बाइबल व्याख्या

यूहन्ना 14:18

बाइबल
यह वचन Kanhaiya Nage द्वारा समर्पित है· यीशु मसीह मुझे कभी नहीं छोड़ेगा

पाठ

एक ही वाक्य, दो हिस्से, और उनके बीच पूरा सुसमाचार: "मैं तुम्हें अनाथ न छोड़ूँगा, मैं तुम्हारे पास वापस आता हूँ।" यीशु ने अभी-अभी कहा है कि वे जा रहे हैं, कि पिता एक "और सहायक" भेजेंगे, और अब वे उस डर को नाम देते हैं जो चेलों के मन में शब्दों से पहले बैठा था: पीछे छूट जाने का डर, बिना संरक्षक रह जाने का डर। वे उस डर को झिड़कते नहीं, वे उसका उत्तर अपने आने से देते हैं।

मर्म

ध्यान दीजिए कि यीशु क्या नहीं कहते। वे नहीं कहते, "मैं तुम्हें एक अच्छी शिक्षा, एक स्मृति, एक संगठन देकर जाऊँगा।" वे कहते हैं, मैं ही आता हूँ। यहाँ मसीही विश्वास का केंद्र खुलता है: उद्धार किसी विरासत का हस्तांतरण नहीं, बल्कि एक व्यक्ति की निरंतर उपस्थिति है। परमेश्वर अपने लोगों को निर्देश देकर अकेला नहीं छोड़ते; वे स्वयं उनके बीच रहने आते हैं। और यह उपस्थिति आत्मा के द्वारा होती है, क्योंकि पद 17 में जो आत्मा "तुम्हारे साथ रहता है" कहा गया, वही पद 18 में "मैं" बनकर आता है। पवित्र आत्मा मसीह का प्रतिनिधि नहीं, मसीह की उपस्थिति का ढंग है। इसलिए अनाथपन असंभव हो जाता है, चाहे परिस्थिति कितनी ही सूनी लगे।

सूत्र

"अनाथ" शब्द बाइबल की एक लंबी धारा को छू जाता है। व्यवस्था में परमेश्वर स्वयं को अनाथों और विधवाओं का न्यायी कहते हैं, क्योंकि इस्राएल में अनाथ वही था जिसके पास न कोई नाम था, न भूमि, न मुकदमा लड़नेवाला। पूरा पुराना नियम एक ऐसे परमेश्वर की गवाही है जो बेसहारा को घर देता है। और अब वह घर देनेवाला स्वयं देह में खड़ा है, उन बारह लोगों के सामने जो कुछ घंटों में वास्तव में बेसहारा हो जाएँगे। पद 2 में उन्होंने "पिता के घर" की बात की थी; पद 18 में वे वादा करते हैं कि वे उस घर में जगह बनाने जाते समय भी इन्हें बाहर नहीं छोड़ेंगे। क्रूस, पुनरुत्थान और पिन्तेकुस्त, तीनों इसी एक वाक्य के अंग हैं।

दर्पण

अनाथपन का अनुभव उन्हें भी होता है जिनके माता-पिता जीवित हैं। यह उस क्षण में आता है जब अस्पताल की रिपोर्ट आती है और फोन पर कोई नहीं उठाता; जब नौकरी छूटती है और आपको समझ आता है कि जिन लोगों के साथ आप दस साल बैठे, उनमें से कोई आपका नाम नहीं लेगा; जब प्रार्थना में इतनी चुप्पी होती है कि आप सोचने लगते हैं कि छत के ऊपर कोई है या नहीं। हम इस डर को धार्मिक भाषा में छिपा लेते हैं, पर भीतर हम खुद को अपना संरक्षक बना लेते हैं, और थक जाते हैं। यीशु इस थकान के आगे कोई सलाह नहीं रखते, अपना आना रखते हैं।

आज, दस मिनट के भीतर: उस एक परिस्थिति का नाम कागज़ पर लिखिए जिसमें आप सबसे अधिक अकेला महसूस करते हैं, और उसके नीचे यही वाक्य अपने हाथ से लिखिए, "मैं तुम्हें अनाथ न छोड़ूँगा", और वह कागज़ वहाँ रखिए जहाँ कल सुबह आपकी नज़र पड़े।

