बाइबल व्याख्या

यूहन्ना 8:11

बाइबल

पाठ

आँगन खाली हो चुका है। पत्थर ज़मीन पर गिरे पड़े हैं, आरोप लगाने वाले बड़ों से लेकर छोटों तक एक-एक करके जा चुके हैं, और बीच में वही स्त्री खड़ी है जिसे घसीटकर लाया गया था। अब केवल दो लोग बचे हैं: वह, जिसके पास कोई बचाव नहीं, और वह, जिसके पास दोषी ठहराने का पूरा अधिकार है। यीशु पूछते हैं कि क्या किसी ने उस पर दण्ड की आज्ञा दी; वह उत्तर देती है, "हे प्रभु, किसी ने नहीं।" तब वह वाक्य आता है जिस पर यह पूरा दृश्य टिका है: "मैं भी तुझ पर दण्ड की आज्ञा नहीं देता; जा, और फिर पाप न करना।" छोड़ दिया जाना, और साथ ही एक नई दिशा में भेज दिया जाना, एक ही साँस में।

मूल बात

ध्यान दीजिए कि यीशु ने व्यवस्था को रद्द नहीं किया। उन्होंने यह नहीं कहा कि व्यभिचार कोई बड़ी बात नहीं, या कि लैव्यव्यवस्था की माँग अब पुरानी पड़ चुकी है। उन्होंने कुछ और किया, जो कहीं अधिक गहरा है: उन्होंने दण्ड की घड़ी को टाल दिया और अपनी ओर खींच लिया। जो एकमात्र व्यक्ति पत्थर उठाने का हक़ रखता था, उसी ने हाथ नीचे रखा। यही परमेश्वर की पवित्रता और अनुग्रह का वह जोड़ है जिसे हम आमतौर पर दो विरोधी खेमों में बाँट देते हैं। यहाँ पाप को हल्का नहीं किया गया, बल्कि उसका भार किसी और कंधे पर सरकाया गया है। और "फिर पाप न करना" कोई शर्त नहीं है जिस पर क्षमा लटकी हो; वह क्षमा का फल है। पहले मुक्ति, फिर चलना। यही सुसमाचार का क्रम है, और इसी क्रम को उलट देने से धर्म बोझ बन जाता है।

जोड़ने वाला सूत्र

उँगली और धूल। दो बार कहा गया है कि यीशु झुककर भूमि पर उँगली से लिखने लगे, और यूहन्ना हमें कभी नहीं बताता कि क्या लिखा गया। पर वह चित्र अपने आप बोलता है: व्यवस्था कभी परमेश्वर की उँगली से पत्थर पर खोदी गई थी, और यहाँ वही उँगली मिट्टी पर लिख रही है, उसी मिट्टी पर जिससे मनुष्य गढ़ा गया था। सृष्टि और व्यवस्था एक ही हाथ के काम हैं, और वह हाथ अब पत्थर उठाने के बजाय धूल को छू रहा है। और यह दृश्य आगे कहाँ जाता है, यही अध्याय बता देता है। कुछ ही देर बाद यीशु पूछते हैं, "तुम में से कौन मुझे पापी ठहराता है?" और अध्याय के अंत में "उन्होंने उसे मारने के लिये पत्थर उठाए।" जो अकेला पत्थर मारने का अधिकारी था, अंत में स्वयं पत्थरों के सामने खड़ा होता है। क्षमा मुफ़्त है, पर मुफ़्त में मिली नहीं।

