न्यायियों 6:14
पाठ
द्राक्षारस के कुण्ड में, गेहूँ की धूल और डर के बीच, गिदोन अभी-अभी अपनी शिकायत उगल चुका है: यदि यहोवा हमारे संग होते, तो यह सब क्यों? इसका उत्तर कोई तर्क नहीं, एक दृष्टि है। "तब यहोवा ने उस पर दृष्टि करके कहा, 'अपनी इसी शक्ति पर जा और तू इस्राएलियों को मिद्यानियों के हाथ से छुड़ाएगा; क्या मैंने तुझे नहीं भेजा?'" परमेश्वर गिदोन के प्रश्न का खंडन नहीं करते, उसे मोड़ देते हैं: जिस हाथ में अभी झाड़ने की छड़ी है, वही हाथ छुड़ाने का साधन बनेगा। और अंत में प्रश्न का उत्तर प्रश्न से दिया जाता है, जो वास्तव में आज्ञापत्र है।
मूल मर्म
ध्यान दीजिए कि परमेश्वर क्या नहीं कहते। वे गिदोन को सेना नहीं देते, न हथियार, न कोई रणनीति, न ही उसके धर्मशास्त्रीय संदेह का उत्तर। वे केवल भेजते हैं। यहाँ उद्धार का पूरा व्याकरण छिपा है: इस्राएल की सुरक्षा उसकी क्षमता में नहीं, बल्कि प्रेषण में है। "क्या मैंने तुझे नहीं भेजा" का भार "भेजने वाले" पर है, "भेजे गए" पर नहीं। यही कारण है कि "अपनी इसी शक्ति पर जा" कोई आत्मविश्वास का उपदेश नहीं। गिदोन की "शक्ति" तो डरकर छिपने की शक्ति है। परमेश्वर उस छोटी, लज्जाजनक, कुण्ड में दुबकी हुई सामर्थ्य को उठाकर अपने उद्देश्य में जोत देते हैं। अनुग्रह यही है: परमेश्वर पहले योग्य नहीं बनाते, फिर बुलाते हैं; वे बुलाते हैं, और बुलाहट ही योग्यता गढ़ती है।
सामान्य सूत्र
ओप्रा के उस बांज वृक्ष के नीचे जो हुआ, वह इस्राएल के लिए नया नहीं था। कुछ ही आयतें पहले एक नबी ने उन्हें याद दिलाया था: "मैं तुम को मिस्र में से ले आया, और दासत्व के घर से निकाल ले आया।" और मिस्र में भी यही ढाँचा था: एक डरा हुआ आदमी, एक झाड़ी, एक भेजना, और "मैं कौन हूँ?" का विरोध। परमेश्वर अपने लोगों को बार-बार किसी महान व्यक्ति के द्वारा नहीं, बल्कि किसी भेजे हुए व्यक्ति के द्वारा बचाते हैं। यह सूत्र अंत में उस एक तक पहुँचता है जिसने अपने विषय में बार-बार कहा कि वे अपनी ओर से नहीं, भेजे जाने के कारण आए हैं। यीशु मसीह में भेजनेवाला और भेजा गया एक ही हो जाते हैं, और वहाँ उद्धार अधूरा नहीं रह जाता, जैसा गिदोन के साथ रह गया।
दर्पण
गिदोन का डर काल्पनिक नहीं था। हर फसल पर ऊँटों की धूल क्षितिज पर उठती थी, और साल भर की मेहनत कुछ घंटों में चर ली जाती थी। आप भी शायद किसी कुण्ड में काम कर रहे हैं: दफ्तर में जहाँ आपकी राय कोई नहीं पूछता, घर में जहाँ पैसा महीने के अंत तक नहीं खिंचता, उस बीमारी के साथ जिसने आपकी योजनाएँ छोटी कर दीं। और भीतर गिदोन वाली शिकायत बैठी है: यदि परमेश्वर संग होते, तो यह सब क्यों? परमेश्वर उस शिकायत को डाँटते नहीं। पर वे उसे आपके हाथ की ओर मोड़ देते हैं, जिसमें इस समय जो भी छोटी शक्ति है, वही उनका साधन है। आज एक कागज़ पर यह वाक्य लिखिए, "क्या मैंने तुझे नहीं भेजा?", और उसे वहाँ चिपका दीजिए जहाँ आप हर दिन अपना सबसे उबाऊ काम करते हैं।
एक बारीकी
"यहोवा ने उस पर दृष्टि करके कहा" में जो क्रिया है, उसका मूल अर्थ है मुँह फेरकर किसी की ओर होना। यह कोई सजावटी वाक्यांश नहीं। गिदोन ने अभी-अभी कहा था, "अब तो यहोवा ने हमको त्याग दिया, और मिद्यानियों के हाथ कर दिया है।" त्याग देने का अर्थ प्राचीन भाषा में मुँह फेर लेना था। और उत्तर में परमेश्वर वही करते हैं जिसका इनकार गिदोन ने किया था: वे मुँह उसकी ओर कर देते हैं। कथा वाद-विवाद से उत्तर नहीं देती, शरीर की भाषा से देती है। जहाँ गिदोन ने सोचा कि पीठ है, वहाँ चेहरा है। बाद में जब वह वेदी का नाम "यहोवा शालोम" रखता है, वह इसी पलटे हुए चेहरे का स्मारक है।
