मत्ती 5:2
पाठ
पहाड़ पर बैठे हुए यीशु, चारों ओर सिमटे हुए चेले, और फिर एक छोटा सा वाक्य जो पूरे उपदेश का दरवाज़ा खोल देता है: "और वह अपना मुँह खोलकर उन्हें यह उपदेश देने लगा।" मत्ती हमें बताता है कि इसके बाद जो आता है वह कोई आकस्मिक टिप्पणी नहीं, कोई भीड़ को शान्त करने वाला भाषण नहीं। यह सोचा-समझा, ठहरा हुआ, अधिकार के साथ बोला गया शिक्षण है। एक शिक्षक बैठता है, अपने शिष्यों को पास बुलाता है, और तब बोलना आरम्भ करता है। वचन की इस एक पंक्ति में गति रुक जाती है और आवाज़ शुरू होती है, और वह आवाज़ पूरे पहाड़ी उपदेश को अपने कंधों पर उठाती है।
मर्म
"अपना मुँह खोलकर" कोई शब्दों की भरती नहीं है। यह पुराने नियम की वह भाषा है जिससे भविष्यद्वक्ता और बुद्धिमान अपने सबसे गम्भीर वचन आरम्भ करते थे। परन्तु यहाँ अन्तर यह है कि जो मुँह खुलता है, वह किसी सन्देशवाहक का नहीं। सीनै पर परमेश्वर ने आग, धुएँ और काँपते पर्वत के बीच से बात की थी, और लोग डरकर पीछे हट गए थे। यहाँ वही परमेश्वर एक मनुष्य के होंठों से बोलते हैं, बैठे हुए, पास से, बिना गरजे। यही सुसमाचार का केन्द्र है: परमेश्वर अब दूरी से नहीं, देह में आकर बोलते हैं। और वे पहले माँग नहीं रखते, पहले आशीष देते हैं, "धन्य हैं वे, जो मन के दीन हैं।" अनुग्रह पहले बोलता है, आज्ञा बाद में आती है।
सूत्र
मत्ती की पूरी पुस्तक इस बात पर टिकी है कि यीशु में परमेश्वर की पुरानी प्रतिज्ञाएँ शरीर पहनकर आ गई हैं। इसलिए यह ब्योरा कि वह पहाड़ पर चढ़े, बैठे और मुँह खोला, किसी संवाददाता की सजावट नहीं है। मूसा पहाड़ पर चढ़ा था और नीचे उतरकर परमेश्वर के वचन लाया था; यीशु पहाड़ पर चढ़ते हैं और वहीं से बोलते हैं, क्योंकि वचन उनके पास से आता है, उन तक पहुँचाया नहीं गया। और वे स्वयं इसे खोलकर कह देते हैं: "लोप करने नहीं, परन्तु पूरा करने आया हूँ।" यहाँ जो मुँह खुलता है, वह व्यवस्था का प्रतिद्वन्द्वी नहीं, उसका लक्ष्य है। उद्धार की पूरी कहानी में परमेश्वर बार-बार बोले हैं, भविष्यद्वक्ताओं के द्वारा, टुकड़ों में। इस क्षण में वह बोलना एक चेहरा पा लेता है।
दर्पण
हम सब सुनने से ज़्यादा बोलने में सहज हैं। घर में जब पत्नी या बेटा कुछ कहना चाहता है, हमारा उत्तर उनके वाक्य के बीच में ही तैयार होता है। दफ़्तर में हम बैठक में इसलिए जाते हैं कि हमारी बात दर्ज हो जाए, न कि इसलिए कि कोई हमें बदल दे। और परमेश्वर के साथ भी वही आदत चलती है: हम प्रार्थना में अपनी सूची पढ़ते हैं और आमीन कहकर उठ जाते हैं, बिना यह पूछे कि क्या वे कुछ कहना चाहते थे। यह वचन उस आदत पर उँगली रखता है। यहाँ चेले बोलते नहीं; वे पास आते हैं और चुप रहते हैं। शिष्यता की पहली मुद्रा वही है। आज ही, दस मिनट निकालकर मत्ती 5 के आरम्भ के बारह वचन धीरे-धीरे ऊँची आवाज़ में पढ़िए और अन्त में बिना कोई माँग रखे केवल इतना कहिए: "प्रभु, मैं सुन रहा हूँ।"
बारीकी
ध्यान दीजिए कि वह किसे सिखाते हैं: "उन्हें", यानी उन चेलों को जो अभी-अभी पास आए हैं, भीड़ को नहीं। भीड़ पहाड़ की ढलान पर मौजूद है, वह सुन सकती है, पर सम्बोधन उसका नहीं है। यह छोटा सा सर्वनाम पूरे पहाड़ी उपदेश को पढ़ने का तरीक़ा बदल देता है। यह आम नागरिकों के लिए बनाया गया आदर्श नीति-संहिता नहीं है, जिसे कोई भी अच्छा आदमी अपनी शक्ति से जी ले। यह उन लोगों का जीवन-ढंग है जो पहले बुलाए जा चुके हैं, जिन्होंने जाल छोड़ दिए हैं, जो इस राजा के पीछे चल पड़े हैं। पहले सम्बन्ध, फिर आचरण। जो इस क्रम को उलट देता है, वह पहाड़ी उपदेश से या तो घमण्ड कमाता है या निराशा।
प्रश्न
