मत्ती 4
पाठ
पवित्र आत्मा यीशु को जंगल में ले जाते हैं, और वहाँ चालीस दिन के उपवास के बाद शैतान तीन बार उनकी परीक्षा लेता है: रोटी, मन्दिर का कंगूरा, और संसार के सारे राज्य। तीनों बार उत्तर व्यवस्थाविवरण से आता है, और शैतान चला जाता है। इसके बाद यूहन्ना की गिरफ्तारी की खबर सुनकर यीशु गलील जाते हैं, कफरनहूम में बसते हैं, "मन फिराओ" का प्रचार आरम्भ करते हैं, चार मछुओं को बुलाते हैं, और बीमारों को चंगा करते हुए पूरे क्षेत्र में राज्य का सुसमाचार फैलाते हैं।
मर्म
यह अध्याय एक ही प्रश्न के चारों ओर घूमता है: परमेश्वर का पुत्र होने का अर्थ क्या है? स्वर्ग से आवाज़ आ चुकी है, और अब शैतान उसी पहचान पर हाथ रखता है, "यदि तू परमेश्वर का पुत्र है।" ध्यान दें कि परीक्षा यह नहीं है कि यीशु पाप करें, बल्कि यह कि वे अपने पुत्रत्व को अपने लिए इस्तेमाल करें: भूख मिटाने के लिए, सुरक्षा साबित करने के लिए, सत्ता पाने के लिए। और यहीं मसीह का सारा उद्धार-कार्य तय होता है। जो पुत्र अपने विशेषाधिकार को पकड़ लेता, वह क्रूस तक नहीं पहुँचता। अनुग्रह इसलिए संभव हुआ कि परमेश्वर के पुत्र ने अपनी शक्ति को अपने पक्ष में मोड़ने से इन्कार किया। पवित्रता यहाँ कोई नियम-पालन नहीं, बल्कि पिता पर अटूट भरोसा है, भूखे पेट के साथ भी।
सूत्र
चालीस दिन का जंगल संयोग नहीं है। इस्राएल चालीस वर्ष जंगल में रहा, वहीं भूख, वहीं मन्ना, वहीं परमेश्वर को परखने की ज़िद। और यीशु तीनों उत्तर उसी पुस्तक से देते हैं जो उन चालीस वर्षों की व्याख्या करती है। जहाँ पहला पुत्र, इस्राएल, विफल हुआ, वहाँ यह पुत्र खड़ा रहता है। वाचा का इतिहास यहाँ दोहराया नहीं जाता, वह चंगा किया जाता है। इसीलिए भविष्यद्वक्ता का वचन जबूलून और नप्ताली पर आता है: जो क्षेत्र सबसे पहले अश्शूर के हाथों उजड़े थे, जो "अन्यजातियों का गलील" कहलाने लगे थे, वहीं ज्योति पहले चमकती है। परमेश्वर अपनी कहानी उस किनारे से फिर शुरू करते हैं जहाँ न्याय सबसे पहले गिरा था। यह अनुग्रह का ढंग है।
दर्पण
शैतान का पहला वाक्य आपके भीतर भी बोलता है: यदि तू सचमुच परमेश्वर की सन्तान है, तो यह नौकरी क्यों गई, यह रिपोर्ट क्यों आई, यह घर क्यों टूटा? और उसके बाद सुझाव आता है, थोड़ा हाथ-पैर मारो, कुछ पत्थर रोटी बना लो। आप इसे रोज़ करते हैं जब बजट का हिसाब बैठाने के लिए ईमानदारी में हल्की छूट लेते हैं, जब बच्चों के भविष्य के नाम पर काम को परमेश्वर की जगह बिठा देते हैं, जब अपने अधिकार को सिद्ध करने के लिए किसी को नीचा दिखाते हैं। तीसरी परीक्षा सबसे सभ्य दिखती है: प्रभाव, पद, नाम, सब मिल जाएगा, केवल एक छोटा सा प्रणाम। यीशु का उत्तर छोटा और निर्दय है, "हे शैतान दूर हो जा।" कुछ सौदों पर बहस नहीं होती।