दर्पण

हम में से अधिकांश इस कहानी में स्त्री की जगह खड़े होने से पहले आरोप लगाने वालों की भीड़ में खड़े होते हैं, और हमें पता भी नहीं चलता। वह सहकर्मी जिसकी असफलता सुनकर भीतर एक चुपचाप संतोष उठता है; वह रिश्तेदार जिसके तलाक़ की चर्चा परिवार के समूह में बार-बार लौट आती है; वह व्यक्ति जिसके बारे में आप प्रार्थना सभा में "बोझ" के नाम पर जानकारी साझा करते हैं। पत्थर हमेशा हाथ में नहीं होता, कभी-कभी वह जीभ पर होता है। और दूसरी ओर, शायद आप वही हैं जो बीच में खड़े हैं, उस एक बात के साथ जो कोई नहीं जानता, और जिसे आपने मान लिया है कि परमेश्वर कभी नहीं भुला सकते। आज, जिस एक व्यक्ति के विषय में आपके मन का फैसला पक्का हो चुका है, उसका नाम कागज़ पर लिखिए, उसके नीचे लिखिए "मैं भी तुझ पर दण्ड की आज्ञा नहीं देता", और वह कागज़ फाड़ दीजिए।

संदर्भ

भोर का समय है, मन्दिर का आँगन है, और यीशु बैठकर उपदेश दे रहे हैं, यानी एक रब्बी की सामान्य मुद्रा में, भीड़ उनके चारों ओर। इसी शिक्षा के बीच एक स्त्री को घसीटकर "बीच में" खड़ा कर दिया जाता है। यह न्यायालय नहीं, तमाशा है। शास्त्री और फरीसी उसमें रुचि नहीं रखते; यूहन्ना साफ़ कहता है कि यह यीशु को परखने के लिये था। जाल दोतरफ़ा था: यदि वे कहते कि पथराव करो, तो रोमी शासन के अधिकार को चुनौती, क्योंकि मृत्युदण्ड रोम के हाथ में था; यदि छोड़ दो, तो मूसा के विरुद्ध। और ध्यान दीजिए कि जिस व्यवस्था का वे हवाला देते हैं, वह पुरुष को भी समान दण्ड देती थी, पर पुरुष कहीं नहीं है। सम्मान और लज्जा की उस संस्कृति में वह स्त्री व्यक्ति नहीं, एक मोहरा बना दी गई थी।

कठिन प्रश्न

पाठ यह नहीं कहता कि स्त्री ने पश्चाताप किया। कोई आँसू नहीं, कोई स्वीकारोक्ति नहीं, कोई विश्वास का कथन नहीं। वह केवल इतना कहती है, "हे प्रभु, किसी ने नहीं।" और इसके बाद भी क्षमा दी जाती है। यह हमें असहज करता है, क्योंकि हम चाहते हैं कि अनुग्रह से पहले कोई शर्त पूरी हो, कोई सुरक्षा हो। इससे भी कठिन यह है कि हमें कभी पता नहीं चलता कि आगे क्या हुआ। क्या उसने सचमुच वह जीवन छोड़ा? यूहन्ना चुप है, और यह चुप्पी जानबूझकर है। अनुग्रह जोखिम भरा है; परमेश्वर उसे देते समय परिणाम की कोई गारंटी हमारे हाथ में नहीं थमाते। जो इस जोखिम से डरता है, वह अंततः अनुग्रह से ही डरता है।

एक छोटा विवरण

"मैं भी।" यह छोटा-सा शब्द पूरे वाक्य का कब्ज़ा है। पहली नज़र में लगता है कि यीशु स्वयं को उन लोगों की कतार में रख रहे हैं जो अभी-अभी चुपचाप निकल गए। पर अंतर ज़मीन-आसमान का है। वे इसलिए गए क्योंकि उनके पास पत्थर मारने का नैतिक हक़ नहीं बचा था; यीशु के पास वह हक़ पूरा था और उन्होंने उसका प्रयोग नहीं किया। वे पीछे हटे, यीशु ने निर्णय लिया। इसीलिए यह वाक्य केवल उदारता नहीं, अधिकार का कथन है। जो व्यक्ति कह सकता है "मैं भी तुझ पर दण्ड की आज्ञा नहीं देता" और वह बात टिकी रहे, वह न्यायी से कम कुछ नहीं हो सकता। इसी अध्याय में थोड़ा आगे वे कहते हैं कि उनका न्याय सच्चा है, क्योंकि वे अकेले नहीं।

चिंतन

आपके हाथ में इस समय किसका पत्थर है, और उसे नीचे रखने से आपको क्या खोना पड़ेगा?