बारीकी

"मैं तुम्हारे पास वापस आता हूँ।" यह भविष्य काल नहीं है, यह वर्तमान है। यूनानी में यीशु कहते हैं, मैं आ रहा हूँ, जैसे कोई कदम अभी उठ चुका है। यह व्याकरण संयोग नहीं। पद 3 में वे भविष्य के लौटने की बात करते हैं, पर यहाँ वे उस लौटने को इतना निश्चित बताते हैं कि वह अभी से शुरू हो चुका है। मसीही जीवन दो आगमनों के बीच खाली प्रतीक्षा नहीं, बल्कि एक ऐसे आगमन में जीना है जो निरंतर हो रहा है: पुनरुत्थान की सुबह में, आत्मा के दान में, वचन और रोटी और प्याले में, और अंत में महिमा में। जो पहले से आ रहा है, उसकी प्रतीक्षा अलग तरह की होती है।

प्रश्न

फिर वह विश्वासी क्या कहे जिसे वर्षों से यह उपस्थिति महसूस ही नहीं हुई? यह प्रश्न टालने योग्य नहीं। यीशु का वादा भावना का वादा नहीं है, और यही उसकी कठोरता और उसकी दया दोनों है। कठोरता, क्योंकि हमें वह नहीं मिलता जो हम माँगते हैं, यानी अनुभूति। दया, क्योंकि वादा हमारी अनुभूति की क्षमता पर टिका नहीं है। पद 19 में यीशु कहते हैं, "संसार मुझे न देखेगा, परन्तु तुम मुझे देखोगे", पर उस देखने का समय वे हमारे हाथ में नहीं देते। शनिवार का दिन, क्रूस और पुनरुत्थान के बीच, चेलों के लिए पूरी तरह अनाथ दिन था, और वे उस दिन भी अनाथ नहीं थे। कुछ सच्चाइयाँ हम पीछे मुड़कर ही पहचानते हैं।

मुख्य पात्र

यह वाक्य कहनेवाला व्यक्ति कुछ घंटों में स्वयं छोड़ दिया जाएगा। उसके शिष्य भाग जाएँगे, और क्रूस पर वह पूछेगा कि उसे क्यों त्याग दिया गया। यही उसकी सांत्वना का भार है: वह अनाथपन के बारे में सिद्धांत नहीं बोल रहा, वह उसमें उतरने जा रहा है, और इसलिए बोल सकता है। यहाँ हमें एक परमेश्वर दिखते हैं जो अपने लोगों के अकेलेपन को दूर से नहीं हटाते, बल्कि उसे अपने ऊपर लेकर तोड़ते हैं। उस रात मेज़ पर बैठे यीशु का मन व्याकुल था, पर उनकी चिंता अपने लिए नहीं, इन ग्यारह डरे हुए लोगों के लिए थी। यही उनका स्वभाव है: जाते समय भी वे लौटने की बात करते हैं।

चिंतन

आप अपने जीवन के किस हिस्से में चुपचाप अपने ही संरक्षक बन बैठे हैं, और यीशु का "मैं आता हूँ" वहाँ क्या बदलेगा?

यदि मसीह की उपस्थिति अनुभूति पर निर्भर नहीं है, तो आप उसे पहचानना कहाँ से सीखेंगे?

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John 14:18 के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

