गिनती 11:27
पाठ
एक जवान दौड़ता है। सत्तर पुरनिये तम्बू के चारों ओर खड़े हैं, वहीं बादल उतरा, वहीं आत्मा बाँटा गया, पर खबर तम्बू से नहीं, छावनी से आती है: "एलदाद और मेदाद छावनी में भविष्यद्वाणी कर रहे हैं।" दो आदमी जिनके नाम तो सूची में लिखे थे, पर जो नियत स्थान पर पहुँचे ही नहीं, उन पर भी वही आत्मा उतरा है। जवान को यह इतना असाधारण लगा कि वह चला नहीं, दौड़ा। उसके स्वर में क्या था, घबराहट या उत्साह, पाठ नहीं बताता; वह केवल यह बताता है कि किसी ने इसे मूसा तक पहुँचाने लायक समझा। पूरी घटना एक वाक्य की है, और उसी एक वाक्य से अगली बहस खड़ी होती है।
मूल बात
यह पद इसलिए चुभता है क्योंकि इसमें खबर देने वाला यह मान बैठा है कि आत्मा का काम छावनी में नहीं, तम्बू में होना चाहिए था। पर पद 17 में परमेश्वर ने जगह की नहीं, बोझ उठाने की बात कही थी: "वे इन लोगों का भार तेरे संग उठाए रहेंगे।" परमेश्वर अपने आत्मा को उस व्यवस्था से भी बाँधे नहीं रखते जो उन्होंने स्वयं ठहराई है। यही तनाव मरकुस 9 में फिर उठता है, जब यूहन्ना यीशु से शिकायत करता है कि कोई अनजान व्यक्ति उनके नाम से दुष्टात्माएँ निकाल रहा है, और यीशु उसे रोकने से मना करते हैं। दोनों जगह भक्त शिष्य सीमा खींचना चाहता है, और दोनों जगह गुरु वह सीमा मिटा देता है। अनुग्रह हमारे नक्शे के बाहर भी काम करता है, और यह खबर हमेशा सुकून नहीं, पहले बेचैनी देती है।
सूत्र
इस एक पद से जो बहस खुलती है, उसका अंत मूसा की एक इच्छा में होता है: "भला होता कि यहोवा की सारी प्रजा के लोग भविष्यद्वक्ता होते, और यहोवा अपना आत्मा उन सभी में समवा देता!" यह वाक्य पूरे बाइबल की कहानी में एक खूँटी की तरह गड़ा है। सत्तर पुरनियों पर उतरा आत्मा अस्थायी था, पाठ साफ कहता है कि उन्होंने "फिर और कभी न की"। एलदाद और मेदाद उस अस्थायीपन में एक दरार हैं, एक पूर्वाभास। पिन्तेकुस्त के दिन प्रेरितों के काम 2 में जो होता है, वह मूसा की इस आह का उत्तर है: आत्मा अब सत्तर पर नहीं, सब पर, और जगह तम्बू नहीं, एक साधारण घर। मसीह ने वही किया जो मूसा केवल चाह सके।
दर्पण
आप किसकी सेवा से थोड़ा असहज होते हैं? उस युवक की जगह लेना मुश्किल नहीं। छोटे समूह का वह सदस्य जो आपसे बेहतर प्रार्थना करता है; वह पड़ोसी जो कलीसिया की किसी समिति में नहीं है पर जिसके घर लोग अपना दुख लेकर जाते हैं; वह बहन जिसे किसी ने नियुक्त नहीं किया, फिर भी उसके शब्दों में अधिकार है। हमारे भीतर का जवान दौड़कर शिकायत करना चाहता है, और वह अपनी शिकायत को व्यवस्था की चिंता कहकर सम्मानजनक बना लेता है। पर सच अक्सर सीधा होता है: हमें यह अच्छा नहीं लगता कि परमेश्वर ने हमसे पूछे बिना किसी को दे दिया। आज ही उस एक व्यक्ति का नाम कागज पर लिखिए जिसकी सेवा आपको भीतर से खटकती है, और उसी कागज को हाथ में लेकर ऊँचे स्वर में परमेश्वर को उस व्यक्ति के वरदान के लिए धन्यवाद दीजिए।
मुख्य पात्र
पाठ उस जवान का नाम नहीं देता, और यही उसकी खूबी है। वह कोई विरोधी नहीं, कोई बागी नहीं; वह वफादार है। वह तम्बू के पास था, उसने वहाँ का क्रम देखा, और जब क्रम टूटा तो उसने सोचा कि मूसा को तुरंत जानना चाहिए। उसकी दौड़ में सेवा का भाव है। पर वफादारी का एक रूप ऐसा भी होता है जो अपने नेता की रक्षा उस चीज़ से करना चाहता है जिससे नेता को कोई खतरा ही नहीं। वह मूसा के बारे में अपनी धारणा लेकर दौड़ा, न कि मूसा के मन को जानकर। यही हमारी सामान्य बीमारी है: हम परमेश्वर की ओर से जलते हैं, पर जिस परमेश्वर की ओर से जलते हैं, उसे हमने अपने नाप का बना रखा है।
कठिन प्रश्न
पाठ यह नहीं बताता कि एलदाद और मेदाद तम्बू तक क्यों नहीं गए। उनके नाम लिखे जा चुके थे; बुलावा उन्हें भी था। क्या वे अशुद्ध थे, बीमार थे, डरे हुए थे, या उन्होंने जानबूझकर मना किया? पाठ चुप है, और यह चुप्पी असुविधाजनक है, क्योंकि अगर वे अवज्ञा में थे तो आत्मा का उन पर उतरना और भी चौंकाने वाला है। इससे भी तीखा सवाल यह है कि जो सत्तर आज्ञा मानकर गए उनकी भविष्यद्वाणी एक ही बार हुई, पर ये दोनों छावनी में भविष्यद्वाणी "करने लगे", मानो रुके ही नहीं। परमेश्वर ने आज्ञाकारिता को नहीं, अपनी स्वतंत्रता को यहाँ प्रकट किया। इसे सुलझाने की कोशिश मत कीजिए; इसे खड़ा रहने दीजिए, क्योंकि यही आपको आत्मा का मालिक बनने से रोकेगा।
पहले सुनने वाले
जो लोग यह पहली बार सुन रहे थे, उनके लिए छावनी और मिलापवाला तम्बू दो अलग दुनियाएँ थीं। तम्बू नियत स्थान था, वहाँ बादल उतरता था, वहाँ पवित्रता के नियम थे; छावनी वह जगह थी जहाँ आटा पीसा जाता, बच्चे रोते, और उसी अध्याय में लोग अपने-अपने डेरे के द्वार पर माँस के लिए रो रहे थे। तम्बू में प्रकाशन, छावनी में बुड़बुड़ाहट। और अब आत्मा उसी बुड़बुड़ाती छावनी के बीच उतर आता है। इस्राएली इसे एक सीमा-उल्लंघन की तरह सुनते, लगभग एक धक्के की तरह। हमारे लिए पवित्र और सामान्य का यह बँटवारा धुँधला पड़ गया है, इसलिए हम इस खबर की ताक़त अक्सर चूक जाते हैं।
चिंतन
आप किस व्यवस्था या ढाँचे को इतना प्रिय मानते हैं कि उसके बाहर परमेश्वर का काम आपको खतरा लगने लगे?
अगर आज कोई दौड़कर आपको बताए कि आपके "क्षेत्र" के बाहर परमेश्वर कुछ कर रहे हैं, तो आपकी पहली प्रतिक्रिया यहोशू जैसी होगी या मूसा जैसी?
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