नीतिवचन 17:1
पाठ
एक मेज़ है जिस पर रोटी का एक सूखा टुकड़ा रखा है। न घी, न सालन, न मेहमान। पर उस कमरे में जो चुप्पी है, वह भारी नहीं, हल्की है, जैसे बारिश थमने के बाद की हवा। और उसी गली में दूसरा घर है, जहाँ मेलबलि के पशुओं का माँस पका है, थालियाँ भरी हैं, त्योहार का दिन है, और आवाज़ें ऊँची हो रही हैं, ताने चल रहे हैं, कोई दरवाज़ा पटककर उठ गया है। नीतिवचन इन दोनों घरों को एक ही तराज़ू पर रखता है और कहता है: "चैन के साथ सूखा टुकड़ा, उस घर की अपेक्षा उत्तम है, जो मेलबलि-पशुओं से भरा हो, परन्तु उसमें झगड़े-रगड़े हों।" कम खाना, पर शान्ति; या भरपूर खाना, पर घर में युद्ध। बुद्धि जानती है किस थाली के आगे बैठना है।
मर्म
यह कहावत त्याग की तारीफ़ नहीं कर रही; यह मूल्य की परिभाषा बदल रही है। हम आमतौर पर सोचते हैं कि जीवन की गुणवत्ता उसमें नापी जाती है जो मेज़ पर रखा है। परमेश्वर की बुद्धि कहती है कि वह उसमें नापी जाती है जो मेज़ के चारों ओर बैठे लोगों के बीच बह रहा है। और यह महज़ व्यावहारिक सलाह नहीं है। मेलबलि परमेश्वर के साथ मेल का भोज था, वह बलि जिसका माँस उपासक अपने परिवार के साथ खाता था। अगर उसी भोज पर भाई-भाई लड़ रहे हैं, तो धर्म का रूप बचा है और उसका प्राण चला गया। परमेश्वर का राज्य कभी भी केवल प्रचुरता का राज्य नहीं था, वह सदा मेल का राज्य था। इसलिए यह पद हमारी समृद्धि को नहीं, हमारी शान्ति को परमेश्वर की उपस्थिति का पैमाना बनाता है।
साझा सूत्र
नीतिवचन जिस विडम्बना पर उँगली रखता है, उसी पर यीशु मसीह ने पहाड़ी उपदेश में हाथ रखा: अगर तुम भेंट लेकर वेदी पर आए हो और वहीं याद आए कि भाई के मन में तुम्हारे विरुद्ध कुछ है, तो भेंट वहीं छोड़ दो, पहले मेल करो, फिर चढ़ाओ (मत्ती 5:23-24)। यह वही तर्क है, बस उल्टी दिशा से। नीतिवचन कहता है कि टूटे रिश्तों के बीच खाया गया मेलबलि का माँस बेस्वाद है; यीशु कहते हैं कि वह चढ़ाया भी न जाए। और फिर वे स्वयं वह मेलबलि बन गए, जिसने परमेश्वर और मनुष्य के बीच, और मनुष्य और मनुष्य के बीच की दीवार गिरा दी। मसीह का सुसमाचार अन्ततः एक मेज़ है जहाँ शत्रु एक साथ बैठ पाते हैं।
दर्पण
आप शायद उस घर में रहते हैं जहाँ फ्रिज भरा है और बातचीत खाली। जहाँ रविवार की आराधना के बाद कार में बैठते ही वही पुराना विषय फिर खुल जाता है। जहाँ परिवार के व्हाट्सएप ग्रुप में कोई किसी को पढ़ता है पर जवाब नहीं देता। यह पद आपकी उस चाहत को नंगा करता है जो सोचती है कि थोड़ी और आमदनी, थोड़ा बड़ा घर, थोड़ी और सुविधा आ जाए तो रिश्ते अपने आप ठीक हो जाएँगे। नहीं होंगे। और यह उस अभिमान को भी छूता है जो हर बहस में सही होना चाहता है, भले ही मेज़ ठंडी पड़ जाए। इसी अध्याय का चौदहवाँ पद कहता है कि झगड़े का आरम्भ बाँध के छेद जैसा है।
आज शाम खाना शुरू करने से पहले, मेज़ पर बैठे लोगों के सामने ज़ोर से कहिए: "आज इस मेज़ पर मैं कोई पुराना हिसाब नहीं खोलूँगा।" और फिर वह वाक्य निभाइए।
