बाइबल व्याख्या

यिर्मयाह 10

बाइबल
यह अध्याय JL Group के सहयोग से संभव हुआ है

पाठ

ककड़ी के खेत में खड़ा पुतला: यही यिर्मयाह की मूर्तियों की तस्वीर है। जंगल से काटा गया काठ, कारीगर के बसूले से गढ़ा, सोने-चाँदी से मढ़ा और कील ठोंककर जमाया हुआ ताकि गिर न पड़े, नीले-बैंगनी वस्त्र पहने एक गूँगा खंभा। इसके सामने यिर्मयाह जीवित परमेश्वर को रखते हैं, जो बोलता है तो आकाश में जल गरजता है। फिर अचानक स्वर बदल जाता है: घेरे हुए नगर, लुटा हुआ तम्बू, बिखरी हुई भेड़ें, और अन्त में एक टूटी हुई प्रार्थना, "हे यहोवा, मेरी ताड़ना कर, पर न्याय से।"

मर्म

इस अध्याय का हृदय एक ही अन्तर है: जो बनाया गया है और जो बनाता है। मूर्तियों में "साँस ही नहीं है" (पद 14); यहोवा "जीवित परमेश्वर और सदा का राजा" हैं (पद 10)। पर यिर्मयाह केवल दर्शनशास्त्र नहीं पढ़ा रहे। वे दिखा रहे हैं कि निर्जीव देवताओं की उपासना मनुष्य को भी निर्जीव बना देती है। जिनके चरवाहे "पशु सरीखे" हैं और "यहोवा को नहीं पुकारते", उनकी भेड़ें तितर-बितर हो जाती हैं। झूठी भक्ति सिर्फ़ धर्म को नहीं बिगाड़ती, वह समाज की संरचना को खोखला करती है: नेतृत्व गूँगा, प्रजा असुरक्षित, नगर घिरा हुआ। मूर्ति का सबसे बड़ा ख़तरा यह नहीं कि वह झूठ बोलती है, बल्कि यह कि वह कुछ बोलती ही नहीं।

मुख्य सूत्र

पद 12-13 में परमेश्वर अपनी सामर्थ्य, बुद्धि और वचन से सृष्टि को खड़ा करते हैं, और पद 16 में वे "याकूब का निज भाग" कहलाते हैं, यानी वे स्वयं अपने लोगों की सम्पत्ति हैं। यही दो धागे मसीह में आकर मिलते हैं। जिस वचन से सृष्टि रची गई, वह देह बनकर हमारे बीच बसा; जो परमेश्वर काठ में नहीं समाए, वे मरियम की गोद में समा गए। यिर्मयाह व्यंग्य करते हैं कि मूर्ति को "उठाए फिरना पड़ता है, क्योंकि वे चल नहीं सकतीं" (पद 5)। मसीह उल्टी दिशा में चले: उन्होंने क्रूस उठाया और हमें उठाया। और पद 21 की बिखरी भेड़ों का उत्तर उस चरवाहे में आता है जो भेड़ों के लिए अपना प्राण देता है। यिर्मयाह की शिकायत, यूहन्ना 10 का उत्तर।

दर्पण

हम काठ के खंभे नहीं पूजते, पर हम भी कुछ न कुछ "कील ठोंककर" जमाते हैं ताकि वह हिल-डुल न सके। नौकरी की सुरक्षा, बच्चों की उपलब्धियाँ, बैंक का संतुलन, शरीर की फ़िटनेस, किसी व्यक्ति की स्वीकृति। इन सबमें एक बात साझा है: संकट के दिन वे चुप रह जाते हैं। जब रिपोर्ट बुरी आती है, जब तम्बू की रस्सियाँ टूटती हैं, तब सोने-चाँदी से मढ़ा हुआ कुछ भी बोलता नहीं। यिर्मयाह पद 23 में जो स्वीकार करते हैं, वही हमारी सबसे गहरी बेचैनी है: "मनुष्य चलता तो है, परन्तु उसके डग उसके अधीन नहीं हैं।" हम नियंत्रण का नाटक करते-करते थक जाते हैं। आज ही, काग़ज़ पर उस एक चीज़ का नाम लिखिए जिसके बिना आप स्वयं को असुरक्षित महसूस करते हैं, और उस नाम के नीचे पद 10 की ये शब्द लिखकर ऊँची आवाज़ में पढ़िए: "परन्तु यहोवा वास्तव में परमेश्वर है।"