"जा, और फिर पाप न करना" को आप शर्त की तरह सुनते हैं या भेजे जाने की तरह, और यह अंतर आपकी प्रार्थना में कैसे दिखाई देता है?

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John 8:11 के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

इस बाइबल अंश के बारे में सामान्य प्रश्नों के त्वरित उत्तर।

यूहन्ना 8:11 का क्या अर्थ है?
आँगन खाली हो चुका है। पत्थर ज़मीन पर गिरे पड़े हैं, आरोप लगाने वाले बड़ों से लेकर छोटों तक एक-एक करके जा चुके हैं, और बीच में वही स्त्री खड़ी है जिसे घसीटकर लाया गया था। अब केवल दो लोग बचे हैं: वह, जिसके पास कोई बचाव नहीं, और वह, जिसके पास दोषी ठहराने का पूरा अधिकार है। यीशु पूछते हैं कि क्या किसी ने उस पर दण्ड की आज्ञा दी; वह उत्तर देती है, "हे प्रभु, किसी ने नहीं।" तब वह वाक्य आता है जिस पर यह पूरा दृश्य टिका है: "मैं भी तुझ पर दण्ड की आज्ञा नहीं देता; जा, और फिर पाप न करना।" छोड़ दिया जाना, और साथ ही एक नई दिशा में भेज दिया जाना, एक ही साँस में।
यूहन्ना 8:11 किस विषय में है?
उँगली और धूल। दो बार कहा गया है कि यीशु झुककर भूमि पर उँगली से लिखने लगे, और यूहन्ना हमें कभी नहीं बताता कि क्या लिखा गया। पर वह चित्र अपने आप बोलता है: व्यवस्था कभी परमेश्वर की उँगली से पत्थर पर खोदी गई थी, और यहाँ वही उँगली मिट्टी पर लिख रही है, उसी मिट्टी पर जिससे मनुष्य गढ़ा गया था। सृष्टि और व्यवस्था एक ही हाथ के काम हैं, और वह हाथ अब पत्थर उठाने के बजाय धूल को छू रहा है। और यह दृश्य आगे कहाँ जाता है, यही अध्याय
यूहन्ना 8:11 का ऐतिहासिक संदर्भ क्या है?
भोर का समय है, मन्दिर का आँगन है, और यीशु बैठकर उपदेश दे रहे हैं, यानी एक रब्बी की सामान्य मुद्रा में, भीड़ उनके चारों ओर। इसी शिक्षा के बीच एक स्त्री को घसीटकर "बीच में" खड़ा कर दिया जाता है। यह न्यायालय नहीं, तमाशा है। शास्त्री और फरीसी उसमें रुचि नहीं रखते; यूहन्ना साफ़ कहता है कि यह यीशु को परखने के लिये था। जाल दोतरफ़ा था: यदि वे कहते कि पथराव करो, तो रोमी शासन के अधिकार को चुनौती, क्योंकि मृत्युदण्ड रोम के हाथ में था; यदि छोड़ दो, तो मूसा के विरुद्ध। और ध्यान दीजिए कि जिस व्यवस्था का वे हवाला देते हैं, वह पुरुष को भी समान दण्ड देती थी, पर पुरुष कहीं नहीं है। सम्मान और लज्जा की उस संस्कृति में वह स्त्री व्यक्ति नहीं, एक मोहरा बना दी गई थी।
यूहन्ना 8:11 हमें परमेश्वर के स्वभाव के बारे में क्या सिखाता है?
"मैं भी।" यह छोटा-सा शब्द पूरे वाक्य का कब्ज़ा है। पहली नज़र में लगता है कि यीशु स्वयं को उन लोगों की कतार में रख रहे हैं जो अभी-अभी चुपचाप निकल गए। पर अंतर ज़मीन-आसमान का है। वे इसलिए गए क्योंकि उनके पास पत्थर मारने का नैतिक हक़ नहीं बचा था; यीशु के पास वह हक़ पूरा था और उन्होंने उसका प्रयोग नहीं किया। वे पीछे हटे, यीशु ने निर्णय लिया। इसीलिए यह वाक्य केवल उदारता नहीं, अधिकार का कथन है। जो व्यक्ति कह सकता है "मैं भी तुझ पर दण्ड की आज्ञा नहीं देता" और वह बात टिकी रहे, वह न्यायी से कम कुछ नहीं हो सकता। इसी अध्याय में थोड़ा आगे वे कहते हैं कि उनका न्याय सच्चा है, क्योंकि वे अकेले नहीं।
यूहन्ना 8:11 आज भी कैसे प्रासंगिक है?
"जा, और फिर पाप न करना" को आप शर्त की तरह सुनते हैं या भेजे जाने की तरह, और यह अंतर आपकी प्रार्थना में कैसे दिखाई देता है?
हमारे साझेदारों के सहयोग से संभव

