निर्गमन 3:7
पाठ
जलती हुई झाड़ी में से पहला बड़ा वाक्य कोई आदेश नहीं, बल्कि एक गवाही है: परमेश्वर कहते हैं कि उन्होंने देखा है, सुना है, और जान लिया है। "मैंने अपनी प्रजा के लोग जो मिस्र में हैं उनके दुःख को निश्चय देखा है, और उनकी जो चिल्लाहट परिश्रम करानेवालों के कारण होती है उसको भी मैंने सुना है, और उनकी पीड़ा पर मैंने चित्त लगाया है।" तीन क्रियाएँ, एक के बाद एक, और हर एक पहले से गहरी। देखना दूर से भी हो सकता है; सुनना पास लाता है; पर "चित्त लगाना" का अर्थ है भीतर तक जान लेना, उस पीड़ा से अपने को जोड़ लेना। और ध्यान दीजिए, परमेश्वर उन्हें "अपनी प्रजा" कहते हैं, तब भी जब वे ईंट बनाते गुलाम हैं और कोई उन्हें प्रजा नहीं मानता।
मर्म
यह पद बताता है कि परमेश्वर की करुणा कोई भावुक सहानुभूति नहीं, बल्कि वाचा की स्मृति है। चार सौ वर्षों की चुप्पी के बाद ऐसा नहीं कि परमेश्वर अचानक जागे; वे उस वचन पर लौट रहे हैं जो अब्राहम को दिया गया था, और पद 6 में उन्होंने स्वयं को ठीक उसी नाम से पुकारा, "अब्राहम का परमेश्वर, इसहाक का परमेश्वर, और याकूब का परमेश्वर।" मुक्ति यहाँ इसलिए आती है क्योंकि परमेश्वर विश्वासयोग्य हैं, इसलिए नहीं कि इस्राएल पर्याप्त धार्मिक था। और यही इस पद की कड़वी-मीठी धार है: परमेश्वर का देखना केवल जानकारी नहीं, वह हस्तक्षेप का आरम्भ है, क्योंकि अगला ही वाक्य है "इसलिए अब मैं उतर आया हूँ।" जो परमेश्वर सुनता है, वह उतरता भी है।
जोड़ने वाला सूत्र
यह पद उद्धार के इतिहास का एक मोड़ नहीं, बल्कि उसका नमूना है। जो यहाँ होता है, वही बाद में बार-बार होगा: लोग चिल्लाते हैं, परमेश्वर सुनते हैं, परमेश्वर उतरते हैं। न्यायियों की पूरी किताब इसी लय पर चलती है, और भजनों में यह प्रार्थना की भाषा बन जाती है। पर सबसे गहरा प्रतिध्वनि देह में सुनाई देती है: यूहन्ना लिखता है कि वचन देहधारी होकर हमारे बीच डेरा किया, यानी परमेश्वर का "उतर आना" अब आग की लौ में नहीं, एक बढ़ई के बेटे में। मिस्र की ईंटों की भट्ठी से छुड़ानेवाला वही है जो क्रूस तक उतरा। और ध्यान दीजिए कि दोनों बार छुटकारा लहू, निकास और एक नई वाचा के साथ आता है। मूसा के सामने की झाड़ी जलती है पर भस्म नहीं होती; मसीह में परमेश्वर की पवित्रता उस मनुष्यता को छूती है जो उस छुअन में नष्ट नहीं होती।
दर्पण
हममें से अधिकांश यह नहीं कहते कि परमेश्वर नहीं हैं; हम चुपचाप यह मान लेते हैं कि वे ध्यान नहीं दे रहे। जिस दफ्तर में आपका काम हर बार किसी और के नाम चढ़ जाता है, जिस परिवार में एक ही बीमारी के कारण वर्षों से आपकी नींद टूटी हुई है, जिस कर्ज़ की किस्त हर महीने आपकी साँस छोटी कर देती है, वहाँ सबसे बड़ा खतरा नास्तिकता नहीं, थका हुआ अकेलापन है। यह पद उस अकेलेपन पर सीधी चोट करता है, पर सस्ता आराम नहीं देता: इस्राएल की चिल्लाहट चार सौ साल सुनी जाती रही, फिर भी सुनी जाती रही। परमेश्वर का देखना आपकी समय-सारणी नहीं मानता, पर वह अंधा नहीं है। आज ही, दस मिनट निकालकर, अपनी उस एक पीड़ा को कागज़ पर एक वाक्य में लिखिए जिसे आपने अब तक प्रार्थना में नाम देकर नहीं कहा, और उसे ज़ोर से पढ़कर परमेश्वर के सामने रख दीजिए।
संदर्भ
मूसा अस्सी वर्ष का है और मिद्यान में अपने ससुर की भेड़ें चरा रहा है, यानी वह राजकुमार जो हत्यारा बनकर भागा, अब दूसरे की सम्पत्ति का चरवाहा है। मिस्र में उसके लोग राज्य-निर्माण की मशीन में पिस रहे हैं: "परिश्रम करानेवाले" कोई क्रूर अपवाद नहीं थे, वे व्यवस्था का सामान्य हिस्सा थे। फ़िरौन स्वयं देवता माना जाता था, और उसके साम्राज्य में दासों की चीख का कोई कानूनी वज़न नहीं था। इसी राजनीतिक सन्नाटे में परमेश्वर एक जंगली पहाड़ पर, एक भगोड़े से, एक काँटेदार झाड़ी में से बोलते हैं। साम्राज्य के मंदिरों में नहीं, हाशिये पर। यह स्थान-चयन अपने आप में एक घोषणा है कि कौन असल में राजा है।
