मत्ती 6:31
पाठ
यीशु पक्षियों और सोसन के फूलों की ओर इशारा करने के बाद एक निष्कर्ष खींचते हैं: "इसलिए तुम चिन्ता करके यह न कहना, कि हम क्या खाएँगे, या क्या पीएँगे, या क्या पहनेंगे?" ध्यान दीजिए, यह केवल भीतर की बेचैनी पर रोक नहीं है, बल्कि उस वाक्य पर रोक है जो बेचैनी से निकलता है। चिन्ता यहाँ बोलती है, वह प्रश्न बनकर होंठों तक आती है, और यीशु उसी बोले हुए प्रश्न को थाम लेते हैं। खाना, पानी, कपड़ा: जीवन की तीन सबसे बुनियादी ज़रूरतें, न कि विलासिता। और ठीक इन्हीं तीनों के बारे में प्रभु कहते हैं कि इन्हें अपने जीवन का केंद्रीय प्रश्न मत बनने दो।
केंद्रीय सत्य
यह पद परमेश्वर के बारे में एक दावा है, इससे पहले कि यह हमारे बारे में एक आज्ञा हो। चिन्ता का असली प्रश्न "मेरे पास क्या है" नहीं, बल्कि "मेरे ऊपर कौन है" है। सृष्टि के आरम्भ में परमेश्वर ने मनुष्य को एक ऐसे संसार में रखा जो पहले से ही भोजन से भरा था; मनुष्य ने कमाई से पहले उपहार पाया। वाचा के परमेश्वर ने इस्राएल को जंगल में प्रतिदिन मन्ना दिया, इतना कि संग्रह असम्भव हो जाए और भरोसा अनिवार्य। यीशु उसी परमेश्वर को "तुम्हारा स्वर्गीय पिता" कहकर पुकारते हैं, और अगला ही पद जोड़ता है कि वे "जानता है, कि तुम्हें ये सब वस्तुएँ चाहिए।" इसलिए चिन्ता केवल कमज़ोरी नहीं, वह एक छिपा हुआ धर्मशास्त्र है: यह मान लेना कि ब्रह्मांड एक अनाथालय है और मुझे स्वयं अपना पालनहार बनना है। अनुग्रह ठीक इसी झूठ को तोड़ता है।
जोड़ने वाला सूत्र
मन्ना से लेकर अंतिम भोज तक, बाइबल की कहानी में रोटी कभी केवल रोटी नहीं रहती। इस्राएल को जंगल में सिखाया गया कि जीवन उसकी अपनी फ़सल पर नहीं, परमेश्वर के वचन पर टिका है। यीशु वही पाठ पहाड़ पर दोहराते हैं, पर अब अपने ही व्यक्तित्व के साथ: जो यह कह रहे हैं, वे स्वयं जंगल में भूखे रहे और पत्थर को रोटी बनाने से इनकार किया। वे ही हैं जिन्होंने सिखाया, "हमारी दिन भर की रोटी आज हमें दे", और जिन्होंने अंत में अपनी देह को रोटी की तरह तोड़ा। इसलिए यह पद किसी आशावादी जीवन-दर्शन का टुकड़ा नहीं, बल्कि राज्य की घोषणा है: वह राजा आ गया है जो अपनी प्रजा का पेट भरना अपनी ज़िम्मेदारी मानता है, और जो स्वयं हमारी जगह भूख सहने को तैयार हुआ।
दर्पण
चिन्ता का वाक्य आज शायद इस रूप में बोला जाता है: "अगर नौकरी चली गई तो?" "बच्चों की फ़ीस कहाँ से आएगी?" "इस उम्र में शरीर साथ नहीं देगा तो कौन देखेगा?" यीशु इन प्रश्नों को मूर्ख नहीं कहते, वे उन्हें जीवन का केंद्र बनने से रोकते हैं। ध्यान दीजिए कि यहाँ सबसे गहरी चोट हमारे अहंकार पर पड़ती है: चिन्ता अक्सर ज़िम्मेदारी का मुखौटा पहनती है, और हम भीतर से ख़ुद को दूरदर्शी समझते हैं जबकि असल में हम पिता की जगह लेने की कोशिश कर रहे होते हैं। पद 30 में प्रभु इसका नाम बिना झिझक रखते हैं: "हे अल्पविश्वासियों"। यह डाँट है, पर ठंडी नहीं; यह उस पिता की आवाज़ है जो जानता है।
आज ही करने के लिए: वह एक वाक्य जो आपके मन में बार-बार घूमता है, काग़ज़ पर लिखिए, फिर उसे ज़ोर से पढ़कर उसके नीचे लिखिए, "मेरा स्वर्गीय पिता जानता है", और वह काग़ज़ अपनी जेब या बटुए में रख लीजिए।
प्रसंग