यदि अनुग्रह पहले बोलता है, तो यही मुँह उपदेश के अन्त में यह कैसे कह देता है, "इसलिए चाहिये कि तुम सिद्ध बनो, जैसा तुम्हारा स्वर्गीय पिता सिद्ध है"? यह वाक्य किसी को राहत नहीं देता। और इसे नरम करने की हर कोशिश बेईमान है; यीशु ने "कोशिश करो" नहीं कहा। ईमानदार उत्तर यह है कि आशीष और माँग यहाँ एक ही आवाज़ से आती हैं, और उस आवाज़ को हम अलग नहीं कर सकते। जो सिद्धता वे माँगते हैं, वह हमारे भीतर से नहीं निकलती; पर वे उसे कम भी नहीं करते। यह तनाव क्रूस तक बना रहता है, और शायद हमारी मृत्यु तक भी। हम इसे सुलझा नहीं सकते, केवल उसी के सामने खड़े रह सकते हैं जिसने यह कहा और जिसने इसे जिया।
पृष्ठभूमि
पहली सदी का गलील रोमी शासन के नीचे था: भारी कर, बेगार, और यह दैनिक अनुभव कि तुम्हारे जीवन का नियन्त्रण किसी और के हाथ में है। यीशु के आसपास जुटी भीड़ बीमारों, कर्ज़दारों और मेहनतकशों से बनी थी, ऐसे लोग जो किसी भी उद्धारक की बात सुनने को तैयार थे, बशर्ते वह रोम को हटा दे। उस माहौल में एक शिक्षक का बैठ जाना एक निश्चित संकेत था: रब्बी खड़े होकर पढ़ते थे, पर सिखाने के लिए बैठते थे, और बैठा हुआ शिक्षक अधिकार से बोलता था। चेले पैरों के पास ज़मीन पर बैठते थे। तो चित्र यह है: एक राजा अपने सिंहासन जैसे आसन पर, हथियार के बिना, सेना के बिना, केवल खुला हुआ मुँह लिए। उपदेश के अन्त में भीड़ ठीक इसी अधिकार पर चकित रह जाती है।
चिंतन
जब आप बाइबल खोलते हैं, तो क्या आप सचमुच किसी के बोलने की प्रतीक्षा करते हैं, या केवल अपनी बनी हुई सोच की पुष्टि खोजते हैं?
पहाड़ी उपदेश की माँगें आपको किस जगह पर तोड़ती हैं, और क्या आप उस टूटन को यीशु के सामने ले जाने के बजाय उसे छिपाने में लगे हैं?
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Matthew 5:2 के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
इस बाइबल अंश के बारे में सामान्य प्रश्नों के त्वरित उत्तर।
मत्ती 5:2 का क्या अर्थ है?
मत्ती 5:2 किस विषय में है?
मत्ती 5:2 का ऐतिहासिक संदर्भ क्या है?
मत्ती 5:2 हमें परमेश्वर के स्वभाव के बारे में क्या सिखाता है?
मत्ती 5:2 आज भी कैसे प्रासंगिक है?
Matthew 5 पर समुदाय क्या साझा करता है
इस अंश पर पाठकों और संपादकीय टीम से अंतर्दृष्टि, प्रार्थनाएँ और धन्यवाद।
What strikes me most about the Sermon on the Mount is not the content but the listeners. No rabbis, no scribes, just fishermen and beggars and the sick. Jesus gave his deepest teaching to people nobody took seriously. That comforts me whenever I feel too small for the Kingdom again.
जो कोई तुझसे माँगे, उसे दे; और जो तुझसे उधार लेना चाहे, उससे मुँह न मोड़।"
ध्यान दे, यीशु यह नहीं कहते कि कितना दे। वे हाथ की नहीं, चेहरे की बात करते हैं। क्योंकि हम अक्सर पैसे से पहले अपनी नज़रें छिपा लेते हैं, सुनने से पहले ही भीतर से मुकर जाते हैं।
आज किसी की ज़रूरत तुझ तक आए, तो पहले उसकी आँखों में देख। देना उसके बाद आसान लगेगा।
यीशु ने "बाईं" नहीं, "दाहिनी आँख" कहा। यानी वह जो सबसे कीमती है, जिस पर तू सबसे ज़्यादा भरोसा करता है। पाप हमें कभी बेकार चीज़ों से नहीं, अपनी प्रिय चीज़ों से फँसाता है। "उसे निकालकर अपने पास से फेंक दे।" सोच, आज तेरे हाथ में वह क्या है जिसे तू छोड़ना नहीं चाहता, पर जो तुझे धीरे-धीरे परमेश्वर से दूर खींच रहा है?
यीशु के समय पत्नी को त्यागपत्र देना आसान था, और छोड़ी गई स्त्री के पास न सहारा था, न सम्मान। इसलिए यीशु कहते हैं, "जो कोई अपनी पत्नी को व्यभिचार के सिवा किसी और कारण से छोड़ दे, तो वह उससे व्यभिचार करवाता है।" दोष उस पर डाला गया जिसने छोड़ा। क्या तेरे रिश्तों में भी कोई है जिसे तूने सुविधा से छोड़ दिया, और परमेश्वर उसका दर्द अब भी देख रहा है?
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