कठिन प्रश्न
अध्याय की पहली आयत कहती है कि यहोवा ने ही इस्राएल को सात वर्ष मिद्यानियों के वश में कर रखा। तो जब परमेश्वर कहते हैं, "तू इस्राएलियों को मिद्यानियों के हाथ से छुड़ाएगा," तो वे उसी बंधन को तोड़ रहे हैं जिसे उन्होंने बाँधा था। गिदोन का प्रश्न इसलिए कोई नास्तिक बड़बड़ाहट नहीं, वह सही जगह पर उँगली रखता है। पाठ इसे सुलझाता नहीं। वह यह नहीं कहता कि दंड कहाँ समाप्त होकर अनुग्रह कहाँ आरम्भ होता है। वह केवल इतना दिखाता है कि जो हाथ कसता है, वही हाथ खोलता है, और वह हाथ किसी और का नहीं। यह सुविधाजनक उत्तर नहीं है। पर परदेशी देवताओं के बीच जीते इस्राएल के लिए यह कम-से-कम इतना अर्थ रखता था: हमारा दुख किसी अंधे संयोग के हाथ में नहीं है।
मुख्य पात्र
गिदोन को दूत "शूरवीर सूरमा" कहकर पुकारता है, और वह उस समय अंगूर पेरने के गड्ढे में, छिपकर, थोड़ा-सा गेहूँ झाड़ रहा है। खलिहान खुली, हवादार ऊँचाई पर होता था; कुण्ड गहरा और बंद। यानी वह गलत जगह पर, अकुशल ढंग से, डर के कारण काम कर रहा है। उसका पूरा आत्म-चित्र इसी से बना है: सबसे कंगाल कुल, पिता के घराने में सबसे छोटा। वह कड़वा है, सतर्क है, चिन्ह माँगता है, रात में वेदी गिराता है क्योंकि दिन में डरता है। और परमेश्वर उसे इसी रूप में लेते हैं। बुलाहट उसकी कायरता को छिपाती नहीं; वह उसे सामने लाती है और फिर भी भेज देती है। यही इस कहानी का सबसे असहज और सबसे सांत्वना देने वाला पक्ष है।
मनन के प्रश्न
आपके हाथ में इस समय जो "इसी शक्ति" है, वह आपको कितनी छोटी लगती है, और यह छोटापन आपको किस काम से रोक रहा है?
गिदोन की तरह आप परमेश्वर से कौन-सा प्रश्न पूछना चाहते हैं पर पूछने से डरते हैं, और यदि उत्तर तर्क नहीं बल्कि एक भेजना हो तो?
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Judges 6:14 के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
इस बाइबल अंश के बारे में सामान्य प्रश्नों के त्वरित उत्तर।
न्यायियों 6:14 का क्या अर्थ है?
न्यायियों 6:14 किस विषय में है?
न्यायियों 6:14 का ऐतिहासिक संदर्भ क्या है?
न्यायियों 6:14 हमें परमेश्वर के स्वभाव के बारे में क्या सिखाता है?
न्यायियों 6:14 आज भी कैसे प्रासंगिक है?
Judges 6 पर समुदाय क्या साझा करता है
इस अंश पर पाठकों और संपादकीय टीम से अंतर्दृष्टि, प्रार्थनाएँ और धन्यवाद।
मिद्यानियों के डर के मारे इस्राएलियों ने पहाड़ों में गुफाएँ, और खोह, और गढ़ बना लिए।"
डर ने उन्हें मेहनती बना दिया, पर गलत दिशा में। जो हाथ वेदी बना सकते थे, वे छिपने की जगहें खोदते रहे। आज भी हम डर के मारे बहुत कुछ बनाते हैं, दीवारें, बहाने, चुप्पी। सोचो, तुम्हारी कौन सी गुफा असल में डर से खुदी है?
आपका धन्यवाद कि आपने गिदोन को साफ साफ कहा, "मांस और अख़मीरी रोटियाँ लेकर इस चट्टान पर रख दे," और उलझन में उसे अपनी आवाज़ सुनाई। धन्यवाद कि हमारी छोटी सी भेंट भी आपके सामने रखी जा सकती है, और एक साधारण चट्टान आपकी उपस्थिति की जगह बन जाती है।
गिदोन दाख के कुण्ड में छिपकर गेहूँ झाड़ रहा था, डर के मारे। और परमेश्वर उसे "हे शूरवीर" कहकर पुकारता है। गिदोन का जवाब सुन: "हे प्रभु, मैं इस्राएल को कैसे छुड़ाऊँ? देख, मेरा कुल मनश्शे में सबसे निर्बल है, और मैं अपने पिता के घराने में सबसे छोटा हूँ।" वह अपनी कमज़ोरियाँ गिनता है, परमेश्वर उसकी बुलाहट। तू अपने आपको जिस नाम से जानता है, क्या परमेश्वर तुझे उसी नाम से बुलाता है?
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