मत्ती 10:1
पाठ
यीशु अपने बारह चेलों को पास बुलाते हैं। बुलाना पहले आता है, भेजना बाद में; निकटता के बिना कोई अधिकार नहीं दिया जाता। और फिर वे उन्हें वह देते हैं जो अब तक केवल उन्हीं के हाथ में दिखाई दिया था: अशुद्ध आत्माओं पर अधिकार, कि उन्हें निकालें, और "सब प्रकार की बीमारियों और सब प्रकार की दुर्बलताओं को दूर करें।" ध्यान दीजिए कि यहाँ कोई शर्त, कोई परीक्षा, कोई योग्यता-सूची नहीं है। नाम तो अगले पद में आते हैं, और उस सूची में एक चुंगी लेनेवाला भी है और एक विश्वासघाती भी। पहले अधिकार, फिर परिचय। यह क्रम संयोग नहीं है।
मूल बात
यह पद बताता है कि परमेश्वर का राज्य कैसे फैलता है: उधार दिए गए अधिकार से। चेलों के भीतर से कुछ नहीं उठता; सब कुछ सौंपा जाता है। मत्ती ने अभी-अभी अध्याय आठ और नौ में यीशु को कोढ़ियों, लकवे के मारों और दुष्टात्माओं के सामने दिखाया है, और अब वही काम बारह हाथों में चला जाता है। यह मानो गिनती 11 की वह घटना है जहाँ मूसा पर ठहरी आत्मा सत्तर पुरनियों पर बाँटी जाती है, पर वहाँ बोझ हल्का करने के लिए, यहाँ राज्य को आगे बढ़ाने के लिए। और जिस पर अधिकार दिया गया है वह ध्यान देने योग्य है: रोग, दुर्बलता, अशुद्ध आत्माएँ। यानी वह सब जो मनुष्य को तोड़ता और अशुद्ध ठहराता है। राज्य का पहला चिह्न उपदेश नहीं, बल्कि टूटे शरीरों की मरम्मत है।
सामान्य सूत्र
यहेजकेल 34 में परमेश्वर इस्राएल के चरवाहों पर फटकार लगाते हैं: उन्होंने दुर्बलों को बल नहीं दिया, रोगियों को चंगा नहीं किया, खोई हुई को नहीं खोजा। और फिर वे कहते हैं कि वे स्वयं आकर अपनी भेड़ों को खोजेंगे। मत्ती 10:1 उसी वचन की पूर्ति का अगला चरण है। सच्चा चरवाहा आ गया है, और वह अपने काम को अकेले नहीं रखता; वह बारह को बुलाकर उन्हीं हाथों में सौंप देता है जो चार पद बाद "इस्राएल के घराने ही की खोई हुई भेड़ों" के पास भेजे जाएँगे। बारह की संख्या भी यही कहती है: याकूब के बारह पुत्र, बिखरा हुआ इस्राएल, अब नए सिरे से इकट्ठा किया जा रहा है। यह धागा सीधे पुनरुत्थान के बाद तक जाता है, जहाँ यीशु अपने चेलों से कहते हैं कि जैसे पिता ने उन्हें भेजा, वैसे ही वे उन्हें भेजते हैं। बुलाना, सौंपना, भेजना: यही परमेश्वर की आदत है।
दर्पण
हम में से अधिकांश अधिकार की कमी से नहीं, अधिकार के भ्रम से थकते हैं। आप कक्षा में, दफ़्तर में, घर में वह व्यक्ति हैं जिससे सब उम्मीद करते हैं कि वह ठीक कर देगा: बिगड़ा रिश्ता, बीमार माता-पिता, बेटा जो बात नहीं करता। और भीतर एक सवाल खटकता रहता है, जो मत्ती 10:1 सीधे छूता है: मेरे पास ऐसा है क्या जो किसी को चंगा कर सके? ईमानदार उत्तर है, नहीं। चेलों के पास भी नहीं था। उनके पास केवल वह था जो दिया गया, और इसीलिए यीशु आगे कहते हैं, "तुम ने सेंत-मेंत पाया है, सेंत-मेंत दो।" यह राहत भी है और चुनौती भी: आप स्रोत नहीं हैं, पर आप नाली ज़रूर हैं, और नालियाँ बंद भी हो सकती हैं। आज एक काम कीजिए: एक काग़ज़ पर उस एक व्यक्ति का नाम लिखिए जिसकी टूटन के सामने आपने हार मान ली है, और उस नाम पर हाथ रखकर ज़ोर से कहिए कि यह अधिकार मेरा नहीं, प्रभु का है, और उसे सौंप दीजिए।
प्रश्न
अगर अधिकार सचमुच दिया गया था, तो वह काम क्यों नहीं करता दिखा? मरकुस 9 में यही बारह एक पिता के बेटे से दुष्टात्मा नहीं निकाल पाते, और यीशु को स्वयं हस्तक्षेप करना पड़ता है। दिया गया अधिकार, और फिर भी असफलता। यह हमारे अनुभव से बहुत मेल खाता है: हम प्रार्थना करते हैं, कोई चंगा नहीं होता; हम ईमानदारी से खड़े होते हैं, अंधकार टस से मस नहीं होता। पाठ इसका सफ़ाई-भरा उत्तर नहीं देता। वह केवल इतना कहता है कि अधिकार व्यक्ति की संपत्ति नहीं, बल्कि देनेवाले के साथ बने रहने की बात है; जैसे ही चेला सोचता है कि शक्ति अब उसके भीतर बस गई है, वह खाली हाथ खड़ा रह जाता है। यह उत्तर असफलता का दर्द नहीं मिटाता। पर यह उस दर्द को विश्वास के भीतर रखता है, बाहर नहीं।
