बाइबल व्याख्या

यिर्मयाह 1:8

बाइबल

पाठ

परमेश्वर यिर्मयाह की आपत्ति को एक ही वाक्य से काट देते हैं। युवक ने कहा था कि वह बोलना नहीं जानता; अब उससे कहा जाता है कि असली समस्या उसकी जीभ नहीं, उसका डर है। "तू उनसे भयभीत न होना, क्योंकि तुझे छुड़ाने के लिये मैं तेरे साथ हूँ, यहोवा की यही वाणी है।" ध्यान दीजिए कि इसमें "उन" कौन हैं, यह अभी बताया भी नहीं गया। चेहरे अभी दिखे नहीं, विरोध अभी शुरू नहीं हुआ, पर परमेश्वर पहले से ही जानते हैं कि यह बुलाहट यिर्मयाह को ऐसे लोगों के सामने खड़ा करेगी जिनकी आँखों में देखना कठिन होगा। और वचन का अंत आश्वासन से नहीं, हस्ताक्षर से होता है: यह यहोवा की वाणी है।

मूल भाव

यहाँ दो बातें हैं जो आसानी से एक-दूसरे में घुल जाती हैं, पर हैं अलग। परमेश्वर यह नहीं कहते कि कुछ बुरा नहीं होगा; वे कहते हैं कि वे साथ होंगे और छुड़ाएँगे। छुड़ाने की ज़रूरत वहीं पड़ती है जहाँ सचमुच फँसने का ख़तरा हो। यिर्मयाह आगे चलकर कुएँ की कीचड़ में उतारा जाएगा, काठ में जकड़ा जाएगा, अपने ही गाँव के लोगों से धोखा खाएगा। यह वचन उसे दुख से बचाने का वादा नहीं, दुख के भीतर परमेश्वर की उपस्थिति का वादा है। और यही बाइबल की वाचा की भाषा है: "मैं तेरे साथ हूँ" वही सूत्र है जो अब्राहम, मूसा, यहोशू और गिदोन को मिला। बुलाहट कभी योग्यता पर नहीं, सदा उपस्थिति पर टिकती है। अनुग्रह का अर्थ यही है कि भेजनेवाला भेजे हुए को अकेला नहीं छोड़ता।

सामान्य सूत्र

"मैं तेरे साथ हूँ" बाइबल में केवल सांत्वना का वाक्य नहीं, यह उद्धार के पूरे इतिहास की रीढ़ है। परमेश्वर अपने लोगों के बीच बसना चाहते हैं: तम्बू में, मन्दिर में, और अंत में देह में। यिर्मयाह के मुँह में वचन डाला जाता है; मसीह में वचन स्वयं देह बनकर आता है। और जो नाम उन्हें दिया गया, इम्मानुएल, ठीक वही है जो यहाँ यिर्मयाह से कहा जा रहा है, केवल अब वादा नहीं, व्यक्ति। ध्यान दीजिए कि यिर्मयाह को "छुड़ाने" का आश्वासन मिलता है, पर यीशु को नहीं छुड़ाया गया; उन्होंने परित्याग का वह पूरा अँधेरा पिया जिससे भविष्यद्वक्ता बचाया गया था। इसलिए जब हमें आज "मैं तुम्हारे साथ हूँ" कहा जाता है, वह वादा क्रूस की कीमत पर पक्का हो चुका है, हवा में लटकी हुई आशा नहीं।

दर्पण

डर अक्सर अयोग्यता का भेस पहनकर आता है। हम कहते हैं "मैं इसके लायक नहीं", जबकि सच यह होता है कि हम उन चेहरों से डरते हैं जो हमें सुनेंगे: वह सहकर्मी जो व्यंग्य करेगा, वह रिश्तेदार जो मेज़ पर चुप करा देगा, वह समूह जिसमें विश्वास की बात कहते ही माहौल ठंडा पड़ जाता है। यिर्मयाह की तरह हम अपनी उम्र, अपनी भाषा, अपनी कमज़ोरी को आगे कर देते हैं, और परमेश्वर उस परत को हटाकर नीचे की असली चीज़ पर उँगली रखते हैं। गौर कीजिए, वे डर को समझाते नहीं, आज्ञा देते हैं: भयभीत न होना। क्योंकि डर का इलाज आत्मविश्वास नहीं, उपस्थिति है। आज एक काम कीजिए: उस एक व्यक्ति का नाम काग़ज़ पर लिखिए जिसके सामने आप अपने विश्वास की बात कहने से कतराते हैं, और उस नाम के ऊपर ज़ोर से कहिए, "तुझे छुड़ाने के लिये मैं तेरे साथ हूँ।"