एक बारीकी
पद 11 पर रुकिए: "तब शैतान उसके पास से चला गया, और स्वर्गदूत आकर उसकी सेवा करने लगे।" वही स्वर्गदूत जिन्हें शैतान ने पद 6 में उद्धृत किया था, अब आते हैं, परन्तु ठीक तब जब यीशु ने उन्हें बुलाने से इन्कार कर दिया। जो सुरक्षा मन्दिर के कंगूरे से छलाँग लगाकर छीनी नहीं गई, वह चालीस दिन के अंत में दी गई। भजन 91 का वचन झूठा नहीं था, पर उसे शर्त बनाना ही अविश्वास था। परमेश्वर की देखभाल वादा है, माँग नहीं। यह अंतर बारीक है और जीवन भर काम आता है: विश्वास प्रतिज्ञा पर टिकता है, वह प्रतिज्ञा को परखने के लिए ख़तरे नहीं गढ़ता।
मुख्य व्यक्ति
इस अध्याय का यीशु आश्चर्यजनक रूप से अकेला और आश्चर्यजनक रूप से शान्त है। वे भूख को छिपाते नहीं, पाठ साफ़ कहता है "तब उसे भूख लगी।" वे तर्क में उलझते नहीं, बस लिखे हुए वचन पर पैर जमाते हैं, जैसे कोई आदमी तेज़ धारा में पत्थर पर खड़ा हो। और जंगल से निकलकर वे किसी मन्दिर या राजसभा में नहीं जाते, बल्कि झील के किनारे मछुओं के पास जाते हैं, वहाँ जहाँ जाल की गंध है और मेहनत का पसीना। उनका पहला शब्द "मन फिराओ" है, माँग है, परन्तु उसके पीछे कारण है: "स्वर्ग का राज्य निकट आया है।" पहले राज्य आता है, फिर पश्चाताप संभव होता है। यही अनुग्रह का व्याकरण है, और यही उनका स्वभाव।
सवाल
एक बात खटकती है: पवित्र आत्मा ही यीशु को परीक्षा में ले जाते हैं। यानी यह मुक़ाबला परमेश्वर की योजना के बाहर नहीं, उसके भीतर है। तो क्या परमेश्वर हमें भी उस जगह ले जाते हैं जहाँ हम गिर सकते हैं? पाठ इसका सुखद उत्तर नहीं देता। वह केवल दिखाता है कि जंगल परमेश्वर के त्याग का चिह्न नहीं है; पिता की आवाज़ पहले ही सुनाई दे चुकी थी, और उसके बाद भी भूख आई। यह रहस्य पूरी तरह नहीं खुलता। पर एक बात निश्चित है: उस जंगल में एक व्यक्ति हमसे पहले गया और खड़ा रहा। जब आपकी परीक्षा आती है, आप अनजानी भूमि पर नहीं होते। कोई वहाँ रह चुका है, और वह अब भी वहीं मिलता है।
चिंतन
आपके जीवन में वह कौन सी "छोटी सी प्रणाम" है जिसे आप सुविधा, सुरक्षा या सम्मान के बदले करने को तैयार हो जाते हैं?
परमेश्वर की प्रतिज्ञाओं पर भरोसा करने और उन्हें परखने के लिए ख़तरे गढ़ने में, आप अपने भीतर यह अंतर कैसे पहचानते हैं?
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इस अंश पर पाठकों और संपादकीय टीम से अंतर्दृष्टि, प्रार्थनाएँ और धन्यवाद।
पिता, कई बार परीक्षा पवित्र जगहों में भी आ खड़ी होती है, ऊँचाई पर ले जाकर मुझसे कहती है कि खुद को साबित करो। मुझे थामे रखिए, ताकि मैं आपको आज़माने की जगह आप पर भरोसा करूँ और चुपचाप आपके वचन पर टिका रहूँ।
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