शास्त्र-संबंध

पद 7 के शब्द, "हे सब जातियों के राजा, तुझ से कौन न डरेगा?", प्रकाशितवाक्य 15:4 में उन लोगों के गीत में लौटते हैं जो पशु की मूर्ति पर जय पाकर खड़े हैं। यानी यिर्मयाह का व्यंग्य अन्त में स्तुति बन जाता है: मूर्तियों का मज़ाक इतिहास के अन्त में मेम्ने की जयजयकार में घुल जाता है। और पद 24 की प्रार्थना, "क्रोध में आकर नहीं, कहीं ऐसा न हो कि मैं नाश हो जाऊँ", क्रूस पर उत्तर पाती है, जहाँ न्याय और करुणा टकराती नहीं, बल्कि एक ही व्यक्ति में मिल जाती हैं। यिर्मयाह जो माँगते हैं, वह मसीह में ही संभव होता है: ऐसी ताड़ना जो सुधारती है, ऐसा क्रोध जो किसी और ने सह लिया।

एक बारीकी

पद 14 में एक छोटा-सा वाक्यांश है जिसे पढ़कर हम आगे बढ़ जाते हैं: "उनमें साँस ही नहीं है।" इब्रानी में यह "रूआह" है, वही शब्द जो हवा, श्वास और आत्मा तीनों के लिए चलता है। तुलना कीजिए पद 13 से, जहाँ परमेश्वर "अपने भण्डार में से पवन चलाता है", उसी रूआह को। मूर्तियों के पास सजावट है, रंग हैं, कारीगरी है, पर श्वास नहीं। और इसीलिए पद 15 उन्हें "व्यर्थ" कहता है, इब्रानी में हेबेल, यानी भाप, एक साँस जो निकलते ही ग़ायब हो जाती है। कितनी तीखी विडम्बना: जिनमें साँस नहीं, वे स्वयं एक साँस भर हैं। और उसी परमेश्वर ने बाद में अपने लोगों पर अपनी आत्मा उँडेली, ताकि गूँगी भक्ति जीवित हो जाए।

मुख्य पात्र

इस अध्याय में परमेश्वर एक साथ तीन रूपों में दिखते हैं, और तीनों को साथ रखना कठिन है। वे व्यंग्यकार हैं, जो मूर्तियों को पुतला कहकर हँसते हैं। वे सृष्टिकर्ता हैं, जिनके प्रकोप से पृथ्वी काँपती है। और वे वही हैं जो अपने लोगों को "गोफन में रखकर" फेंक देने की बात करते हैं, पद 18, एक चौंकाने वाली हिंसक तस्वीर। पर ध्यान दीजिए: इसी परमेश्वर को यिर्मयाह "याकूब का निज भाग" कहते हैं। वे दूर खड़े जज नहीं, वे अपने लोगों के हिस्से हैं। उनका क्रोध उदासीनता नहीं, बल्कि उस प्रेम का दूसरा पहलू है जो अपने लोगों को काठ के सामने झुका हुआ नहीं देख सकता। यही परमेश्वर अन्त में स्वयं आकर वह गोफन का झटका अपने ऊपर ले लेते हैं।

चिंतन

पद 5 कहता है कि मूर्तियाँ "न तो कुछ बुरा कर सकती हैं और न कुछ भला"। आपके जीवन में कौन-सी चीज़ है जिससे आप डरते तो हैं, पर जो वास्तव में आपके लिए कुछ कर नहीं सकती?

यिर्मयाह पद 24 में ताड़ना माँगते हैं, छूट नहीं। क्या आप परमेश्वर से ऐसी प्रार्थना कर सकते हैं, और यदि नहीं, तो उनके न्याय के बारे में आपका कौन-सा डर आड़े आता है?

Jeremiah में और गहराई से जानें

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The Message of Jeremiah

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Jeremiah 10 के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

