यहोशू 24:15
पाठ
यहोशू अपने लोगों के सामने खड़े हैं और एक ऐसा वाक्य बोलते हैं जो किसी धर्मगुरु के मुँह से अजीब लगता है: "यदि यहोवा की सेवा करनी तुम्हें बुरी लगे, तो आज चुन लो कि तुम किसकी सेवा करोगे।" वे विकल्प भी गिना देते हैं, पुरखाओं के देवता या उस देश के देवता जिसमें ये लोग अब रह रहे हैं। और फिर, बिना किसी दबाव के, वे अपना फैसला सामने रख देते हैं: "परन्तु मैं तो अपने घराने समेत यहोवा ही की सेवा नित करूँगा।"
मर्म
ध्यान दीजिए कि यहोशू क्या नहीं करते। वे यह नहीं कहते कि दूसरे देवता झूठे हैं, तर्क नहीं देते, डराते नहीं। वे चुनने की आज़ादी को खुला छोड़ देते हैं, मानो परमेश्वर किसी को अपनी ओर घसीटना नहीं चाहते। यह वाचा का स्वभाव है: परमेश्वर पहले देते हैं, फिर पूछते हैं। पहले तेरह से लेकर यरीहो तक का पूरा इतिहास सुनाया जाता है, वह सब जो उन्होंने किया और जिसमें इस्राएल का कोई योगदान नहीं था, और उसके बाद ही सवाल आता है। कृपा पहले, निर्णय बाद में। पर यह भी सच है कि यहाँ कोई तटस्थ ज़मीन नहीं है। "चुन लो कि तुम किसकी सेवा करोगे", किसी की सेवा तो होगी ही। न चुनना भी एक चुनाव है।
मुख्य धागा
यह आज़ाद छोड़ देने वाली आवाज़ पूरे शास्त्र में गूँजती है। यूहन्ना 6 में जब भीड़ छँट जाती है, यीशु अपने बारहों चेलों से पूछते हैं कि क्या वे भी चले जाना चाहते हैं। वे उन्हें रोकते नहीं, मनाते नहीं। वही खुला दरवाज़ा, वही जोखिम। परमेश्वर ऐसे प्रेमी हैं जो अपनी ही माँग को नकारे जाने का खतरा उठाते हैं। और फिर यहोशू अध्याय 19 में वह कहते हैं जो सबसे चुभता है: "तुम से यहोवा की सेवा नहीं हो सकती।" लोग वादा करते हैं, और इतिहास दिखाता है कि यहोशू सही थे। न्यायियों की पुस्तक इसी टूटे वादे की कहानी है। इसलिए अंततः किसी और को आना था जो मनुष्य की ओर से यह वाचा निभा सके, जिसकी "हाँ" टूटी नहीं।
दर्पण
पुरखाओं के देवता और इस देश के देवता। गौर कीजिए, दोनों विकल्प असली हैं। एक वह है जो आपको विरासत में मिला, परिवार की अपेक्षाएँ, जाति की रीतियाँ, माँ-बाप का वह डर जो आपके भीतर बैठ गया है। दूसरा वह है जो आपके आसपास की हवा में है, वह ऑफिस जहाँ पदोन्नति ही एकमात्र नैतिकता है, वह मोहल्ला जहाँ घर की कीमत आदमी की कीमत है। इन दोनों में से कोई भी देवता आपसे यह नहीं कहता कि आप स्वतंत्र हैं। वे सिर्फ़ माँगते हैं, आपका समय, आपकी नींद, आपके बच्चों का बचपन। यहोशू अपने घराने को भी इसमें शामिल करते हैं, क्योंकि यह फैसला रसोई और बजट तक पहुँचता है, वरना यह सिर्फ़ भावना है।
आज एक कागज़ पर उस एक चीज़ का नाम लिखिए जिसने इस हफ़्ते आपका सबसे ज़्यादा समय और मन लिया है, उसे अपने सामने रखिए, और ज़ोर से कहिए: "मैं तो अपने घराने समेत यहोवा ही की सेवा नित करूँगा।"
पृष्ठभूमि
यह शेकेम है, और यह जगह संयोग से नहीं चुनी गई। उत्पत्ति 35 में याकूब ने इसी शेकेम में अपने घराने के पराए देवताओं को एक बांज वृक्ष के नीचे गाड़ दिया था, और अध्याय 26 में यहोशू उसी तरह के वृक्ष के नीचे पत्थर खड़ा करते हैं। पीढ़ियों का फासला, वही सवाल। यहोशू बूढ़े हैं, मृत्यु पास है, युद्ध खत्म हैं, ज़मीन बँट चुकी है। खतरा अब तलवार नहीं, सुविधा है। जिस रूप में यह पूरा अध्याय रचा गया है, वह उस ज़माने की राजा-प्रजा संधियों जैसा है: पहले राजा के उपकारों की सूची, फिर वफ़ादारी की शर्तें, फिर गवाह। यहाँ गवाह पत्थर है, और लोग खुद।
