मत्ती 5:32
यह पाठ
यीशु उस समाज में खड़े होकर बोल रहे हैं जहाँ त्यागपत्र लिखना पुरुष का कानूनी अधिकार था, और वे उस अधिकार पर उँगली रख देते हैं। वे कहते हैं: "जो कोई अपनी पत्नी को व्यभिचार के सिवा किसी और कारण से तलाक दे, तो वह उससे व्यभिचार करवाता है; और जो कोई उस त्यागी हुई से विवाह करे, वह व्यभिचार करता है।" यानी जिस कागज़ को पुरुष अपनी पाक-साफ़ी का प्रमाण समझता था, वही कागज़ उसे दोषी ठहराता है। छोड़ी गई स्त्री के साथ जो होता है, उसका बोझ यीशु उस पर नहीं डालते जो छोड़ी गई, बल्कि उस पर जिसने छोड़ा। पिछली आयत में जिस व्यवस्था का हवाला दिया गया था, "जो कोई अपनी पत्नी को त्याग दे, तो उसे त्यागपत्र दे", उसी की आड़ यहाँ हट जाती है।
मर्म
यहाँ लड़ाई तलाक के नियमों की नहीं, अधिकार की परिभाषा की है। मूसा की व्यवस्था ने त्यागपत्र की छूट इसलिए दी थी कि टूटन के बीच स्त्री पूरी तरह असुरक्षित न रह जाए; पर मनुष्य ने उस सुरक्षा-जाल को अपनी सुविधा का दरवाज़ा बना लिया। यीशु दिखाते हैं कि कानूनी रूप से निर्दोष रहते हुए भी आदमी किसी का जीवन तोड़ सकता है। परमेश्वर का राज्य केवल हमारे कामों की वैधता नहीं पूछता, वह पूछता है कि हमारे कामों ने दूसरे के साथ क्या किया। यही बात इस पूरे पहाड़ी उपदेश की धड़कन है: "यदि तुम्हारी धार्मिकता शास्त्रियों और फरीसियों की धार्मिकता से बढ़कर न हो"। बढ़कर का अर्थ अधिक कठोर नियम नहीं, बल्कि वह हृदय है जो वाचा को निभाता है, तोड़ने का बहाना नहीं खोजता। और ऐसा हृदय मनुष्य अपने बल से नहीं गढ़ सकता; यही इस आयत की असली चुभन है।
जोड़ने वाला धागा
परमेश्वर ने अपने और अपनी प्रजा के रिश्ते को बार-बार विवाह की भाषा में कहा है, और यहीं यह आयत बड़ी हो जाती है। यिर्मयाह 3 में परमेश्वर स्वयं कहते हैं कि उन्होंने विश्वासघाती इस्राएल को त्यागपत्र दे दिया, और फिर भी वे उसे लौट आने को पुकारते हैं। कानूनी आधार पूरा था, अधिकार पूरा था, पर परमेश्वर ने अधिकार का इस्तेमाल अंत तक नहीं किया। यीशु जो यहाँ माँग रहे हैं, वह वही है जो वे स्वयं करने आए हैं: उस रिश्ते को न छोड़ना जिसे छोड़ने का हर बहाना मौजूद है। इसीलिए वे कह सके, "लोप करने नहीं, परन्तु पूरा करने आया हूँ।" व्यवस्था की माँग को उन्होंने नियम कड़े करके नहीं, बल्कि दुल्हन को कीमत चुकाकर अपनाकर पूरा किया। जो छोड़ी गई थी, मसीह ने उसी से विवाह किया।
दर्पण
यह आयत सबसे पहले उस आदमी को छूती है जो खुद को साफ़ मानता है क्योंकि उसने "सब कुछ नियम से" किया। तलाक के कागज़ पर हस्ताक्षर, कंपनी से निकाले जाने का विधिवत पत्र, बूढ़े माता-पिता के लिए भेजी गई रकम जो मुलाकात की जगह ले लेती है, वह रिश्ता जिसे आपने तोड़ा नहीं, बस धीरे-धीरे जवाब देना बंद कर दिया। हर बार हम पूछते हैं, "क्या मुझे हक़ था?" यीशु पूछते हैं, "उसका क्या हुआ?" और दूसरी तरफ़, यह आयत उन्हें भी देखती है जिन्हें छोड़ा गया है, और उन पर से दोष हटाती है, जबकि कलीसिया अक्सर उन्हीं पर फुसफुसाती है। आज दस मिनट निकालकर उस एक व्यक्ति को फ़ोन या संदेश कीजिए जिसे आपके जीवन से किसी ने छोड़ दिया है, और सिर्फ़ इतना पूछिए कि वह कैसा है।
एक बारीकी
ध्यान दीजिए, यीशु यह नहीं कहते कि वह स्त्री व्यभिचार करती है। वे कहते हैं, "वह उससे व्यभिचार करवाता है।" यह प्रेरक क्रिया है, कर्ता कोई और है। यूनानी में यहाँ कर्मवाच्य रूप है, यानी स्त्री के साथ कुछ किया जाता है। उस समाज में छोड़ी गई स्त्री के पास जीने के लिए दूसरा विवाह लगभग एकमात्र रास्ता था; और यीशु कहते हैं कि उस मजबूरी का हिसाब उस स्त्री से नहीं, उस पुरुष से लिया जाएगा जिसने उसे वहाँ धकेला। यह वाक्य पाप की परिभाषा को हमारे इरादों से आगे खींचकर हमारे फैसलों के परिणामों तक ले जाता है। हम अक्सर सोचते हैं कि जिम्मेदारी वहीं खत्म हो जाती है जहाँ हमारा हस्ताक्षर खत्म होता है। यीशु कहते हैं, नहीं, वह वहाँ से शुरू होती है।