प्रसंग

यह योशिय्याह के राज्य का तेरहवाँ वर्ष है, लगभग 627 ईसा पूर्व। अश्शूर ढह रहा है, बाबेल उठ रहा है, और यहूदा एक छोटा राज्य है जो बड़ी शक्तियों के बीच दबा हुआ है। यिर्मयाह अनातोत का है, यरूशलेम से कुछ ही किलोमीटर दूर एक याजक-गाँव, पर वह याजकों की उस शाखा से है जो मन्दिर की मुख्य व्यवस्था से हाशिए पर पड़ी थी। यानी वह भीतर का आदमी है और बाहर का भी। उसे राजाओं, हाकिमों और याजकों के विरुद्ध बोलना होगा, यानी उसी व्यवस्था के विरुद्ध जिसमें उसका अपना परिवार साँस लेता है। उस समाज में, जहाँ पहचान कुल और गाँव से बनती थी, यह अकेलापन मौत जैसा था। इसीलिए "भयभीत न होना" कोई हल्की बात नहीं।

मुख्य पात्र

इस पद का असली पात्र यिर्मयाह नहीं, परमेश्वर हैं। और उनका स्वभाव यहाँ तीन तहों में खुलता है। पहला, वे जानते हैं: विरोध अभी हुआ नहीं, पर वे उसे पहले से नाम दे रहे हैं। दूसरा, वे तर्क नहीं करते, वे प्रतिज्ञा करते हैं; यिर्मयाह की कमज़ोरी को झुठलाते नहीं, बस उसके बगल में खड़े हो जाते हैं। तीसरा, और यह सबसे मार्मिक है, वे स्वयं को बंधक बनाते हैं। "यहोवा की यही वाणी है" का अर्थ है कि परमेश्वर ने अपने नाम की प्रतिष्ठा इस वादे से बाँध दी है। जो परमेश्वर जातियों को हिला सकते हैं, वे एक डरे हुए युवक को समझाने में समय लगाते हैं। पवित्रता और कोमलता यहाँ एक ही साँस में बोलती हैं।

अंतर्पाठ

पौलुस के साथ कुरिन्थुस में यही शब्द दोहराए जाते हैं: "मत डर… क्योंकि मैं तेरे साथ हूँ", और वहाँ भी कारण वही है, विरोध असली है पर निर्णायक नहीं। यह संयोग नहीं; परमेश्वर अपने भेजे हुओं से सदियों से एक ही भाषा में बात करते हैं। और इसी अध्याय का अंत इस वादे को और मज़बूत करता है: "वे तुझ से लड़ेंगे तो सही, परन्तु तुझ पर प्रबल न होंगे, क्योंकि बचाने के लिये मैं तेरे साथ हूँ।" ध्यान दीजिए, लड़ाई को नकारा नहीं गया, केवल उसका परिणाम तय कर दिया गया है। यही वाक्य मत्ती के सुसमाचार के अंतिम शब्दों में फिर गूँजता है, जब भेजे हुए शिष्यों से कहा जाता है कि वे युग के अंत तक अकेले नहीं छोड़े जाएँगे।

चिंतन

आप अपनी किस "अयोग्यता" के पीछे असल में किस चेहरे का डर छिपा रखे हैं?

यदि परमेश्वर का वादा दुख से बचाव नहीं बल्कि दुख में उपस्थिति है, तो क्या वह आपके लिए पर्याप्त है, और नहीं तो क्यों नहीं?

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Jeremiah 1:8 के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

