भजन संहिता 60
पाठ
एक हारी हुई सेना लौटती है, और भजनकार परमेश्वर से शिकायत नहीं छिपाता: "हे परमेश्वर, तूने हमको त्याग दिया, और हमको तोड़ डाला है।" धरती काँपी, दरारें पड़ीं, प्रजा को लड़खड़ा देनेवाला दाखमधु पिलाया गया। फिर बीच में परमेश्वर स्वयं बोलते हैं और नक्शे के एक-एक हिस्से पर अपना अधिकार जताते हैं, शेकेम से लेकर एदोम तक। अंत में भजन फिर अनिश्चय में लौटता है, "तू हमारी सेना के साथ नहीं जाता", और वहीं से विश्वास की ओर मुड़ता है: "परमेश्वर की सहायता से हम वीरता दिखाएँगे।"
मर्म
इस भजन की सबसे चुभने वाली बात यह है कि हार का कारण शत्रु नहीं, परमेश्वर बताए गए हैं। संयोग नहीं, बुरी किस्मत नहीं, खराब रणनीति नहीं। जिसने तोड़ा, उसी से मरम्मत माँगी जा रही है। यही वाचा का तर्क है: परमेश्वर का क्रोध उनकी वाचा के बाहर की चीज़ नहीं, बल्कि उसी का गंभीर पक्ष है। जो जाति उनकी है, उसे वे गंभीरता से लेते हैं, इसलिए उसके पाप को भी गंभीरता से लेते हैं। और फिर भी, उसी साँस में अनुग्रह: "तेरे प्रिय छुड़ाए जाएँ।" टूटी हुई प्रजा अब भी प्रिय है। न्याय और प्रेम यहाँ दो अलग परमेश्वरों से नहीं आते, एक ही हाथ से आते हैं, और इसीलिए प्रार्थना संभव है।
सूत्र
पद 6 से 8 तक परमेश्वर "पवित्रता के साथ" बोलते हैं, और जो बोलते हैं वह ज़मीन के कागज़ात जैसा लगता है: शेकेम, सुक्कोत, गिलाद, मनश्शे, एप्रैम, यहूदा सब उनके। हारे हुए लोग सुनते हैं कि जो देश उनके हाथ से निकलता दिख रहा है, वह असल में परमेश्वर का है, और वे उसे फिर बाँट सकते हैं। इसी घोषणा के भीतर एक शब्द चमकता है: "यहूदा मेरा राजदण्ड है।" याकूब ने उत्पत्ति 49 में कहा था कि राजदण्ड यहूदा से न हटेगा, और उसी वंश से वह राजा आया जिसने तलवार से नहीं, क्रूस से राज्य स्थापित किया। भजन 60 की भूख, एक ऐसा राजा जो सचमुच आगे-आगे चले, मसीह में तृप्त होती है।
दर्पण
हम में से अधिकांश को युद्ध का मैदान नहीं मिलता, पर हार मिलती है। वह नौकरी जो निकल गई, वह रिश्ता जो टूटा और जुड़ा नहीं, वह बीमारी जिसने शरीर में दरार डाल दी, वह मंडली जो सिकुड़ती जा रही है। हमारी पहली प्रवृत्ति होती है परमेश्वर को इससे अलग रखना, ताकि उन पर दोष न आए। यह भजन वह सुविधा नहीं देता। यह परमेश्वर के मुँह पर कहता है कि यह आपने किया, और फिर उन्हीं से चंगाई माँगता है। साथ ही यह हमारी दूसरी शरणों को भी नंगा करता है: "मनुष्य की सहायता व्यर्थ है" का अर्थ है कि संपर्क, बीमा, अनुभव, सब अपनी जगह ठीक हैं, पर आखिरी भरोसे की जगह नहीं। आज एक काम कीजिए: अपनी सबसे ताज़ा हार को एक वाक्य में कागज़ पर लिखिए, और उसे सामने रखकर पद 1 ज़ोर से परमेश्वर से बोलिए, शिकायत सहित, और "फिर हमको ज्यों का त्यों कर दे" तक पूरा पढ़िए।
प्रश्न
