मलाकी 3:10
यह पाठ
परमेश्वर अपनी प्रजा से कहते हैं: दशमांश का कुछ हिस्सा नहीं, अधूरा नहीं, बल्कि "सारे दशमांश भण्डार में ले आओ", ताकि मन्दिर में सचमुच भोजनवस्तु रहे और वहाँ सेवा करनेवाले भूखे न रहें। और फिर वह वाक्य आता है जो पूरे पुराने नियम में लगभग बेजोड़ है: "ऐसा करके मुझे परखो।" जो परमेश्वर बार-बार कहते हैं कि उनकी परीक्षा मत लो, वही यहाँ स्वयं को जाँच के लिए प्रस्तुत करते हैं, इस वादे के साथ कि वे आकाश के झरोखे खोलकर अपरम्पार आशीष की वर्षा करेंगे। यह आदेश और निमन्त्रण एक ही साँस में है, और दोनों को अलग नहीं किया जा सकता।
मूल बात
ध्यान दीजिए कि यहाँ मुद्दा पैसा नहीं, भरोसा है। पिछली आयत में परमेश्वर ने भारी शब्द इस्तेमाल किया था, "तुम मुझे लूटते हो", और लूट तब होती है जब कोई उस चीज़ पर हाथ रखता है जो उसकी है ही नहीं। दशमांश रोक लेना केवल हिसाब की गड़बड़ी नहीं थी; वह एक चुपचाप कहा गया वाक्य था: परमेश्वर पर भरोसा नहीं किया जा सकता, इसलिए मैं अपनी सुरक्षा अपने हाथ में रखूँगा। इसीलिए उत्तर में परमेश्वर पैसा नहीं माँगते, वे स्वयं को दाँव पर लगा देते हैं। "मुझे परखो" का अर्थ है: मेरे चरित्र की जाँच कर लो। यह अनुग्रह है, कठोर रूप में; परमेश्वर वह लौटाना चाहते हैं जो हमने खो दिया है, यह विश्वास कि देनेवाला सचमुच देता रहेगा।
सूत्र
दशमांश का यह आदेश हवा में नहीं टँगा है। इसी अध्याय की शुरुआत में परमेश्वर कहते हैं कि उनका दूत आ रहा है और वह "लेवियों को शुद्ध करेगा", ताकि "वे यहोवा की भेंट धार्मिकता से चढ़ाएँगे"। यानी असली समस्या भण्डार का खालीपन नहीं, चढ़ानेवाले का मन है। और वही धारा सीधे मसीह तक जाती है: जो व्यक्ति परमेश्वर पर पूरा भरोसा करके अपना सब कुछ दे दिया, वे यीशु मसीह हैं, जिन्होंने कुछ रोका नहीं, दसवाँ भाग भी नहीं, दसों भाग दे दिए। इसलिए मलाकी का "मुझे परखो" क्रूस पर अपने अन्तिम रूप में उतरता है। वहाँ परमेश्वर ने स्वयं को जाँच के लिए खोल दिया और आकाश के झरोखे खुल गए, ऐसी आशीष के साथ जिसका हिसाब कोई भण्डार नहीं रख सकता।
दर्पण
अब ईमानदारी से: आपका पैसा कहाँ जाता है, यह आपके कैलेंडर से ज़्यादा सच बोलता है। जब वेतन आता है, तो पहला विचार क्या होता है, बच्चों की फ़ीस, ईएमआई, बीमा, "इस महीने तंगी है"? इनमें से कोई भी पाप नहीं है। पाप वहाँ शुरू होता है जहाँ हम चुपचाप मान लेते हैं कि परमेश्वर के हिस्से का समय बाद में आएगा, जब हालात सुधरेंगे, और वह "बाद में" कभी नहीं आता। यह पाठ आपके डर को नाम देता है: आप देते नहीं क्योंकि आपको लगता है कि देने से कम पड़ जाएगा। और वह डर, कड़वी बात है, परमेश्वर के चरित्र पर अविश्वास का दूसरा नाम है। दूसरी ओर यहाँ राहत भी है: परमेश्वर आपसे अंधा समर्पण नहीं, एक जाँच माँगते हैं। वे कहते हैं, आज़माकर देखो।
आज ही करें: अपने खाते या पर्स में जो है, उसका दसवाँ भाग गिनकर आज ही किसी को दे दें, अपने कलीसिया के भण्डार में या किसी ऐसे ज़रूरतमन्द को जिसका नाम आप जानते हैं, और भेजते समय ज़ोर से कहें, "प्रभु, मैं आपको परख रहा हूँ, जैसा आपने कहा।"
मुख्य पात्र
इस आयत का मुख्य पात्र वह परमेश्वर है जो अपने ही वचन से बँध जाता है। यही परमेश्वर आयत 6 में कहते हैं, "मैं यहोवा बदलता नहीं", और यही अपरिवर्तनीयता उनके वादे को खोखला होने से बचाती है। ध्यान दीजिए वे कैसे बोलते हैं: आदेश देकर वे चुप नहीं हो जाते, वे स्वयं को जाँच के लिए सामने रख देते हैं, जैसे कोई पिता अपने संदेहभरे बेटे से कहे, चल, मुझे आज़मा ले। यह ताक़तवर का व्यवहार नहीं जो अपनी इज़्ज़त बचाता है; यह प्रेमी का व्यवहार है जो अपने बच्चे का भरोसा वापस जीतना चाहता है। "सेनाओं का यहोवा", वह नाम जिसमें सेनाएँ हैं, वही खुद को परखे जाने देता है। यही उनकी महानता का सबसे कोमल रूप है।
