योना 3:3
पाठ
परमेश्वर का वचन दूसरी बार आने के बाद योना उठता है, और इस बार वह तर्शीश की ओर नहीं, बल्कि नीनवे की ओर चलता है: "तब योना यहोवा के वचन के अनुसार नीनवे को गया।" यह एक छोटा वाक्य है, मगर पहले अध्याय की पूरी भगदड़ इसी में पलट जाती है। और फिर लेखक अचानक रुककर हमें नगर के बारे में एक टिप्पणी देता है, जैसे कोई कैमरा पीछे हटकर पूरा दृश्य दिखाए: "नीनवे एक बहुत बड़ा नगर था, वह तीन दिन की यात्रा का था।" एक अकेला इब्री भविष्यद्वक्ता, और उसके सामने साम्राज्य की राजधानी, इतनी विशाल कि उसे पार करने में तीन दिन लगें।
मर्म
यहाँ दो "बड़प्पन" आमने-सामने खड़े हैं। एक ओर नगर की विशालता, जो अश्शूर की सैन्य शक्ति और क्रूरता का पर्याय थी; दूसरी ओर वह वचन, जिसके "अनुसार" योना चलता है। पाठ यह नहीं कहता कि योना का हृदय बदल गया; यह केवल कहता है कि उसके पैर बदल गए। परमेश्वर की करुणा इतनी ज़िद्दी है कि वह एक अनिच्छुक दूत को भी काम में ले आती है, और इतनी चौड़ी है कि वह इस्राएल की सीमा पार कर उस साम्राज्य तक पहुँचती है जो इस्राएल का शिकारी था। अध्याय एक में योना "यहोवा के सम्मुख से" भागा था; अब वह "यहोवा के वचन के अनुसार" जाता है। अनुग्रह पहले आज्ञाकारिता को जन्म देता है, फिर धीरे-धीरे मन को भी।
सूत्र
योना का नीनवे की ओर चलना बाइबल की उस लम्बी रेखा पर एक मोड़ है जिसमें परमेश्वर अपने लोगों को बार-बार सीमा के पार धकेलते हैं। अब्राहम को बुलाया गया था ताकि उसके द्वारा पृथ्वी के सब कुल आशीष पाएँ, पर इस्राएल प्रायः आशीष को अपनी सम्पत्ति समझता रहा। योना वही इस्राएल है, छोटा करके एक आदमी में बाँधा हुआ: चुना हुआ, भेजा हुआ, और अनिच्छुक। जब यीशु मसीह अपने बारे में कहते हैं कि इस पीढ़ी को योना के चिन्ह के सिवा कोई चिन्ह न दिया जाएगा, तो वे केवल तीन दिन की कब्र की ओर संकेत नहीं करते, बल्कि उस दूत की ओर भी जो मृत्यु जैसी जगह से लौटकर परायों के नगर में प्रचार करता है। योना के पैर वहाँ पहुँचे जहाँ उसका मन नहीं जाना चाहता था; मसीह पूरे मन से वहाँ गए जहाँ कोई नहीं जाना चाहता था।
दर्पण
हममें से अधिकांश परमेश्वर की आज्ञा से जहाज़ पकड़कर नहीं भागते; हम अधिक सभ्य तरीक़े से भागते हैं। हम उस रिश्तेदार का नाम प्रार्थना सूची से चुपचाप हटा देते हैं। हम उस सहकर्मी के बारे में सोचते हैं कि वह जो बो रहा है वही काटे तो ठीक ही होगा। हम उस समुदाय के लिए, जिसने हमारे लोगों को सताया है, न्याय तो चाहते हैं, दया नहीं। योना 3:3 इस बात पर ज़ोर नहीं देता कि योना की भावनाएँ ठीक हो गईं; वह बस चल पड़ा। यह एक राहत है और एक चुनौती भी: आप अपनी अनिच्छा के ठीक होने तक आज्ञाकारिता को स्थगित नहीं कर सकते। आज ही करें: एक काग़ज़ पर उस व्यक्ति या समूह का नाम लिखिए जिसकी भलाई आप सचमुच नहीं चाहते, और ऊँची आवाज़ में एक वाक्य की प्रार्थना कीजिए कि परमेश्वर उन पर दया करें।
श्रोता
पहले पाठक इस्राएली थे, और उनके लिए "नीनवे" कोई तटस्थ नाम नहीं था। यह वह साम्राज्य था जिसने बंदियों की खालें उतारने और नगरों के ढेर लगाने का गर्व से बखान किया, और जिसने अन्ततः उत्तरी राज्य को निगल लिया। कल्पना कीजिए कि यह पुस्तक निर्वासन के बाद पढ़ी जा रही है, उन कानों में जिनके परिवार उसी सेना के कारण उजड़े थे। और अब सुनना पड़ता है कि परमेश्वर का भविष्यद्वक्ता उस नगर की ओर जा रहा है, धमकी देने नहीं, बल्कि अन्ततः उसे बचने का अवसर देने। "बहुत बड़ा नगर" उनके कानों में भय और घृणा दोनों जगाता था। पुस्तक उन्हें उस असहज प्रश्न तक ले जाती है जो योना 4 में फूट पड़ेगा: क्या परमेश्वर हमारे शत्रुओं के भी परमेश्वर हैं?