अगर परमेश्वर ने ही तोड़ा, तो उन्हीं से जोड़ने की प्रार्थना करना क्या मूर्खता नहीं? और पद 8 की भाषा हमें और असहज करती है: मोआब धोने का पात्र, एदोम पर जूता फेंका गया। यह विजेता की भाषा है, और भजन इसे नरम नहीं करता। हम इतना कह सकते हैं कि यहाँ बोलनेवाला इस्राएल का सेनापति नहीं, परमेश्वर हैं, और उनके राजत्व में जातियों पर न्याय भी शामिल है। पर भजन का अंत भी खुला रहता है: गढ़वाले नगर तक कौन पहुँचाएगा, इसका उत्तर नहीं आता। विजय की खबर नहीं, केवल भरोसे का वाक्य। कभी-कभी विश्वास यही होता है, उत्तर नहीं, पर सही पते पर खड़ा रहना।
श्रोता
पहले गानेवाले वे लोग थे जिन्होंने अपने बेटे युद्ध में खोए थे। उनके लिए शेकेम और सुक्कोत महज़ नाम नहीं थे; वे जगहें थीं जहाँ याकूब रुका था, जहाँ देश बाँटा गया था, जहाँ वाचा की स्मृति गड़ी थी। जब वे सुनते कि "गिलाद मेरा है", तो उन्हें सुनाई देता कि पुरखों से की गई प्रतिज्ञा अब भी खड़ी है, भले ही सीमाएँ हिल रही हों। "तूने अपने डरवैयों को झण्डा दिया है" उनके लिए युद्ध का चिह्न था, वह ध्वज जिसके नीचे बिखरे सैनिक फिर इकट्ठे होते हैं। यह भजन मंदिर में सामूहिक रूप से गाया जाता था, यानी हार को छिपाया नहीं, उसे आराधना में लाया गया।
अंतर्पाठ
भजन 108 इसी भजन के पद 5 से 12 को दोबारा उठाता है, पर वहाँ शिकायत से शुरुआत नहीं, स्तुति से होती है। वही शब्द, बदला हुआ सुर: वही प्रजा जो कभी टूटी थी, अब गा सकती है। और पद 3 का "लड़खड़ा देनेवाला दाखमधु" पूरे शास्त्र में क्रोध के कटोरे का चित्र बन जाता है, वह कटोरा जिसे गतसमनी में यीशु मसीह ने अपने लिए माँगकर नहीं, बल्कि स्वीकार करके पिया। जो प्याला परमेश्वर की प्रजा को लड़खड़ाता है, वही प्याला अंततः उनके पुत्र ने अपने होंठों तक उठाया। इसीलिए हम पद 12 को उस भरोसे के साथ पढ़ सकते हैं जो भजनकार के पास केवल आशा के रूप में था।
चिंतन
आपकी किस हार को आपने अब तक परमेश्वर से दूर रखा है, यह कहकर कि "इसमें उनका हाथ नहीं"?
"मनुष्य की सहायता व्यर्थ है" पढ़ते समय आपके मन में सबसे पहले किसका नाम आया, और वह नाम आपके भरोसे में कहाँ खड़ा है?
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Psalms 60 के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
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भजन संहिता 60 हमें परमेश्वर के स्वभाव के बारे में क्या सिखाता है?
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Psalms 60 पर समुदाय क्या साझा करता है
इस अंश पर पाठकों और संपादकीय टीम से अंतर्दृष्टि, प्रार्थनाएँ और धन्यवाद।
हार के बीच में दाऊद रो रहा था, "हे परमेश्वर, तूने हमें त्याग दिया है।" और तभी परमेश्वर बोलता है, "मैं मगन होकर शेकेम को बाँट दूँगा।" गौर कर, वह डरा हुआ नहीं, वह नापने की बात कर रहा है, जैसे ज़मीन पहले से उसकी है। तेरी हार ने उसका हाथ छोटा नहीं किया। जो टूटा पड़ा है, उसके लिए भी उसकी योजना अभी बाकी है।
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