इस बाइबल अंश के बारे में सामान्य प्रश्नों के त्वरित उत्तर।

यूहन्ना 14:18 का क्या अर्थ है?
एक ही वाक्य, दो हिस्से, और उनके बीच पूरा सुसमाचार: "मैं तुम्हें अनाथ न छोड़ूँगा, मैं तुम्हारे पास वापस आता हूँ।" यीशु ने अभी-अभी कहा है कि वे जा रहे हैं, कि पिता एक "और सहायक" भेजेंगे, और अब वे उस डर को नाम देते हैं जो चेलों के मन में शब्दों से पहले बैठा था: पीछे छूट जाने का डर, बिना संरक्षक रह जाने का डर। वे उस डर को झिड़कते नहीं, वे उसका उत्तर अपने आने से देते हैं।
यूहन्ना 14:18 किस विषय में है?
"अनाथ" शब्द बाइबल की एक लंबी धारा को छू जाता है। व्यवस्था में परमेश्वर स्वयं को अनाथों और विधवाओं का न्यायी कहते हैं, क्योंकि इस्राएल में अनाथ वही था जिसके पास न कोई नाम था, न भूमि, न मुकदमा लड़नेवाला। पूरा पुराना नियम एक ऐसे परमेश्वर की गवाही है जो बेसहारा को घर देता है। और अब वह घर देनेवाला स्वयं देह में खड़ा है, उन बारह लोगों के सामने जो कुछ घंटों में वास्तव में बेसहारा हो जाएँगे। पद 2 में उन्होंने "पिता के घर" की बात की थी; पद 18 में वे वादा करते हैं कि वे उस घर में जगह बनाने जाते समय भी इन्हें बाहर नहीं छोड़ेंगे। क्रूस, पुनरुत्थान और पिन्तेकुस्त, तीनों इसी एक वाक्य के अंग हैं।
यूहन्ना 14:18 का ऐतिहासिक संदर्भ क्या है?
आज, दस मिनट के भीतर: उस एक परिस्थिति का नाम कागज़ पर लिखिए जिसमें आप सबसे अधिक अकेला महसूस करते हैं, और उसके नीचे यही वाक्य अपने हाथ से लिखिए, "मैं तुम्हें अनाथ न छोड़ूँगा", और वह कागज़ वहाँ रखिए जहाँ कल सुबह आपकी नज़र पड़े।
यूहन्ना 14:18 हमें परमेश्वर के स्वभाव के बारे में क्या सिखाता है?
फिर वह विश्वासी क्या कहे जिसे वर्षों से यह उपस्थिति महसूस ही नहीं हुई? यह प्रश्न टालने योग्य नहीं। यीशु का वादा भावना का वादा नहीं है, और यही उसकी कठोरता और उसकी दया दोनों है। कठोरता, क्योंकि हमें वह नहीं मिलता जो हम माँगते हैं, यानी अनुभूति। दया, क्योंकि वादा हमारी अनुभूति की क्षमता पर टिका नहीं है। पद 19 में यीशु कहते हैं, "संसार मुझे न देखेगा, परन्तु तुम मुझे देखोगे", पर उस देखने का समय वे हमारे हाथ में नहीं देते। शनिवार का दिन, क्रूस और पुनरुत्थान के बीच, चेलों के लिए पूरी तरह अनाथ दिन था, और वे उस दिन भी अनाथ नहीं थे। कुछ सच्चाइयाँ हम पीछे मुड़कर ही पहचानते हैं।
यूहन्ना 14:18 आज भी कैसे प्रासंगिक है?
आप अपने जीवन के किस हिस्से में चुपचाप अपने ही संरक्षक बन बैठे हैं, और यीशु का "मैं आता हूँ" वहाँ क्या बदलेगा?
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John 14 पर समुदाय क्या साझा करता है

इस अंश पर पाठकों और संपादकीय टीम से अंतर्दृष्टि, प्रार्थनाएँ और धन्यवाद।

अंतर्दृष्टि संपादकीय पर पद 3

यीशु यह नहीं कहते कि वह तुम्हें कोई पता भेज देंगे। वह कहते हैं, "फिर आकर तुम्हें अपने यहाँ ले जाऊँगा, कि जहाँ मैं रहूँ वहाँ तुम भी रहो।" वह खुद लौटकर आएँगे। स्वर्ग की सबसे बड़ी बात सोने की गलियाँ नहीं, बल्कि यह है कि वहाँ वही होंगे जिन्होंने तुमसे प्रेम किया। आज जो अकेलापन तुम्हें काट रहा है, उसका अंत एक जगह नहीं, एक व्यक्ति है।

अंतर्दृष्टि संपादकीय पर पद 22

यहूदा का सवाल बहुत ईमानदार है, "हे प्रभु, क्या हुआ कि तू अपने आप को हम पर प्रगट करना चाहता है और संसार पर नहीं?" वह चाहता था कि यीशु सबके सामने चमक जाएँ, ताकि किसी को शक न रहे। पर यीशु का जवाब कोई तमाशा नहीं था, बल्कि एक घर था। वे उसी के पास आकर रहते हैं जो उनके वचन को मानता है। सोचो, आज तुम्हारे दिल का दरवाज़ा कितना खुला है?

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