बाइबल व्याख्या

मरकुस 9:23

बाइबल

पाठ

एक पिता अपने बेटे को लेकर यीशु के सामने खड़ा है। बरसों से वह बच्चा एक दुष्ट आत्मा के चंगुल में है, आग और पानी में गिराया जाता रहा है, और चेले उसे छुड़ा नहीं सके। थका हुआ पिता कहता है, "यदि तू कुछ कर सके, तो हम पर तरस खाकर हमारा उपकार कर।" यीशु उसी "यदि" को उठाकर उसके सामने रख देते हैं: "यदि तू कर सकता है! यह क्या बात है? विश्वास करनेवाले के लिये सब कुछ हो सकता है।"

मर्म

ध्यान दीजिए कि यीशु किस शब्द पर पकड़ते हैं। पिता की पीड़ा पर नहीं, उसकी देर से आई प्रार्थना पर नहीं, बल्कि उस छोटे से "यदि" पर। वह "यदि" परमेश्वर की सामर्थ्य को एक प्रश्नचिह्न के भीतर बंद कर देता है, और यीशु उसे तोड़ देते हैं। यूनानी में यहाँ जो शब्द है, दुनाता, उसका अर्थ है "सम्भव" और साथ ही "सामर्थ्ययुक्त"; वही जड़ जिससे परमेश्वर की सामर्थ्य का शब्द बनता है। यीशु यह नहीं कह रहे कि विश्वास एक ऐसी शक्ति है जो चमत्कार उत्पन्न करती है। वे कह रहे हैं कि विश्वास वह खुला हाथ है जो उस सामर्थ्य को ग्रहण करता है जो पहले से यहाँ खड़ी है। अनुग्रह पहले है, विश्वास उसका उत्तर है। यही सुसमाचार का पूरा ढाँचा है।

सूत्र

सृष्टि के पहले पन्ने से लेकर यहाँ तक, परमेश्वर की पहचान यही रही है कि वे शून्य से बुलाते हैं और मरे हुए को जिलाते हैं। अब्राहम और सारा का बाँझपन, मिस्र में दासों की असहायता, सूखी हड्डियों की घाटी: हर बार वाचा का परमेश्वर वहाँ काम करता है जहाँ मनुष्य के पास कोई विकल्प नहीं बचा। यह पिता उसी लम्बी कतार में खड़ा है। और यह कहानी यूँ ही समाप्त नहीं होती: आत्मा निकलने के बाद "बालक मरा हुआ सा हो गया", और यीशु "उसका हाथ पकड़ के उसे उठाया, और वह खड़ा हो गया।" यह पुनरुत्थान की भाषा है। इसी अध्याय में यीशु तीन बार अपनी मृत्यु और जी उठने की बात करते हैं। जिस सामर्थ्य पर पिता को भरोसा करने के लिए कहा जा रहा है, वह अंततः खाली कब्र की सामर्थ्य है।

दर्पण

हम में से अधिकांश इस पिता की तरह प्रार्थना करते हैं, चाहे शब्द अलग हों। "अगर आप कुछ कर सकें, तो मेरी बेटी की शादी बच जाए।" "अगर मुमकिन हो, तो यह रिपोर्ट ठीक आ जाए।" "अगर आपको फ़ुरसत हो, तो मेरे पिता का दर्द कम हो।" यह विनम्रता नहीं है; यह वर्षों की निराशा से बना हुआ कवच है, ताकि उम्मीद फिर से टूटे तो ज़्यादा चोट न लगे। हम परमेश्वर की सामर्थ्य को छोटा करके अपने दिल को सुरक्षित रखना चाहते हैं। यीशु उस कवच को उतार देते हैं, पर कठोरता से नहीं: वे पिता को डाँटकर भगाते नहीं, उसे आगे बुलाते हैं। आज यह कीजिए: एक कागज़ पर वह प्रार्थना लिखिए जिसे आप महीनों से "अगर" के साथ कहते आए हैं, फिर उस "अगर" को काट दीजिए और वही वाक्य ऊँची आवाज़ में परमेश्वर से कहिए।

मुख्य पात्र

इस दृश्य में यीशु का व्यवहार असहज करता है। वे पहले "हे अविश्वासी लोगों" कहकर पूरी भीड़ को झिड़कते हैं, फिर एक टूटे हुए पिता के शब्दों को दोहराकर उसे आईना दिखाते हैं। यह कोई मधुर, सहमति में सिर हिलाने वाला मसीहा नहीं है। पर उसी साँस में वे कहते हैं, "उसे मेरे पास लाओ।" यहीं उनका असली चरित्र खुलता है: वे झूठी सांत्वना नहीं देते, पर किसी को लौटाते भी नहीं। पहाड़ पर जिस तेज में वे अभी-अभी चमके थे, उसी तेज को लेकर वे नीचे झाग और धूल के बीच उतरते हैं। परमेश्वर की पवित्रता हमसे दूरी नहीं बनाती; वह हमारे सबसे गंदे कोने में हाथ डालती है और उठा खड़ा करती है।