श्रोताओं का चित्र
मत्ती जिन यहूदी विश्वासियों के लिए लिख रहे थे, वे आराधनालय से निकाले जा चुके थे या निकाले जाने के कगार पर थे। उनके कानों में "बारह" शब्द राजनीतिक रूप से भी गूँजता था: बारह गोत्रों की बहाली इस्राएल की सबसे गहरी आशा थी। जब वे पढ़ते थे कि यीशु बारह को अशुद्ध आत्माओं पर अधिकार देते हैं, तो वे समझ जाते थे कि यह केवल चमत्कार नहीं, बल्कि एक नई सत्ता की घोषणा है। और "अशुद्ध" शब्द उनके लिए मंदिर की भाषा थी: जो अशुद्ध है वह परमेश्वर के निकट नहीं आ सकता। अब वह अधिकार मंदिर के पुजारियों के पास नहीं, बल्कि गलील के मछुआरों के पास है, जिनमें एक चुंगी लेनेवाला भी है। यह उनके लिए सांत्वना थी, और उनके विरोधियों के लिए खुली चुनौती।
अंतर्पाठ
तीन जगहें यह पद खोलती हैं। पहली, गिनती 11, जहाँ मूसा की आत्मा बाँटी जाती है और मूसा कहते हैं कि काश सब लोग भविष्यद्वक्ता होते; मत्ती 10 उस इच्छा का उत्तर है। दूसरी, 2 राजा 2, जहाँ एलीशा एलिय्याह से दुगुनी आत्मा माँगता है और चादर उठाकर वही काम करता है जो उसके गुरु ने किया था; शिष्य गुरु के काम को आगे चलाता है, यही नमूना यहाँ दोहराया गया है, पर अब बारह बार। तीसरी, प्रेरितों 3, जहाँ पतरस लंगड़े से कहता है कि चाँदी और सोना उसके पास नहीं, पर जो है वह देता है। वह दृश्य मत्ती 10:1 की सीधी संतान है, और पद 9 का "न सोना, न रूपा" भी वहाँ पूरा होता दिखता है। और तनाव भी देखिए: यहाँ अधिकार बारह को मिलता है, पर लूका में बहत्तर भेजे जाते हैं, और पिन्तेकुस्त के बाद आत्मा सब पर उतरती है। दायरा फैलता ही जाता है।
चिंतन
आप किस काम में इस भरोसे से चल रहे हैं कि शक्ति आपकी अपनी है, और वहाँ "सेंत-मेंत पाया है" कहना क्या बदल देगा?
जिस असफल प्रार्थना की याद आपको अब भी चुभती है, उसे आप देनेवाले के हाथ में लौटाने के बजाय अपने कंधे पर क्यों उठाए हुए हैं?
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Matthew 10:1 के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
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मत्ती 10:1 का क्या अर्थ है?
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मत्ती 10:1 आज भी कैसे प्रासंगिक है?
Matthew 10 पर समुदाय क्या साझा करता है
इस अंश पर पाठकों और संपादकीय टीम से अंतर्दृष्टि, प्रार्थनाएँ और धन्यवाद।
यीशु ने चेलों को बिना थैली, बिना रोटी भेजा, पर खाली हाथ नहीं। उनके पास देने को आशीष थी: "और जब घर में प्रवेश करो तो उस घर को आशीष देना।" जिस घर में वे मेहमान बनकर जा रहे थे, उसी घर को वे पहले कुछ देते हैं। सोचो, आज तुम जिस दरवाज़े से भीतर जाओगे, वहाँ तुम्हारा पहला शब्द क्या होगा? माँग या आशीष?
अपने बटुओं में न तो सोना, और न चाँदी, और न ताँबा रखना।" यीशु अपने शिष्यों को खाली जेब के साथ भेजते हैं। कोई बचत नहीं, कोई योजना B नहीं। सिर्फ़ उस पिता पर भरोसा जो भेज रहा है। सोचो, तुम्हारी सुरक्षा कहाँ टिकी है? जिस दिन हाथ खाली होंगे, उसी दिन पता चलेगा कि परमेश्वर कितना भरा हुआ है।
यीशु अपने चेलों को खाली हाथ भेजते हैं: "न मार्ग के लिये झोली, न दो कुर्ते, न जूते, न लाठी लो, क्योंकि मजदूर को अपना भोजन मिलना चाहिए।" कोई सुरक्षा नहीं, सिर्फ़ भरोसा। और ध्यान दे, प्रभु ने यह नहीं कहा कि भूखे रहोगे। उसने कहा, तुम्हारी रोटी मेरी ज़िम्मेदारी है। तेरी झोली में जो जमा है, वह विश्वास है या डर?
यीशु ने यह बात तब कही जब वे अपने चेलों को भेड़ियों के बीच भेजे जा रहे थे। यानी "मान लेना" कोई आसान बात नहीं थी, उसकी कीमत थी। "इसलिए जो कोई मनुष्यों के सामने मुझे मान लेगा उसे मैं भी अपने स्वर्गीय पिता के सामने मान लूँगा।" सोचो, जिस जगह तुम चुप रह जाते हो, वहीं वह तुम्हारे नाम को पिता के सामने बोलने को तैयार खड़ा है।
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