इस बाइबल अंश के बारे में सामान्य प्रश्नों के त्वरित उत्तर।

यिर्मयाह 10 का क्या अर्थ है?
ककड़ी के खेत में खड़ा पुतला: यही यिर्मयाह की मूर्तियों की तस्वीर है। जंगल से काटा गया काठ, कारीगर के बसूले से गढ़ा, सोने-चाँदी से मढ़ा और कील ठोंककर जमाया हुआ ताकि गिर न पड़े, नीले-बैंगनी वस्त्र पहने एक गूँगा खंभा। इसके सामने यिर्मयाह जीवित परमेश्वर को रखते हैं, जो बोलता है तो आकाश में जल गरजता है। फिर अचानक स्वर बदल जाता है: घेरे हुए नगर, लुटा हुआ तम्बू, बिखरी हुई भेड़ें, और अन्त में एक टूटी हुई प्रार्थना, "हे यहोवा, मेरी ताड़ना कर, पर न्याय से।"
यिर्मयाह 10 किस विषय में है?
पद 12-13 में परमेश्वर अपनी सामर्थ्य, बुद्धि और वचन से सृष्टि को खड़ा करते हैं, और पद 16 में वे "याकूब का निज भाग" कहलाते हैं, यानी वे स्वयं अपने लोगों की सम्पत्ति हैं। यही दो धागे मसीह में आकर मिलते हैं। जिस वचन से सृष्टि रची गई, वह देह बनकर हमारे बीच बसा; जो परमेश्वर काठ में नहीं समाए, वे मरियम की गोद में समा गए। यिर्मयाह व्यंग्य करते हैं कि मूर्ति को "उठाए फिरना पड़ता है, क्योंकि वे चल नहीं सकतीं" (पद 5)। मसीह उल्टी दिशा में चले: उन्होंने क्रूस उठाया और हमें उठाया। और पद 21 की बिखरी भेड़ों का उत्तर उस चरवाहे में आता है जो भेड़ों के लिए अपना प्राण देता है। यिर्मयाह की शिकायत, यूहन्ना 10 का उत्तर।
यिर्मयाह 10 का ऐतिहासिक संदर्भ क्या है?
पद 7 के शब्द, "हे सब जातियों के राजा, तुझ से कौन न डरेगा?", प्रकाशितवाक्य 15:4 में उन लोगों के गीत में लौटते हैं जो पशु की मूर्ति पर जय पाकर खड़े हैं। यानी यिर्मयाह का व्यंग्य अन्त में स्तुति बन जाता है: मूर्तियों का मज़ाक इतिहास के अन्त में मेम्ने की जयजयकार में घुल जाता है। और पद 24 की प्रार्थना, "क्रोध में आकर नहीं, कहीं ऐसा न हो कि मैं नाश हो जाऊँ", क्रूस पर उत्तर पाती है, जहाँ न्याय और करुणा टकराती नहीं, बल्कि एक ही व्यक्ति में मिल जाती हैं। यिर्मयाह जो माँगते हैं, वह मसीह में ही संभव होता है: ऐसी ताड़ना जो सुधारती है, ऐसा क्रोध जो किसी और ने सह लिया।
यिर्मयाह 10 हमें परमेश्वर के स्वभाव के बारे में क्या सिखाता है?
इस अध्याय में परमेश्वर एक साथ तीन रूपों में दिखते हैं, और तीनों को साथ रखना कठिन है। वे व्यंग्यकार हैं, जो मूर्तियों को पुतला कहकर हँसते हैं। वे सृष्टिकर्ता हैं, जिनके प्रकोप से पृथ्वी काँपती है। और वे वही हैं जो अपने लोगों को "गोफन में रखकर" फेंक देने की बात करते हैं, पद 18, एक चौंकाने वाली हिंसक तस्वीर। पर ध्यान दीजिए: इसी परमेश्वर को यिर्मयाह "याकूब का निज भाग" कहते हैं। वे दूर खड़े जज नहीं, वे अपने लोगों के हिस्से हैं। उनका क्रोध उदासीनता नहीं, बल्कि उस प्रेम का दूसरा पहलू है जो अपने लोगों को काठ के सामने झुका हुआ नहीं देख सकता। यही परमेश्वर अन्त में स्वयं आकर वह गोफन का झटका अपने ऊपर ले लेते हैं।
यिर्मयाह 10 आज भी कैसे प्रासंगिक है?
यिर्मयाह पद 24 में ताड़ना माँगते हैं, छूट नहीं। क्या आप परमेश्वर से ऐसी प्रार्थना कर सकते हैं, और यदि नहीं, तो उनके न्याय के बारे में आपका कौन-सा डर आड़े आता है?
हमारे साझेदारों के सहयोग से संभव

Jeremiah 10 पर समुदाय क्या साझा करता है

इस अंश पर पाठकों और संपादकीय टीम से अंतर्दृष्टि, प्रार्थनाएँ और धन्यवाद।

अंतर्दृष्टि संपादकीय पर पद 25

यिर्मयाह पहले अपने लिए कहता है, "हे यहोवा, मेरी ताड़ना कर, पर न्याय से; क्रोध से नहीं," और उसके बाद ही जातियों की ओर उँगली उठाता है। क्रम पर ध्यान दे। जो अपनी ताड़ना के लिए घुटने टेक चुका है, वही दूसरों के लिए प्रार्थना करने का अधिकार रखता है। तेरी शिकायत से पहले तेरा झुकना कहाँ है?

अंतर्दृष्टि संपादकीय पर पद 7

मूर्तियों का मज़ाक उड़ाते उड़ाते यिर्मयाह अचानक रुककर परमेश्वर की ओर मुड़ जाता है: "हे जाति-जाति के राजा, तुझ से कौन न डरेगा? क्योंकि यह तेरे योग्य है।" खीले से ठोकी गई लकड़ी की मूरत से कोई नहीं डरता, उसे तो गिरने से बचाना पड़ता है। सोचो, तुम जिस चीज़ से आज सबसे ज़्यादा डरते हो, क्या वह तुम्हारे डर के योग्य भी है?

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