प्रश्न

तो क्या "सब कुछ हो सकता है" का मतलब यह है कि अगर मेरी बीमारी नहीं गई, तो दोष मेरे विश्वास का है? यह सवाल टालने लायक नहीं, क्योंकि इसी आयत से कितने लोगों पर बोझ लादा गया है। पर ध्यान दीजिए, चंगाई तब होती है जब पिता चिल्लाकर अपने अविश्वास को कबूल करता है। यीशु उस कमज़ोर, फटे हुए विश्वास को ठुकराते नहीं। यानी यह आयत विश्वास की मात्रा का मापदंड नहीं, बल्कि उसकी दिशा का प्रश्न है। और फिर भी: कुछ प्रार्थनाएँ अनुत्तरित रहती हैं, और यह पाठ हमें इसका सुव्यवस्थित उत्तर नहीं देता। हमें उस खाली जगह में खड़ा रहना पड़ता है, इस भरोसे के साथ कि जो हाथ इस बालक को उठा सका, वह अंत में सबको उठाएगा।

पृष्ठभूमि

मरकुस के पहले पाठक रोम के सताए हुए विश्वासी थे, जिनके अपने चेले, अपने अगुवे, नाकाम हो रहे थे। उन्होंने इस कहानी में सबसे पहले चेलों की विफलता देखी होगी, अपनी ही तस्वीर। उनके लिए दुष्ट आत्माएँ कोई रूपक नहीं थीं, बल्कि एक असली, शत्रुतापूर्ण सत्ता जो बच्चों को भी नहीं छोड़ती। और उनके कानों में "विश्वास करनेवाले के लिये सब कुछ हो सकता है" कोई सकारात्मक सोच का नारा नहीं था, बल्कि राज्य के आने की घोषणा: वह राज्य जिसकी सामर्थ्य यीशु अध्याय के आरम्भ में वादा करते हैं, अब इस मिरगी से मरोड़े हुए बच्चे के शरीर में उतर आई है। उद्धार दूर के आसमान से नहीं, ज़मीन पर पड़े एक लड़के के हाथ से शुरू होता है।

चिंतन

आपकी प्रार्थनाओं में वह "यदि" कहाँ से आया है: विनम्रता से, या पुरानी निराशा से?

अगर परमेश्वर आपके सबसे पुराने दर्द को छूने के लिए आज तैयार हों, तो आपको सबसे ज़्यादा किस बात का डर लगेगा?

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Mark 9:23 के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