एक बारीकी
"सेवा" शब्द इस अध्याय में बार-बार लौटता है। इब्रानी में यह עָבַד, अवाद है, और इसका अर्थ सेवा भी है और दासत्व भी। मिस्र में इस्राएल यही करता था, अवाद, गुलामी। अब वही शब्द यहोवा के लिए इस्तेमाल होता है। यहोशू यह नहीं कह रहे कि एक रास्ता बंधन का है और दूसरा आज़ादी का। वे कह रहे हैं: तुम किसी न किसी के बंधे रहोगे, सवाल सिर्फ़ यह है कि किसके। और फिर वह छोटा सा शब्द "नित", लगातार, रोज़। यह किसी सभा में उठाया गया हाथ नहीं, यह एक ऐसी वफ़ादारी है जो मंगलवार की सुबह भी टिकती है, जब कोई देख नहीं रहा।
श्रोता
वे लोग जो यहाँ खड़े थे, उनमें से बहुतों ने मिस्र नहीं देखा था। उनके लिए लाल समुद्र पिता की कहानी थी, अपनी आँखों का अनुभव नहीं। वे अब उन घरों में रह रहे थे जो उन्होंने नहीं बनाए, उन बगीचों के फल खा रहे थे जो उन्होंने नहीं लगाए। और उनके पड़ोसी, एमोरी और कनानी, जानते थे कि इस ज़मीन में अनाज कैसे उगता है, किस देवता को क्या चढ़ाना होता है। जब यहोशू कहते हैं "जिनके देश में तुम रहते हो", तो वे किसी दूर की बुराई की नहीं, बगल वाले खेत की बात कर रहे हैं। वह प्रलोभन धार्मिक नहीं था, व्यावहारिक था। और शायद इसीलिए सबसे खतरनाक।
चिंतन के प्रश्न
यहोशू ने लोगों को चुनने की पूरी आज़ादी दी। परमेश्वर आपको भी देते हैं। क्या यह आपको राहत देता है या बेचैन करता है, और क्यों?
आपके घर में कौन सी चीज़ "नित" होती है, रोज़, बिना सोचे? वह क्या बताती है कि असल में किसकी सेवा हो रही है?
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Joshua 24:15 के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
इस बाइबल अंश के बारे में सामान्य प्रश्नों के त्वरित उत्तर।
यहोशू 24:15 का क्या अर्थ है?
यहोशू 24:15 किस विषय में है?
यहोशू 24:15 का ऐतिहासिक संदर्भ क्या है?
यहोशू 24:15 हमें परमेश्वर के स्वभाव के बारे में क्या सिखाता है?
यहोशू 24:15 आज भी कैसे प्रासंगिक है?
Joshua 24 पर समुदाय क्या साझा करता है
इस अंश पर पाठकों और संपादकीय टीम से अंतर्दृष्टि, प्रार्थनाएँ और धन्यवाद।
शेकेम में यहोशू ने लोगों की भावना पर भरोसा नहीं किया, उसने वाचा बाँधी: "उसी दिन यहोशू ने लोगों के साथ वाचा बाँधी, और शेकेम में उनके लिये विधि और नियम ठहराए।" भीड़ ने कहा था, हम यहोवा की सेवा करेंगे। पर कहना आसान है, बँधना कठिन। तेरे मन का वादा कहीं लिखा गया है, या बस उस दिन की भावना में बह गया?
पिता, यहोशू का जीवन पूरा हुआ और वह आपका सेवक कहलाया। मेरे दिन भी गिने हुए हैं। मुझे सिखा कि मैं इन्हें बर्बाद न करूँ, बल्कि हर दिन ईमानदारी से आपके पीछे चलूँ। जब मेरा समय पूरा हो, तो पीछे कुछ ऐसा रह जाए जो दूसरों को आपकी ओर ले जाए।
हे प्रभु, जैसे तूने अपने लोगों को शत्रुओं के सामने विजय दी और उनकी भूमि उन्हें सौंपी, वैसे ही आज मेरे जीवन की लड़ाइयों में भी तू ही मेरा सहारा बन। मैं अपनी शक्ति पर नहीं, तेरे हाथों पर भरोसा रखता हूँ। तू ही मुझे आगे बढ़ा।
हे प्रभु, धन्यवाद कि तूने उस पत्थर की तरह हमारे बीच भी गवाह ठहराए हैं जो तेरे हर वचन को सुनते और याद दिलाते हैं। तेरी बातें कभी मिटती नहीं, वे हमारे विश्वासघात के विरुद्ध साक्षी बनकर हमें तेरी ओर लौटाती रहती हैं। तेरी सच्चाई के लिए तुझे धन्यवाद।
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