इस बाइबल अंश के बारे में सामान्य प्रश्नों के त्वरित उत्तर।

यिर्मयाह 1:8 का क्या अर्थ है?
परमेश्वर यिर्मयाह की आपत्ति को एक ही वाक्य से काट देते हैं। युवक ने कहा था कि वह बोलना नहीं जानता; अब उससे कहा जाता है कि असली समस्या उसकी जीभ नहीं, उसका डर है। "तू उनसे भयभीत न होना, क्योंकि तुझे छुड़ाने के लिये मैं तेरे साथ हूँ, यहोवा की यही वाणी है।" ध्यान दीजिए कि इसमें "उन" कौन हैं, यह अभी बताया भी नहीं गया। चेहरे अभी दिखे नहीं, विरोध अभी शुरू नहीं हुआ, पर परमेश्वर पहले से ही जानते हैं कि यह बुलाहट यिर्मयाह को ऐसे लोगों के सामने खड़ा करेगी जिनकी आँखों में देखना कठिन होगा। और वचन का अंत आश्वासन से नहीं, हस्ताक्षर से होता है: यह यहोवा की वाणी है।
यिर्मयाह 1:8 किस विषय में है?
"मैं तेरे साथ हूँ" बाइबल में केवल सांत्वना का वाक्य नहीं, यह उद्धार के पूरे इतिहास की रीढ़ है। परमेश्वर अपने लोगों के बीच बसना चाहते हैं: तम्बू में, मन्दिर में, और अंत में देह में। यिर्मयाह के मुँह में वचन डाला जाता है; मसीह में वचन स्वयं देह बनकर आता है। और जो नाम उन्हें दिया गया, इम्मानुएल, ठीक वही है जो यहाँ यिर्मयाह से कहा जा रहा है, केवल अब वादा नहीं, व्यक्ति। ध्यान दीजिए कि यिर्मयाह को "छुड़ाने" का आश्वासन मिलता है, पर यीशु को नहीं छुड़ाया गया; उन्होंने परित्याग का वह पूरा अँधेरा पिया जिससे भविष्यद्वक्ता बचाया गया था। इसलिए जब हमें आज "मैं तुम्हारे साथ हूँ" कहा जाता है, वह वादा क्रूस की कीमत पर पक्का हो चुका है, हवा में लटकी हुई आशा नहीं।
यिर्मयाह 1:8 का ऐतिहासिक संदर्भ क्या है?
यह योशिय्याह के राज्य का तेरहवाँ वर्ष है, लगभग 627 ईसा पूर्व। अश्शूर ढह रहा है, बाबेल उठ रहा है, और यहूदा एक छोटा राज्य है जो बड़ी शक्तियों के बीच दबा हुआ है। यिर्मयाह अनातोत का है, यरूशलेम से कुछ ही किलोमीटर दूर एक याजक-गाँव, पर वह याजकों की उस शाखा से है जो मन्दिर की मुख्य व्यवस्था से हाशिए पर पड़ी थी। यानी वह भीतर का आदमी है और बाहर का भी। उसे राजाओं, हाकिमों और याजकों के विरुद्ध बोलना होगा, यानी उसी व्यवस्था के विरुद्ध जिसमें उसका अपना परिवार साँस लेता है। उस समाज में, जहाँ पहचान कुल और गाँव से बनती थी, यह अकेलापन मौत जैसा था। इसीलिए "भयभीत न होना" कोई हल्की बात नहीं।
यिर्मयाह 1:8 हमें परमेश्वर के स्वभाव के बारे में क्या सिखाता है?
पौलुस के साथ कुरिन्थुस में यही शब्द दोहराए जाते हैं: "मत डर... क्योंकि मैं तेरे साथ हूँ", और वहाँ भी कारण वही है, विरोध असली है पर निर्णायक नहीं। यह संयोग नहीं; परमेश्वर अपने भेजे हुओं से सदियों से एक ही भाषा में बात करते हैं। और इसी अध्याय का अंत इस वादे को और मज़बूत करता है: "वे तुझ से लड़ेंगे तो सही, परन्तु तुझ पर प्रबल न होंगे, क्योंकि बचाने के लिये मैं तेरे साथ हूँ।" ध्यान दीजिए, लड़ाई को नकारा नहीं गया, केवल उसका परिणाम तय कर दिया गया है। यही वाक्य मत्ती के सुसमाचार के अंतिम शब्दों में फिर गूँजता है, जब भेजे हुए शिष्यों से कहा जाता है कि वे युग के अंत तक अकेले नहीं छोड़े जाएँगे।
यिर्मयाह 1:8 आज भी कैसे प्रासंगिक है?
यदि परमेश्वर का वादा दुख से बचाव नहीं बल्कि दुख में उपस्थिति है, तो क्या वह आपके लिए पर्याप्त है, और नहीं तो क्यों नहीं?
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Jeremiah 1 पर समुदाय क्या साझा करता है

इस अंश पर पाठकों और संपादकीय टीम से अंतर्दृष्टि, प्रार्थनाएँ और धन्यवाद।

धन्यवाद संपादकीय पर पद 5

पिता, धन्यवाद कि गर्भ में रचे जाने से पहले ही आपने मुझ पर चित्त लगाया। मेरा नाम, मेरा समय, मेरा बुलावा सब आपके हाथ में पहले से तय था। धन्यवाद कि मैं संयोग से नहीं, आपकी सोची हुई योजना से हूँ, और आपने मुझे अलग करके अपने काम के लिए ठहराया।

अंतर्दृष्टि संपादकीय पर पद 17

तू उनके मुख को देखकर न घबराना, ऐसा न हो कि मैं तुझे उनके सामने घबरा दूँ।" यिर्मयाह का डर लोगों का चेहरा था। परमेश्वर कहते हैं, चेहरों से मत डर, वरना तू सचमुच टूट जाएगा। आज भी सबसे बड़ी रुकावट यही है, किसी की नाराज़ नज़र। कमर बाँध, उठ, और जो उसने कहा है वही कह।

धन्यवाद संपादकीय पर पद 14

पिता, धन्यवाद कि आप चुप रहकर विपत्ति आने नहीं देते। उत्तर दिशा से आनेवाली आपदा के विषय आपने यिर्मयाह से पहले ही कह दिया। धन्यवाद कि आज भी आप हमें समय रहते चेतावनी देते हैं, ताकि हम लौट आएँ और सँभल जाएँ। आपकी यह चेतावनी भी आपका प्रेम ही है।

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