इस बाइबल अंश के बारे में सामान्य प्रश्नों के त्वरित उत्तर।

मरकुस 9:23 का क्या अर्थ है?
एक पिता अपने बेटे को लेकर यीशु के सामने खड़ा है। बरसों से वह बच्चा एक दुष्ट आत्मा के चंगुल में है, आग और पानी में गिराया जाता रहा है, और चेले उसे छुड़ा नहीं सके। थका हुआ पिता कहता है, "यदि तू कुछ कर सके, तो हम पर तरस खाकर हमारा उपकार कर।" यीशु उसी "यदि" को उठाकर उसके सामने रख देते हैं: "यदि तू कर सकता है!
मरकुस 9:23 किस विषय में है?
सृष्टि के पहले पन्ने से लेकर यहाँ तक, परमेश्वर की पहचान यही रही है कि वे शून्य से बुलाते हैं और मरे हुए को जिलाते हैं। अब्राहम और सारा का बाँझपन, मिस्र में दासों की असहायता, सूखी हड्डियों की घाटी: हर बार वाचा का परमेश्वर वहाँ काम करता है जहाँ मनुष्य के पास कोई विकल्प नहीं बचा। यह पिता उसी लम्बी कतार में खड़ा है। और यह कहानी यूँ ही समाप्त नहीं होती: आत्मा निकलने के बाद "बालक मरा हुआ सा हो गया", और यीशु "उसका हाथ पकड़ के उसे उठाया, और वह खड़ा हो गया।" यह पुनरुत्थान की भाषा है। इसी अध्याय में यीशु तीन बार अपनी मृत्यु और जी उठने की बात करते हैं। जिस सामर्थ्य पर पिता को भरोसा करने के लिए कहा जा रहा है, वह अंततः खाली कब्र की सामर्थ्य है।
मरकुस 9:23 का ऐतिहासिक संदर्भ क्या है?
इस दृश्य में यीशु का व्यवहार असहज करता है। वे पहले "हे अविश्वासी लोगों" कहकर पूरी भीड़ को झिड़कते हैं, फिर एक टूटे हुए पिता के शब्दों को दोहराकर उसे आईना दिखाते हैं। यह कोई मधुर, सहमति में सिर हिलाने वाला मसीहा नहीं है। पर उसी साँस में वे कहते हैं, "उसे मेरे पास लाओ।" यहीं उनका असली चरित्र खुलता है: वे झूठी सांत्वना नहीं देते, पर किसी को लौटाते भी नहीं। पहाड़ पर जिस तेज में वे अभी-अभी चमके थे, उसी तेज को लेकर वे नीचे झाग और धूल के बीच उतरते हैं। परमेश्वर की पवित्रता हमसे दूरी नहीं बनाती; वह हमारे सबसे गंदे कोने में हाथ डालती है और उठा खड़ा करती है।
मरकुस 9:23 हमें परमेश्वर के स्वभाव के बारे में क्या सिखाता है?
मरकुस के पहले पाठक रोम के सताए हुए विश्वासी थे, जिनके अपने चेले, अपने अगुवे, नाकाम हो रहे थे। उन्होंने इस कहानी में सबसे पहले चेलों की विफलता देखी होगी, अपनी ही तस्वीर। उनके लिए दुष्ट आत्माएँ कोई रूपक नहीं थीं, बल्कि एक असली, शत्रुतापूर्ण सत्ता जो बच्चों को भी नहीं छोड़ती। और उनके कानों में "विश्वास करनेवाले के लिये सब कुछ हो सकता है" कोई सकारात्मक सोच का नारा नहीं था, बल्कि राज्य के आने की घोषणा: वह राज्य जिसकी सामर्थ्य यीशु अध्याय के आरम्भ में वादा करते हैं, अब इस मिरगी से मरोड़े हुए बच्चे के शरीर में उतर आई है। उद्धार दूर के आसमान से नहीं, ज़मीन पर पड़े एक लड़के के हाथ से शुरू होता है।
मरकुस 9:23 आज भी कैसे प्रासंगिक है?
अगर परमेश्वर आपके सबसे पुराने दर्द को छूने के लिए आज तैयार हों, तो आपको सबसे ज़्यादा किस बात का डर लगेगा?
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Mark 9 पर समुदाय क्या साझा करता है

इस अंश पर पाठकों और संपादकीय टीम से अंतर्दृष्टि, प्रार्थनाएँ और धन्यवाद।

अंतर्दृष्टि संपादकीय पर पद 47

यदि तेरी आँख तुझे ठोकर खिलाए तो उसे निकाल डाल" कहते समय यीशु चेले को डराना नहीं चाहते थे, जगाना चाहते थे। आँख वह दरवाज़ा है जिससे पाप सबसे पहले भीतर आता है, और हम उसी दरवाज़े को सबसे ज़्यादा बहाने देते हैं। एक बार सोच, तेरे जीवन में वह कौन सी चीज़ है जिसे तू "छोटी बात" कहकर बचा रहा है? यीशु उसे छोटी नहीं कहते।

अंतर्दृष्टि संपादकीय पर पद 33

यीशु अभी अभी अपनी मृत्यु की बात कह चुके थे, और रास्ते में चेले इस पर बहस कर रहे थे कि बड़ा कौन है। घर पहुँचकर वे पूछते हैं, "रास्ते में तुम किस बात पर विवाद कर रहे थे?" वे जानते थे। फिर भी पूछा, ताकि चेले खुद अपनी बात सुनें। आज भी वे तुमसे यही पूछते हैं, सबके सामने नहीं, घर के भीतर, अकेले में। तुम्हारे मन की वह बहस क्या है जिसे तुम उनके सामने कहने में झिझकते हो?

अंतर्दृष्टि संपादकीय पर पद 2

छः दिन के बाद यीशु ने पतरस और याकूब और यूहन्ना को साथ लिया, और उन्हें एकान्त में किसी ऊँचे पहाड़ पर ले गया, और उनके सामने उसका रूप बदल गया।"

छः दिन कुछ नहीं हुआ। फिर भी वे साथ चलते रहे। और महिमा भीड़ के बीच नहीं, एकान्त में दिखाई गई।

तेरे वे खाली दिन बेकार नहीं हैं। शायद वह तुझे ऊपर ले जाने से पहले चुप्पी में तैयार कर रहा है।

अंतर्दृष्टि संपादकीय पर पद 38

यूहन्ना कहता है, "हमने उसे मना किया, क्योंकि वह हमारे पीछे नहीं हो लेता था।" ध्यान दे, उसने यह नहीं कहा कि वह तेरे पीछे नहीं चलता। हमारे पीछे। अभी थोड़ी देर पहले ये चेले बहस कर रहे थे कि उनमें बड़ा कौन है, और अब वही मन दूसरों को रोक रहा है। क्या तेरे मन में भी किसी की सेवा इसलिए खटकती है क्योंकि वह तेरे समूह की नहीं?

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