मरकुस 9
पाठ
पहाड़ पर यीशु का रूप बदल जाता है, मूसा और एलिय्याह उनसे बातें करते हैं, और बादल में से एक आवाज़ आती है: "यह मेरा प्रिय पुत्र है; इसकी सुनो।" नीचे उतरते ही वही चेले एक ऐसे बालक के सामने असहाय खड़े हैं जिसे आत्मा मरोड़ती है, और उसका पिता टूटे हुए शब्दों में प्रार्थना करता है। इसके बाद यीशु दूसरी बार अपनी मृत्यु की बात करते हैं, चेले रास्ते में बड़प्पन पर झगड़ते हैं, और अध्याय चक्की के पाट, कटे हुए हाथ और नमक की कड़ी चेतावनियों पर जाकर रुकता है।
मर्म
बादल में से आई आवाज़ दो वाक्यों में बनी है: पहचान और आज्ञा। पहचान भजन 2:7 की है, वह राज्याभिषेक का गीत जहाँ परमेश्वर राजा को "मेरा पुत्र" कहते हैं। आज्ञा व्यवस्थाविवरण 18:15 की गूँज है, जहाँ मूसा वादा करते हैं कि परमेश्वर उनके जैसा एक भविष्यद्वक्ता खड़ा करेंगे, "उसी की सुनना।" दोनों को जोड़िए और आप देखेंगे कि परमेश्वर क्या कह रहे हैं: यह राजा है, और यह अंतिम वचन है। पर ध्यान दीजिए कि "इसकी सुनो" किस बात के ठीक बाद आता है, उस बात के बाद जो यीशु अभी-अभी कह चुके हैं, कि मनुष्य का पुत्र "बहुत दुःख उठाएगा, और तुच्छ गिना जाएगा।" महिमा सुनने से मना नहीं करती; वह क्रूस की बात को सुनने के लिए अधिकार देती है।
जोड़ने वाला सूत्र
छः दिन, ऊँचा पहाड़, बादल, आवाज़: यह निर्गमन 24 का ढाँचा है, जहाँ मूसा छः दिन तक बादल से ढके सीनै पर्वत पर रहे और सातवें दिन परमेश्वर ने पुकारा। मूसा वहाँ व्यवस्था लेने गए थे; एलिय्याह उसी पहाड़ पर हताश होकर लौटे थे। व्यवस्था और भविष्यद्वाणी, दोनों यहाँ यीशु के साथ "बातें करते थे", और फिर अचानक चले जाते हैं: "यीशु को छोड़ अपने साथ और किसी को न देखा।" यह मूसा और एलिय्याह का अपमान नहीं, उनकी पूर्णता है। और जब यीशु कहते हैं "एलिय्याह तो आ चुका", तो वे मलाकी के अंतिम वादे को यूहन्ना बपतिस्मा देनेवाले में उतार देते हैं, एक ऐसा अग्रदूत जिसके साथ लोगों ने "जो कुछ चाहा" किया। अग्रदूत की नियति मसीह की नियति की भविष्यवाणी थी।
दर्पण
सबसे ईमानदार प्रार्थना इस अध्याय में किसी चेले के मुँह से नहीं निकलती, बल्कि एक थके हुए पिता के मुँह से जो वर्षों से अपने बेटे को आग और पानी से खींचकर निकालता आया है: "हे प्रभु, मैं विश्वास करता हूँ; मेरे अविश्वास का उपाय कर।" यह आदमी विश्वास और संदेह के बीच चुनाव नहीं करता, वह दोनों को एक साथ यीशु के सामने रख देता है। और यीशु इस अधूरे विश्वास को ठुकराते नहीं। इसके उलट, रास्ते पर चलते चेले इस बात में उलझे हैं कि "हम में से बड़ा कौन है", ठीक उस समय जब उनका गुरु अपनी मृत्यु की बात कर रहा है। नौकरी में पद, परिवार में सही होने की ज़िद, मंडली में कौन दिखाई दे, यह झगड़ा कभी पुराना नहीं पड़ता। आज, ज़ोर से, अपने नाम से वह एक स्थिति कहिए जहाँ आप हार चुके हैं, और उसी पिता के शब्द बोलिए: "मैं विश्वास करता हूँ; मेरे अविश्वास का उपाय कर।"
पृष्ठभूमि
यह सब कैसरिया फिलिप्पी के बाद होता है, जहाँ पतरस ने यीशु को मसीह कहा था और फिर दुःख उठाने की बात पर उन्हें झिड़का था। छः दिन बाद पहाड़, और उसके बाद एक लंबी, गुप्त यात्रा: "वह नहीं चाहता था कि कोई जाने।" यीशु गलील से होकर कफरनहूम लौट रहे हैं, पर अब सार्वजनिक प्रचार नहीं, चेलों की तैयारी चल रही है। नीचे की दुनिया में शास्त्री भीड़ के सामने चेलों से विवाद कर रहे हैं, यानी एक सार्वजनिक मान-अपमान की लड़ाई, जहाँ चेलों की नाकामी उनके गुरु की साख पर दाग है। और जिस बालक को यीशु गोद में उठाते हैं, वह उस समाज में कोई प्यारा प्रतीक नहीं था, बल्कि कानूनी रूप से शक्तिहीन, पूरी तरह दूसरों पर निर्भर एक व्यक्ति।
कठिन प्रश्न