अन्तर्पाठ
"बहुत बड़ा नगर" वाक्यांश हमें उत्पत्ति में वापस ले जाता है, जहाँ नीनवे का निर्माण निम्रोद के साम्राज्य से जुड़ा है, उसी अध्याय-परिवेश में जिसके पीछे-पीछे बाबेल की मीनार आती है: मनुष्य का बड़ा नाम बनाने का प्रयास। बाइबल में बड़े नगर प्रायः परमेश्वर के विरुद्ध खड़ी मानव-शक्ति के प्रतीक हैं, और फिर भी यहाँ परमेश्वर उसी नगर को दूत भेजते हैं। दूसरी ओर नहूम की पुस्तक खड़ी है, जो उसी नीनवे के विनाश की घोषणा करती है, और यह तनाव मिटाया नहीं जा सकता: पश्चाताप एक पीढ़ी को बचाता है, स्थायी छूट नहीं देता। तीसरा प्रतिध्वनि-स्थल स्वयं योना का अतीत है: 2 राजा 14 में वही अम्मित्तै का पुत्र योना इस्राएल की सीमाएँ बढ़ने की भविष्यद्वाणी करता है। जो भविष्यद्वक्ता अपने देश के विस्तार की घोषणा करने में प्रसन्न था, वही शत्रु की राजधानी में जाने से भागता है। अन्त में मत्ती 12:41, जो इस अध्याय के पाँचवें पद के साथ ही जुड़ा हुआ है: नीनवे के लोग न्याय के दिन उठकर उस पीढ़ी को दोषी ठहराएँगे जिसने योना से बड़े को सुनकर भी मन नहीं फिराया।
एक बारीकी
ध्यान दीजिए कि लेखक भूतकाल में लिखता है: "नीनवे एक बहुत बड़ा नगर था"। यह छोटा-सा क्रियारूप बताता है कि पाठक उस समय पढ़ रहे हैं जब वह विशाल नगर मिट चुका है। जिस दीवार ने योना को बौना लगाया, वह अब मिट्टी का टीला है। और "तीन दिन की यात्रा" भी अकारण नहीं: तीन दिन योना मछली के पेट में था, तीन दिन की चौड़ाई इस नगर की है। जिस अन्धकार से परमेश्वर ने उसे निकाला, उसी माप का अन्धकार अब उसके सामने फैला है, और वह भीतर चला जाता है। मृत्यु से लौटा हुआ आदमी ही मृत्यु के नगर में जाने योग्य होता है।
मनन के प्रश्न
योना के पैर उसके मन से पहले बदले। आपके जीवन में कौन-सी आज्ञाकारिता है जिसे आप इसलिए टाल रहे हैं क्योंकि आपकी भावनाएँ अभी तैयार नहीं?
नहूम और योना एक ही नगर के बारे में दो अलग शब्द कहते हैं। इस तनाव में आप परमेश्वर की दया और उनके न्याय को एक साथ कैसे समझते हैं?
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Jonah 3:3 के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
इस बाइबल अंश के बारे में सामान्य प्रश्नों के त्वरित उत्तर।
योना 3:3 का क्या अर्थ है?
योना 3:3 किस विषय में है?
योना 3:3 का ऐतिहासिक संदर्भ क्या है?
योना 3:3 हमें परमेश्वर के स्वभाव के बारे में क्या सिखाता है?
योना 3:3 आज भी कैसे प्रासंगिक है?
Jonah 3 पर समुदाय क्या साझा करता है
इस अंश पर पाठकों और संपादकीय टीम से अंतर्दृष्टि, प्रार्थनाएँ और धन्यवाद।
पिता, आपका धन्यवाद कि आपने नीनवे को बिना चेतावनी नाश नहीं किया, बल्कि योना को भेजकर कहलवाया, "चालीस दिन के बीतने पर नीनवे नष्ट हो जाएगा।" वे चालीस दिन आपकी दया थे। धन्यवाद कि आज भी आप मुझे चेताते हैं और मन फिराने का समय देते हैं।
तब यहोवा का वचन दूसरी बार योना के पास पहुँचा" (योना 3:1)। वही आवाज़, वही बुलाहट, वही आदमी जो भाग गया था। परमेश्वर ने किसी और को नहीं ढूँढ़ा। तेरे भागने के बाद भी वह दूसरी बार बोलता है। सवाल यह नहीं कि उसने फिर बुलाया या नहीं, सवाल यह है कि इस बार तू सुनेगा?
नीनवे के राजा के पास कोई वादा नहीं था। योना ने सिर्फ़ इतना कहा था कि चालीस दिन में नगर उलट दिया जाएगा। फिर भी राजा कहता है, "क्या जाने परमेश्वर दया करे और अपनी इच्छा बदल दे।" वह "क्या जाने" पर ही टाट ओढ़ लेता है। कभी कभी पश्चाताप पक्की गारंटी से नहीं, बल्कि एक छोटी सी आशा से शुरू होता है। तेरे पास भी उतनी आशा तो है ना?
पिता, योना की तरह मुझे भी दूसरा मौका देने के लिए धन्यवाद। जहाँ आप भेजें, वहाँ जाने की हिम्मत दीजिए, चाहे वह जगह मुझे बहुत बड़ी और डरावनी लगे। मेरे बहाने कम कीजिए और आज्ञा मानने की इच्छा बढ़ाइए, ताकि मैं देर किए बिना आपके कहे पर चल सकूँ।
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