मुख्य पात्र
"परन्तु मैं तुम से यह कहता हूँ।" इस अध्याय में यह वाक्य छह बार आता है, और हर बार वह मूसा की व्यवस्था को रद्द नहीं करता, उसकी तह खोल देता है। कोई भविष्यद्वक्ता ऐसा नहीं बोलता था; वे कहते थे, "परमेश्वर यों कहते हैं।" यहाँ बोलने वाला वही है जिसने वह व्यवस्था दी थी। और यह अधिकार ठंडा नहीं है। जो व्यक्ति छोड़ी गई स्त्री की मजबूरी तक देखता है, वह कानून का विशेषज्ञ नहीं, चरवाहा है। यीशु उन लोगों के पक्ष में खड़े होते हैं जिनके पास बोलने का कोई कानूनी मंच नहीं था, और यही उनका पूरा जीवन है: ताकतवर के हक़ पर सवाल, कमज़ोर के बोझ पर करुणा, और अंत में स्वयं वह बोझ अपने ऊपर उठा लेना।
पृष्ठभूमि
यह गलील की पहाड़ी है, और सुनने वाले साधारण यहूदी हैं जो व्यवस्थाविवरण 24 को जानते थे। उस आयत में लिखा था कि पुरुष अपनी पत्नी में "कोई अनुचित बात" पाए तो त्यागपत्र देकर उसे विदा करे। यीशु के दिनों में रब्बियों के बीच तीखी बहस थी कि "अनुचित बात" का अर्थ क्या है: कुछ इसे केवल गंभीर यौन पाप मानते थे, कुछ इतना ढीला कि खाना जला देना भी काफ़ी था। अधिकार पूरी तरह पुरुष के हाथ में था; स्त्री तलाक नहीं दे सकती थी, और तलाक के बाद उसके पास न आमदनी थी, न सामाजिक जगह। वह अपने पिता के घर लौटती, या भूखी रहती, या किसी और की शरण लेती। इस सामाजिक गणित को जाने बिना यह आयत केवल कठोर नियम लगती है; इसे जानकर यह ढाल बन जाती है।
मनन के प्रश्न
किस रिश्ते में मैं अपने आप को "कानूनी रूप से सही" कहकर शांत कर रहा हूँ, जबकि दूसरे पर पड़े असर को देखने से बच रहा हूँ?
यदि मसीह ने अपनी दुल्हन को छोड़ने का हर हक़ रखते हुए भी नहीं छोड़ा, तो मेरे उस रिश्ते में इसका क्या अर्थ है जिसे मैं सबसे पहले छोड़ना चाहता हूँ?
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Matthew 5:32 के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
इस बाइबल अंश के बारे में सामान्य प्रश्नों के त्वरित उत्तर।
मत्ती 5:32 का क्या अर्थ है?
मत्ती 5:32 किस विषय में है?
मत्ती 5:32 का ऐतिहासिक संदर्भ क्या है?
मत्ती 5:32 हमें परमेश्वर के स्वभाव के बारे में क्या सिखाता है?
मत्ती 5:32 आज भी कैसे प्रासंगिक है?
Matthew 5 पर समुदाय क्या साझा करता है
इस अंश पर पाठकों और संपादकीय टीम से अंतर्दृष्टि, प्रार्थनाएँ और धन्यवाद।
What strikes me most about the Sermon on the Mount is not the content but the listeners. No rabbis, no scribes, just fishermen and beggars and the sick. Jesus gave his deepest teaching to people nobody took seriously. That comforts me whenever I feel too small for the Kingdom again.
जो कोई तुझसे माँगे, उसे दे; और जो तुझसे उधार लेना चाहे, उससे मुँह न मोड़।"
ध्यान दे, यीशु यह नहीं कहते कि कितना दे। वे हाथ की नहीं, चेहरे की बात करते हैं। क्योंकि हम अक्सर पैसे से पहले अपनी नज़रें छिपा लेते हैं, सुनने से पहले ही भीतर से मुकर जाते हैं।
आज किसी की ज़रूरत तुझ तक आए, तो पहले उसकी आँखों में देख। देना उसके बाद आसान लगेगा।
यीशु ने "बाईं" नहीं, "दाहिनी आँख" कहा। यानी वह जो सबसे कीमती है, जिस पर तू सबसे ज़्यादा भरोसा करता है। पाप हमें कभी बेकार चीज़ों से नहीं, अपनी प्रिय चीज़ों से फँसाता है। "उसे निकालकर अपने पास से फेंक दे।" सोच, आज तेरे हाथ में वह क्या है जिसे तू छोड़ना नहीं चाहता, पर जो तुझे धीरे-धीरे परमेश्वर से दूर खींच रहा है?
यीशु के समय पत्नी को त्यागपत्र देना आसान था, और छोड़ी गई स्त्री के पास न सहारा था, न सम्मान। इसलिए यीशु कहते हैं, "जो कोई अपनी पत्नी को व्यभिचार के सिवा किसी और कारण से छोड़ दे, तो वह उससे व्यभिचार करवाता है।" दोष उस पर डाला गया जिसने छोड़ा। क्या तेरे रिश्तों में भी कोई है जिसे तूने सुविधा से छोड़ दिया, और परमेश्वर उसका दर्द अब भी देख रहा है?
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