यीशु गलील की एक पहाड़ी पर बोल रहे हैं, ऐसे लोगों से जो ज़्यादातर किसान, मछुआरे और दिहाड़ी मज़दूर थे। रोमी कर, मंदिर का चंदा और ज़मींदारों का हिस्सा चुकाने के बाद कई परिवारों के पास सचमुच इतना ही बचता था कि आज का दिन कट जाए। एक सूखा, एक बीमारी, एक ख़राब फ़सल और पूरा घर कर्ज़ में डूब जाता था। इसलिए "क्या खाएँगे" कोई दार्शनिक प्रश्न नहीं था, वह रसोई का रोज़ का हिसाब था। यह जानना ज़रूरी है, वरना हम सोचेंगे कि यीशु सुरक्षित लोगों को सुख का उपदेश दे रहे हैं। वे असुरक्षित लोगों से कह रहे हैं कि उनकी असुरक्षा का उत्तर और अधिक चिन्ता नहीं, बल्कि एक पिता है जिसकी नज़र उनके खेत से पहले उन पर है।
एक बारीकी
"यह न कहना" पर रुकिए। यीशु विचार पर नहीं, उच्चारण पर हाथ रखते हैं। इसका कारण गहरा है: जो हम बार-बार बोलते हैं, वही हमारे भीतर घर बना लेता है। पद 7 में उन्होंने अन्यजातियों की "बक-बक" की आलोचना की थी, वह प्रार्थना में बोले गए शब्दों की भरमार थी; यहाँ वही चेतावनी उल्टी दिशा से आती है, चिन्ता की बक-बक, जो परमेश्वर से नहीं, अपने आप से की जाती है। रसोई में, गाड़ी में, रात को बिस्तर पर हम यही तीन प्रश्न दोहराते रहते हैं, और हर दोहराव डर को थोड़ा और सच्चा बना देता है। प्रभु कहते हैं: इस वाक्य को अपने मुँह में मत पालो। उसकी जगह पद 9 वाला सम्बोधन रखो, "हे हमारे पिता"।
सुननेवालों का चेहरा
मत्ती का पहला पाठक वर्ग यहूदी पृष्ठभूमि के मसीही थे, जो अब्राहम की सन्तान होने का गर्व और रोमी शासन की बेबसी, दोनों एक साथ जीते थे। उनके कानों में "अन्यजाति इन सब वस्तुओं की खोज में रहते हैं" एक तीखा वाक्य था: वे अपने पड़ोसी बुतपरस्तों को देखते थे जो देवताओं के आगे फ़सल और वर्षा के लिए मन्नतें चढ़ाते थे, और अब उन्हें बताया जा रहा था कि चिन्ता करना भी उसी अविश्वास का रूप है। यानी चिन्ता कोई निर्दोष आदत नहीं, वह एक तरह की मूर्तिपूजा है। साथ ही यह वाक्य उन्हें सम्मान भी देता है: तुम अनाथ नहीं, तुम वाचा के परमेश्वर की सन्तान हो, और सन्तान भीख नहीं माँगती, वह घर में खाती है।
चिंतन के प्रश्न
आपके भीतर कौन-सा चिन्ता का वाक्य सबसे अधिक दोहराया जाता है, और उसे बोलते समय आप परमेश्वर के बारे में चुपचाप क्या मान रहे होते हैं?
यदि "तुम्हारा स्वर्गीय पिता जानता है" सचमुच सच है, तो इस सप्ताह आपका कौन-सा निर्णय अलग दिखेगा?
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Matthew 6:31 के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
इस बाइबल अंश के बारे में सामान्य प्रश्नों के त्वरित उत्तर।
मत्ती 6:31 का क्या अर्थ है?
मत्ती 6:31 किस विषय में है?
मत्ती 6:31 का ऐतिहासिक संदर्भ क्या है?
मत्ती 6:31 हमें परमेश्वर के स्वभाव के बारे में क्या सिखाता है?
मत्ती 6:31 आज भी कैसे प्रासंगिक है?
Matthew 6 पर समुदाय क्या साझा करता है
इस अंश पर पाठकों और संपादकीय टीम से अंतर्दृष्टि, प्रार्थनाएँ और धन्यवाद।
शरीर का दीपक आँख है: इसलिए यदि तेरी आँख निर्मल हो, तो तेरा सारा शरीर भी उजियाला होगा।" यीशु ने यह बात धन की चर्चा के बीच में कही। आँख का निर्मल होना यानी लालच से मुक्त, उदार दृष्टि। जिस चीज़ को तू देर तक देखता है, वही तेरे भीतर उतरती है। आज तेरी आँखें किस पर टिकी हैं?
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