मुख्य पात्र
इस पद में कोई नाम नहीं है, पर एक न्यायाधीश ज़रूर है। "उत्तम है" कोई राय नहीं, फ़ैसला है, और फ़ैसला सुनानेवाले परमेश्वर हैं। यही वह परमेश्वर हैं जिनके बारे में तीसरा पद कहता है कि "मनों को यहोवा जाँचता है"। सोच कर देखिए: भरे हुए घर की भट्ठी में जो पिघलकर बाहर आ रहा है, वह चाँदी नहीं, मैल है। परमेश्वर मेज़ पर रखी थाली नहीं गिनते, वे मेज़ के चारों ओर के मनों को तौलते हैं। यह उनके स्वभाव के बारे में कुछ कोमल कहता है: वे प्रचुरता से प्रभावित नहीं होते और गरीबी से शर्मिंदा नहीं होते। जहाँ शान्ति है, वहाँ वे बैठते हैं, चाहे मेज़ पर बस सूखी रोटी हो।
एक बारीकी
ध्यान दीजिए कि तुलना अमीरी से नहीं, बलिदान से की गई है। पद कहता "पकवानों से भरा घर" तो बात केवल दौलत की होती। पर लिखा है "मेलबलि-पशुओं से भरा"। यह मन्दिर से लौटे परिवार का पवित्र भोज है, वह दुर्लभ माँस जो उपासक ने परमेश्वर के सामने चढ़ाकर घर लाया है। यानी दूसरा घर बेईमानों का नहीं, धार्मिक लोगों का घर है। वे लोग जिन्होंने अभी-अभी परमेश्वर से मेल का जश्न मनाया, अब एक-दूसरे से युद्ध कर रहे हैं। कहावत की धार यहीं है, और वह हमारी ओर मुड़ी है: आराधना से लौटकर घर में जो होता है, वही असली आराधना का प्रमाण है।
पहले सुननेवाले
इस्राएल में माँस रोज़ का भोजन नहीं था; मेलबलि का दिन साल के गिने-चुने उजले दिनों में से एक था। और घर कोई एकल परिवार नहीं था, बल्कि बूढ़े पिता, बेटे, बहुएँ, पोते, नौकर, सब एक आँगन के नीचे। ऐसे घर में झगड़ा निजी मामला नहीं रहता; वह पूरे कुल की इज़्ज़त की बात बन जाता है, और पड़ोसी दीवार के उस पार सब सुनते हैं। जो युवक यह कहावत सीख रहा था, वह अपना घर बसाने की तैयारी कर रहा था और सपने देख रहा था कि उसका आँगन कितना भरा होगा। शिक्षक उसे रोकता है और कहता है: भरा आँगन लक्ष्य नहीं है, चैन का आँगन लक्ष्य है।
मनन
आपके घर की मेज़ पर पिछली बार शान्ति कब थी, और उसे तोड़ने में आपका अपना हिस्सा क्या रहा?
आप किस कमी को भरने की कोशिश में लगे हैं, यह मानते हुए कि उसके भर जाने पर रिश्ते अपने आप ठीक हो जाएँगे?
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Proverbs 17:1 के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
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नीतिवचन 17:1 का क्या अर्थ है?
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नीतिवचन 17:1 आज भी कैसे प्रासंगिक है?
Proverbs 17 पर समुदाय क्या साझा करता है
इस अंश पर पाठकों और संपादकीय टीम से अंतर्दृष्टि, प्रार्थनाएँ और धन्यवाद।
पिता, धन्यवाद कि हमारी मेज़ पर चाहे सूखा टुकड़ा ही हो, पर आपने घर में चैन दिया है। आपके वचन के अनुसार यही शांति भरे भोजन से बढ़कर है। धन्यवाद उस मेल के लिए जो आप हमारे परिवार में बनाए रखते हैं, और उस संतोष के लिए जो थोड़े में भी भर देता है।
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