प्रसव की रोक थी, आँसुओं को अर्थ देता था।
मुख्य पात्र
इस अध्याय में परमेश्वर का चित्र चौंकाने वाला है। पद 5 में वे आकाश तानने वाले हैं, विशाल और शांत; पद 13 में वे योद्धा की तरह ललकारते हैं; और पद 14 में वे जच्चा की तरह हाँफते हैं। सृष्टिकर्ता, सेनापति और प्रसव-पीड़ा में तड़पती माता, तीनों एक ही वाक्यखंड में। यही परमेश्वर पद 16 में अंधों का हाथ पकड़कर अनजाने रास्ते पर ले चलते हैं और कहते हैं, "मैं ऐसे-ऐसे काम करूँगा और उनको न त्यागूँगा।" उनका क्रोध असली है, पर उनकी पकड़ उससे भी मज़बूत है। जो परमेश्वर अपनी महिमा किसी को नहीं देते, वही अपने अंधे दास का हाथ नहीं छोड़ते।
चिंतन
आपके जीवन में इस समय कौन-सी "टिमटिमाती बत्ती" है जिसे आप खुद बुझा देना चाहते हैं, पर परमेश्वर अब तक जलाए रखे हुए हैं?
पद 20 कहता है, "कान तो खुले हैं परन्तु सुनता नहीं है।" पिछले साल परमेश्वर ने आपसे जो एक बात साफ़ कही थी, उस पर आपने अब तक क्या किया?
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