बाइबल व्याख्या

यशायाह 58:6

बाइबल

पाठ

मन्दिर के आँगन में राख बिखरी है, सिर झुके हुए हैं, पेट खाली हैं, और परमेश्वर इस पूरे दृश्य के बीच खड़े होकर कहते हैं कि यह वह उपवास नहीं जो वे चाहते हैं। पद 6 में वे अपनी पसंद का उपवास स्वयं परिभाषित करते हैं: "अन्याय से बनाए हुए दासों, और अंधेर सहनेवालों का जूआ तोड़कर उनको छुड़ा लेना, और, सब जूओं को टुकड़े-टुकड़े कर देना।" यानी भूख नहीं, बल्कि बंधन तोड़ना; अपने शरीर को दुख देना नहीं, बल्कि किसी और के कंधे से बोझ उतारना। जो लोग सुबह उपवास रखते थे और दोपहर में अपने सेवकों से कठिन काम कराते थे (पद 3), उनसे कहा जा रहा है कि उनकी भक्ति का असली परीक्षण उनके घर के पिछवाड़े में हो रहा है, वेदी पर नहीं।

मर्म

यहाँ परमेश्वर धार्मिकता को नया नहीं बना रहे, वे उसे उसकी जड़ पर लौटा रहे हैं। "जूआ" वह लकड़ी है जो बैल की गर्दन पर रखी जाती है ताकि वह किसी और की मर्ज़ी से चले। परमेश्वर कहते हैं: उसे तोड़ो, और एक नहीं, "सब जूओं को टुकड़े-टुकड़े" कर दो। यह आज्ञा उस परमेश्वर के चरित्र से निकलती है जिसने स्वयं मिस्र में दासों की कराह सुनी और उन्हें निकाल लाया। जो परमेश्वर छुड़ाता है, वह छुड़ाने वाले लोग चाहता है। इसलिए यह पद केवल सामाजिक सुधार का नारा नहीं है, यह उपासना की परिभाषा है। जहाँ आराधना का कोई असर उस आदमी तक नहीं पहुँचता जिसकी मज़दूरी आपने रोक रखी है, वहाँ आराधना नहीं, प्रदर्शन होता है, और परमेश्वर उसे पहचान लेते हैं।

सूत्र

सदियों बाद नासरत की सभा में एक बढ़ई का बेटा खड़ा होता है, यशायाह की पुस्तक खोलता है और छुटकारे की वही भाषा पढ़ता है: बन्धुओं को छुड़ाने और कुचले हुओं को स्वतंत्र करने का वर्ष (लूका 4:18,19)। यह संयोग नहीं है। यशायाह 58 में परमेश्वर जिस उपवास की माँग करते हैं, यीशु मसीह उसी को अपनी सेवा का उद्घाटन-वचन बना लेते हैं। और फिर वे वही करते हैं जो वे माँगते हैं: जूआ तोड़ते हैं, कर्ज़ चुकाते हैं, और अन्त में स्वयं उस बोझ के नीचे चले जाते हैं जो हमारा था। यहीं यह पद नैतिक दबाव से मुक्त हो जाता है। हम किसी का जूआ इसलिए नहीं तोड़ते कि इससे परमेश्वर की कृपा कमाई जाए, बल्कि इसलिए कि हमारा अपना जूआ पहले ही तोड़ा जा चुका है।

दर्पण

यह पद आपकी प्रार्थना की जाँच नहीं करता, आपके बटुए और आपके लहज़े की जाँच करता है। वह औरत जो आपके घर बर्तन माँजती है और जिसकी छुट्टी आप हर महीने काट लेते हैं। वह रिश्तेदार जिससे उधार वसूलते समय आपकी आवाज़ बदल जाती है। वह जूनियर जिसकी मेहनत पर आपका नाम छपा। हम में से बहुत कम लोग खुलकर अन्याय करते हैं; हम बस सुविधाजनक चुप्पी साध लेते हैं और उसे व्यावहारिकता कहते हैं। परमेश्वर उस चुप्पी को उपवास के दिन भी पहचान लेते हैं। आज ही, अगले दस मिनट में, अपना फ़ोन उठाइए और उस व्यक्ति को वह रकम भेज दीजिए जो उसकी है और आपके पास अटकी पड़ी है, बिना यह समझाए कि देर क्यों हुई।