प्रश्न
तो क्या यह पक्का सौदा है, दशमांश डालो और समृद्धि निकलो? यहीं यह आयत सबसे ज़्यादा दुरुपयोग हुई है, और ईमानदारी माँगती है कि हम सच कहें: अनेक विश्वासी उदारता से देते रहे और फिर भी उनकी फ़सल मारी गई, नौकरी गई, बीमारी आई। मलाकी झूठ नहीं बोलते, पर वे किसी मशीन का वर्णन भी नहीं कर रहे। इस पूरे अध्याय में आशीष का चरम आयत 17 में है, जहाँ परमेश्वर कहते हैं कि वे लोग "मेरे निज भाग ठहरेंगे" और उनसे कोमलता की जाएगी। यही "अपरम्पार आशीष" का केन्द्र है। परमेश्वर देनेवाले के कर्ज़दार नहीं होते, फिर भी वे अपने वादे के कर्ज़दार बने रहते हैं, और इन दोनों सच्चाइयों के बीच का तनाव मिटाया नहीं जा सकता, केवल भरोसे से जिया जा सकता है।
बारीकी
"सारे दशमांश" में वह छोटा शब्द "सारे" ही असली चुभन है। दशमांश आधा लाना संभव है और तब भी अपने आप को देनेवाला मानना संभव है; यही उस समय के लोग कर रहे थे और इसीलिए वे पूछ सके, "हमने किस बात में तुझे लूटा है?" अधूरा देना विवेक को शान्त कर देता है और भरोसे को कहीं नहीं ले जाता। और शब्द "भण्डार" भी सोचने लायक है: यह आँकड़ा नहीं, रसोई है। भण्डार खाली होने का मतलब था कि लेवी खेतों में काम करने चले जाते और मन्दिर की सेवा रुक जाती। आपका अधूरा देना किसी की थाली से जुड़ा है, किसी आत्मा की देखभाल से जुड़ा है। परमेश्वर को हमारे पैसे की ज़रूरत नहीं, पर उनके काम को ज़रूर है।
चिन्तन
पिछले तीन महीनों में मैंने जो दिया, वह मेरे भरोसे का प्रमाण था या मेरी सुविधा का हिसाब?
अगर परमेश्वर आज मुझसे कहें "मुझे परखो", तो मेरे भीतर पहला भाव उत्साह होगा या घबराहट, और वह भाव मेरे बारे में क्या बताता है?
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Malachi 3:10 के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
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मलाकी 3:10 हमें परमेश्वर के स्वभाव के बारे में क्या सिखाता है?
मलाकी 3:10 आज भी कैसे प्रासंगिक है?
Malachi 3 पर समुदाय क्या साझा करता है
इस अंश पर पाठकों और संपादकीय टीम से अंतर्दृष्टि, प्रार्थनाएँ और धन्यवाद।
पिता, धन्यवाद कि आपने अपने दूत को भेजकर मार्ग सुधारा और वादे के अनुसार प्रभु अपने मन्दिर में आए। धन्यवाद कि जिसे हम ढूँढ़ते रहे, वह आ गया, और आपकी वाचा आज भी सच्ची है। मेरे जीवन की टेढ़ी राहें भी आप सीधी कर रहे हैं, इसके लिए मेरा हृदय आभारी है।
पिता, कभी कभी मैं अपनी मुट्ठी बंद रखता हूँ, जो तेरा है उसे भी अपना समझ बैठता हूँ। मुझे दिखा कि मेरे पास जो कुछ है वह तेरी दया से आया है। मेरा मन खुला कर, ताकि मैं डर से नहीं, भरोसे से देना सीखूँ।
मजदूर की मजदूरी दबानेवालों के" विरुद्ध परमेश्वर स्वयं साक्षी बनता है। सोचो, जिस मजदूर की बात कोई अदालत नहीं सुनती, उसका गवाह सेनाओं का यहोवा है। लोग पूछ रहे थे, न्याय का परमेश्वर कहाँ है? उत्तर यह आया कि वह आ रहा है, और उसकी सूची में जादू के साथ ही दबाई गई मजदूरी भी लिखी है। तुम्हारे हाथ में किसका हक़ रुका पड़ा है?
हे प्रभु, मेरे मन की भेंट को शुद्ध कर, ताकि जो कुछ मैं तेरे सामने लाऊँ, वह तुझे भाए। जैसे पुराने दिनों में तेरे लोगों की आराधना तुझे प्रिय थी, वैसे ही आज मेरा जीवन और मेरी सेवा तेरे लिए मीठी हो।
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