John 8 पर समुदाय क्या साझा करता है

इस अंश पर पाठकों और संपादकीय टीम से अंतर्दृष्टि, प्रार्थनाएँ और धन्यवाद।

अंतर्दृष्टि संपादकीय पर पद 30

वह ये बातें कह ही रहा था कि बहुतों ने उस पर विश्वास किया।" कितनी सुंदर घड़ी। पर ठीक अगली पंक्तियों में यीशु उन्हीं से कहते हैं, "यदि तुम मेरे वचन में बने रहो, तो सच में मेरे चेले ठहरोगे।" और कुछ ही देर में वही लोग पत्थर उठा लेते हैं। एक पल का विश्वास आसान है, बने रहना कठिन। आज तू किस में टिका हुआ है?

प्रार्थना संपादकीय पर पद 43

पिता, कई बार मैं सुनता तो हूँ, पर सच में सुन नहीं पाता। मेरे भीतर का शोर, मेरे अपने विचार, मेरी जिद, ये सब तेरी आवाज़ को दबा देते हैं। मेरे कान खोल, मेरा मन नरम कर, ताकि तेरी बात मुझ तक पहुँचे और मैं उसे समझ सकूँ।

अंतर्दृष्टि संपादकीय पर पद 23

यीशु ने कहा, "तुम नीचे के हो, मैं ऊपर का हूँ; तुम संसार के हो, मैं संसार का नहीं।" बात सिर्फ जगह की नहीं, जड़ की है। जो जिससे निकला है, उसी की सोच बोलता है। इसलिए वे उसकी बात समझ नहीं पा रहे थे। आज खुद से पूछ: मेरी चिंताएँ, मेरी इच्छाएँ, मेरे फैसले किस मिट्टी से उगते हैं? और अगर मसीह मुझमें है, तो कुछ तो ऊपर का दिखना चाहिए।

अंतर्दृष्टि संपादकीय पर पद 29

मंदिर में यीशु के चारों ओर विरोधी खड़े थे, ताने और आरोप लग रहे थे, और उसी बीच वे कहते हैं, "मेरा भेजनेवाला मेरे साथ है; उसने मुझे अकेला नहीं छोड़ा।" भीड़ के बीच भी अकेलापन आता है, और अकेले भी संगति मिलती है। ध्यान दो, वे इसे पिता की प्रसन्नता से जोड़ते हैं। जिस काम में तुम इस समय हो, क्या वह पिता को भाता है? शायद तुम्हारा सूनापन दूर होने की शुरुआत यहीं से हो।

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