बारीकी

"छुड़ा लेना" के पीछे जो इब्रानी शब्द है, होफ़शी, वह केवल दया नहीं, क़ानूनी स्वतंत्रता है: वह दर्जा जो सातवें वर्ष में दास को मिलता था, जब मालिक को उसे खाली हाथ नहीं, भरे हाथ विदा करना था। परमेश्वर ढीलाई नहीं माँग रहे, मालिकाना हक़ का अन्त माँग रहे हैं। और इसीलिए वाक्य यहाँ रुकता नहीं: "सब जूओं को टुकड़े-टुकड़े कर देना।" जूआ ढीला किया जा सकता है, उतारकर दीवार से टिकाया जा सकता है, कल फिर पहनाया जा सकता है। टुकड़े-टुकड़े किया हुआ जूआ दोबारा काम नहीं आता। परमेश्वर ऐसी मुक्ति चाहते हैं जिसे वापस नहीं लिया जा सकता।

श्रोता

ये लोग निर्वासन से लौटे हुए थे, खंडहरों के बीच बसे हुए, फ़सल कमज़ोर, कर भारी। उपवास उनकी पहचान बन चुका था, मन्दिर के विनाश की याद में रखे गए वे दिन जिनका ज़िक्र जकर्याह भी करता है। वे शिकायत करते हैं: "हमने तो उपवास रखा, परन्तु तूने इसकी सुधि नहीं ली?" यह ढोंगियों की नहीं, थके हुए धार्मिक लोगों की आवाज़ है, जो मानते थे कि उन्होंने अपना हिस्सा पूरा किया है। और उसी समाज में गरीब यहूदी अपने ही भाइयों के कर्ज़ में बिककर दास बन रहे थे। परमेश्वर का उत्तर उन्हें चौंकाने वाला लगा होगा: तुम्हारी प्रार्थना ऊपर इसलिए नहीं पहुँचती कि तुम्हारे ही आँगन में कोई जूआ ढो रहा है।

कठिन प्रश्न

अगले पद कहते हैं, "तब तू पुकारेगा और यहोवा उत्तर देगा।" तब। यह शब्द चुभता है। क्या परमेश्वर की सुनवाई हमारे व्यवहार पर शर्त बनी हुई है? क्या यह कृपा का सौदा नहीं हो गया? ईमानदारी से कहूँ तो पाठ इस तनाव को मिटाता नहीं। परमेश्वर यहाँ यह नहीं कह रहे कि न्याय करने से उनका प्रेम ख़रीदा जाता है; वे कह रहे हैं कि जो हाथ दूसरे की गर्दन दबाए हुए है, वही हाथ प्रार्थना में उठा हो तो उस प्रार्थना का कोई अर्थ नहीं बचता। फिर भी सवाल पूरी तरह शान्त नहीं होता, और शायद होना भी नहीं चाहिए। कुछ दरवाज़े सचमुच हमारी ओर से बन्द रहते हैं।

चिंतन

किसका जूआ मेरे हाथ में है, भले ही मैंने उसे कभी ज़ुल्म का नाम न दिया हो?

मेरी आराधना में से कौन सा हिस्सा हटा दिया जाए तो किसी की ज़िन्दगी पर कोई फ़र्क़ ही न पड़े?

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Isaiah 58:6 के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