वही यीशु जो एक बच्चे को गोद में लेते हैं, कुछ ही वाक्यों बाद चक्की के पाट, कटे हुए हाथ और उस आग की बात करते हैं "जो कभी बुझने की नहीं"। अंतिम पंक्ति यशायाह 66:24 से सीधी उठाई गई है, जहाँ विद्रोहियों की लाशें यरूशलेम के बाहर पड़ी हैं और उनका कीड़ा नहीं मरता। यीशु इसे नरम नहीं करते, और हमें भी इसकी अनुमति नहीं है। पर ध्यान दीजिए कि यह चेतावनी किसके लिए है: बाहरवालों के लिए नहीं, बल्कि उन्हीं बारह के लिए जो अभी-अभी बड़प्पन पर झगड़े थे और जिन्होंने एक अजनबी को यीशु के नाम में काम करने से रोका था। "हर एक जन आग से नमकीन किया जाएगा" का पूरा अर्थ शायद हमें कभी स्पष्ट न हो; इतना स्पष्ट है कि यह आग किसी और के लिए नहीं, मेरे ही लिए कही गई है।
पहले सुननेवाले
मरकुस के पहले पाठक ऐसे विश्वासी थे जो दबाव में थे और जिन्होंने अपने बीच हार देखी थी, नाकाम प्रार्थनाएँ, डरे हुए अगुवे, टूटे हुए रिश्ते। उनके लिए यह अध्याय अजीब रूप से राहत देनेवाला रहा होगा: जिन तीनों ने महिमा देखी, वे डर के मारे बेतुकी बात करते हैं; बाकी नौ एक बालक को छुड़ा नहीं पाते; और यीशु उन्हें "हे अविश्वासी लोगों" कहकर वही शब्द दोहराते हैं जो कभी जंगल की पीढ़ी के लिए कहे गए थे। फिर भी वे उन्हें छोड़ते नहीं। और अंत में, उन घरेलू मंडलियों के लिए जहाँ कौन बड़ा है का सवाल ज़िंदा था, एक छोटा-सा आदेश बचता है जो आज भी सबसे कठिन है: "अपने में नमक रखो, और आपस में मेल मिलाप से रहो।"
चिंतन
"इसकी सुनो" का मतलब आपके लिए इस सप्ताह ठीक-ठीक कौन-सी बात सुनना है, जिसे आप अब तक टालते आए हैं?
आपके जीवन में वह "छोटा" कौन है जिसे ग्रहण करने का कोई लाभ नहीं, और जिसे यीशु अपने साथ जोड़ लेते हैं?
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Mark 9 के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
इस बाइबल अंश के बारे में सामान्य प्रश्नों के त्वरित उत्तर।
मरकुस 9 का क्या अर्थ है?
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मरकुस 9 का ऐतिहासिक संदर्भ क्या है?
मरकुस 9 हमें परमेश्वर के स्वभाव के बारे में क्या सिखाता है?
मरकुस 9 आज भी कैसे प्रासंगिक है?
Mark 9 पर समुदाय क्या साझा करता है
इस अंश पर पाठकों और संपादकीय टीम से अंतर्दृष्टि, प्रार्थनाएँ और धन्यवाद।
यदि तेरी आँख तुझे ठोकर खिलाए तो उसे निकाल डाल" कहते समय यीशु चेले को डराना नहीं चाहते थे, जगाना चाहते थे। आँख वह दरवाज़ा है जिससे पाप सबसे पहले भीतर आता है, और हम उसी दरवाज़े को सबसे ज़्यादा बहाने देते हैं। एक बार सोच, तेरे जीवन में वह कौन सी चीज़ है जिसे तू "छोटी बात" कहकर बचा रहा है? यीशु उसे छोटी नहीं कहते।
यीशु अभी अभी अपनी मृत्यु की बात कह चुके थे, और रास्ते में चेले इस पर बहस कर रहे थे कि बड़ा कौन है। घर पहुँचकर वे पूछते हैं, "रास्ते में तुम किस बात पर विवाद कर रहे थे?" वे जानते थे। फिर भी पूछा, ताकि चेले खुद अपनी बात सुनें। आज भी वे तुमसे यही पूछते हैं, सबके सामने नहीं, घर के भीतर, अकेले में। तुम्हारे मन की वह बहस क्या है जिसे तुम उनके सामने कहने में झिझकते हो?
छः दिन के बाद यीशु ने पतरस और याकूब और यूहन्ना को साथ लिया, और उन्हें एकान्त में किसी ऊँचे पहाड़ पर ले गया, और उनके सामने उसका रूप बदल गया।"
छः दिन कुछ नहीं हुआ। फिर भी वे साथ चलते रहे। और महिमा भीड़ के बीच नहीं, एकान्त में दिखाई गई।
तेरे वे खाली दिन बेकार नहीं हैं। शायद वह तुझे ऊपर ले जाने से पहले चुप्पी में तैयार कर रहा है।
यूहन्ना कहता है, "हमने उसे मना किया, क्योंकि वह हमारे पीछे नहीं हो लेता था।" ध्यान दे, उसने यह नहीं कहा कि वह तेरे पीछे नहीं चलता। हमारे पीछे। अभी थोड़ी देर पहले ये चेले बहस कर रहे थे कि उनमें बड़ा कौन है, और अब वही मन दूसरों को रोक रहा है। क्या तेरे मन में भी किसी की सेवा इसलिए खटकती है क्योंकि वह तेरे समूह की नहीं?
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