मुख्य पात्र
इस दृश्य का मुख्य पात्र मूसा नहीं, परमेश्वर हैं, और उनका परिचय चौंकाने वाला है। वे अपने को पहले शक्ति से नहीं, स्मृति और संवेदना से पहचनवाते हैं। "निश्चय देखा है" में जो ज़ोर है, वह किसी ऐसे की आवाज़ है जो सफाई दे रहा हो कि मैं अनुपस्थित नहीं था। यह परमेश्वर दूर बैठा निरीक्षक नहीं; "चित्त लगाना" इब्रानी में जानने की क्रिया है, वही शब्द जो गहरे, व्यक्तिगत रिश्ते के लिए इस्तेमाल होता है। परमेश्वर इस्राएल के दुःख को आँकड़े की तरह नहीं, अपने ही लोगों के घाव की तरह जानते हैं। और फिर भी वे अकेले काम नहीं करते: जो परमेश्वर उतरते हैं, वही पद 10 में कहते हैं, "आ, मैं तुझे फ़िरौन के पास भेजता हूँ।" करुणा बुलाहट बन जाती है, और बुलाहट एक हिचकिचाते हुए बूढ़े चरवाहे पर उतरती है।
अंतर-पाठ
इस पद की जड़ें उत्पत्ति 15 में हैं, जहाँ अब्राहम से कहा गया था कि उसके वंशज पराए देश में दास होंगे और चार सौ वर्ष बाद परमेश्वर उस जाति का न्याय करेंगे। जो वहाँ भविष्यवाणी थी, वह यहाँ कार्रवाई बनती है। निर्गमन 2 के अंत में यही तीन क्रियाएँ पहले ही आ चुकी हैं, जब परमेश्वर ने कराहना सुनकर अपनी वाचा को स्मरण किया; अध्याय 3 उसी का फैलाव है। आगे प्रेरितों 7 में स्तिफनुस महासभा के सामने ठीक यही वचन दोहराता है, और उसका तर्क चुभता है: परमेश्वर हमेशा उन्हें भेजते हैं जिन्हें अपने ही लोग ठुकरा चुके होते हैं। तनाव भी है। भजन 13 पूछता है "हे यहोवा, तू कब तक मुझे भूला रहेगा", और प्रकाशितवाक्य में शहीद वेदी के नीचे से वही "कब तक" चिल्लाते हैं। याकूब 5 में मज़दूरों की रोकी गई मज़दूरी स्वयं परमेश्वर के कानों तक पहुँचती है। बाइबल दो बातें साथ-साथ कहती है: परमेश्वर सुनते हैं, और हमें प्रतीक्षा करनी पड़ती है। इस पद का साहस यह है कि वह दोनों को झुठलाता नहीं।
चिंतन
आपके जीवन की कौन-सी "चिल्लाहट" इतनी पुरानी हो चुकी है कि आपने उसे परमेश्वर के सामने कहना ही छोड़ दिया है, और क्यों?
परमेश्वर का उतरना अक्सर किसी भेजे हुए व्यक्ति के द्वारा होता है; किसकी पीड़ा पर परमेश्वर इस सप्ताह आपका चित्त लगवा रहे हैं?
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निर्गमन 3:7 हमें परमेश्वर के स्वभाव के बारे में क्या सिखाता है?
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Exodus 3 पर समुदाय क्या साझा करता है
इस अंश पर पाठकों और संपादकीय टीम से अंतर्दृष्टि, प्रार्थनाएँ और धन्यवाद।
मूसा ने पूछा, "मैं कौन हूँ जो फ़िरौन के पास जाऊँ," और परमेश्वर ने उसकी पहचान पर बात ही नहीं की। उत्तर मिला, "निश्चय मैं तेरे संग रहूँगा।" और जो चिन्ह दिया गया वह आगे चलकर, इसी पहाड़ पर उपासना करते समय दिखेगा। यानी पक्का सबूत बाद में मिलेगा, पहले चलना होगा। तेरा सवाल भी शायद यही है, और उसका उत्तर भी वही एक है।
तब वे तेरी सुनेंगे," परमेश्वर मूसा से यह बात तब कहते हैं जब मूसा ने अभी एक शब्द भी नहीं बोला। सुनवाई का वादा बोलने से पहले मिल गया।
और ध्यान दे, मूसा को अकेले नहीं भेजा गया। पुरनियों को साथ लेकर जाना था। जिस बुलाहट से तू घबरा रहा है, उसमें परमेश्वर तेरे साथ लोग भी देता है और नतीजा भी अपने हाथ में रखता है।
तू बस कहने की हिम्मत जुटा।
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