इस बाइबल अंश के बारे में सामान्य प्रश्नों के त्वरित उत्तर।

यशायाह 58:6 का क्या अर्थ है?
मन्दिर के आँगन में राख बिखरी है, सिर झुके हुए हैं, पेट खाली हैं, और परमेश्वर इस पूरे दृश्य के बीच खड़े होकर कहते हैं कि यह वह उपवास नहीं जो वे चाहते हैं। पद 6 में वे अपनी पसंद का उपवास स्वयं परिभाषित करते हैं: "अन्याय से बनाए हुए दासों, और अंधेर सहनेवालों का जूआ तोड़कर उनको छुड़ा लेना, और, सब जूओं को टुकड़े-टुकड़े कर देना।" यानी भूख नहीं, बल्कि बंधन तोड़ना; अपने शरीर को दुख देना नहीं, बल्कि किसी और के कंधे से बोझ उतारना। जो लोग सुबह उपवास रखते थे और दोपहर में अपने सेवकों से कठिन काम कराते थे (पद 3), उनसे कहा जा रहा है कि उनकी भक्ति का असली परीक्षण उनके घर के पिछवाड़े में हो रहा है, वेदी पर नहीं।
यशायाह 58:6 किस विषय में है?
सदियों बाद नासरत की सभा में एक बढ़ई का बेटा खड़ा होता है, यशायाह की पुस्तक खोलता है और छुटकारे की वही भाषा पढ़ता है: बन्धुओं को छुड़ाने और कुचले हुओं को स्वतंत्र करने का वर्ष (लूका 4:18,19)। यह संयोग नहीं है। यशायाह 58 में परमेश्वर जिस उपवास की माँग करते हैं, यीशु मसीह उसी को अपनी सेवा का उद्घाटन-वचन बना लेते हैं। और फिर वे वही करते हैं जो वे माँगते हैं: जूआ तोड़ते हैं, कर्ज़ चुकाते हैं, और अन्त में स्वयं उस बोझ के नीचे चले जाते हैं जो हमारा था। यहीं यह पद नैतिक दबाव से मुक्त हो जाता है। हम किसी का जूआ इसलिए नहीं तोड़ते कि इससे परमेश्वर की कृपा कमाई जाए, बल्कि इसलिए कि हमारा अपना जूआ पहले ही तोड़ा जा चुका है।
यशायाह 58:6 का ऐतिहासिक संदर्भ क्या है?
"छुड़ा लेना" के पीछे जो इब्रानी शब्द है, होफ़शी, वह केवल दया नहीं, क़ानूनी स्वतंत्रता है: वह दर्जा जो सातवें वर्ष में दास को मिलता था, जब मालिक को उसे खाली हाथ नहीं, भरे हाथ विदा करना था। परमेश्वर ढीलाई नहीं माँग रहे, मालिकाना हक़ का अन्त माँग रहे हैं। और इसीलिए वाक्य यहाँ रुकता नहीं: "सब जूओं को टुकड़े-टुकड़े कर देना।" जूआ ढीला किया जा सकता है, उतारकर दीवार से टिकाया जा सकता है, कल फिर पहनाया जा सकता है। टुकड़े-टुकड़े किया हुआ जूआ दोबारा काम नहीं आता। परमेश्वर ऐसी मुक्ति चाहते हैं जिसे वापस नहीं लिया जा सकता।
यशायाह 58:6 हमें परमेश्वर के स्वभाव के बारे में क्या सिखाता है?
अगले पद कहते हैं, "तब तू पुकारेगा और यहोवा उत्तर देगा।" तब। यह शब्द चुभता है। क्या परमेश्वर की सुनवाई हमारे व्यवहार पर शर्त बनी हुई है? क्या यह कृपा का सौदा नहीं हो गया? ईमानदारी से कहूँ तो पाठ इस तनाव को मिटाता नहीं। परमेश्वर यहाँ यह नहीं कह रहे कि न्याय करने से उनका प्रेम ख़रीदा जाता है; वे कह रहे हैं कि जो हाथ दूसरे की गर्दन दबाए हुए है, वही हाथ प्रार्थना में उठा हो तो उस प्रार्थना का कोई अर्थ नहीं बचता। फिर भी सवाल पूरी तरह शान्त नहीं होता, और शायद होना भी नहीं चाहिए। कुछ दरवाज़े सचमुच हमारी ओर से बन्द रहते हैं।
यशायाह 58:6 आज भी कैसे प्रासंगिक है?
मेरी आराधना में से कौन सा हिस्सा हटा दिया जाए तो किसी की ज़िन्दगी पर कोई फ़र्क़ ही न पड़े?

Isaiah 58 में आपको क्या स्पर्श करता है?

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